सोमवार, 20 जुलाई 2020

फिल्म पत्रकारिता और पत्रकार

हालांकि निर्माता-निर्देशक मदन मोहला के निधन की खबर मिलने के बाद मैं दस नंबरी फिल्म के बारे में मेरा संस्मरण लिखना चाहता था, लेकिन मेरी पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाएं और मेरे दोस्त वजीर सिंह Vajir Singh की फिल्म पत्रिका को ८ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में उसने डाली पोस्ट के बाद  फिल्म पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों पर कुछ लिखना मुझे ज्यादा उचित लगा। इसके पहले मैंने फिल्म पीआरओ के बारे में लिखा था जिसे काफी सराहा गया।


आज फिल्म पत्रकारिता बेहद आसान हुआ है। जब फिल्म प्रदर्शन के कगार पर होती है तो पीआरओ कलाकारों के साथ मिलवाते हैं और इंटरव्यू हो जाते हैं। आज फिल्म पत्रकारों को सिर्फ फिल्म रिलीज के वक्त याद किया जाता है। १५-२० वर्ष पहले ऐसे नहीं था। फिल्म के मुहुर्त से लेकर शूटिंग  कवर करने के लिए और आडियो रिलीज के और फिल्म पूरी  होने के बाद विशेष शो के लिए पत्रकारों को आमंत्रित किया जाता था। जिससे फिल्म पत्रकारिता करने वाले कई पत्रकारों से अच्छी खासी दोस्ती हुई थी। पत्रकारों के साथ ही फोटोग्राफरों के साथ भी दोस्ती हुई थी। इनमे टीव्ही के पत्रकार भी है. पराग छापेकर Parag Chhapekar New, Manoj Khadilkar  मनोज खाडिलकर, सोहेल Sohel Fakhruddin Fidai के नाम तुरंत याद आते है.

सुश्री रेखा देशपांडे के प्रोत्साहन की  वजह से मैं फिल्म पत्रकारिता करने लगा। उनके बाद सबरंग के संपादक धीरेंद्र अस्थाना Dhirendra Asthana, राकेश श्रीमाल Rakesh Shreemal संझा जनसत्सता के तीश पेडणेकर, लोकसत्ता के श्रीकांत बोजेवार Shrikant Bojewar. सांज लोकसत्ता के संपादक स्चर्गीय चंद्रशेखर वाघ, प्रकाश कुलकर्णी, आदि ने मुझे काफी प्रोत्साहित किया।

*©® मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे की फेसबुक पोस्ट*

फिल्म पत्रकारिता करते हुए कुणाल शाह Kunal M Shah, वजीर सिंह Vajir Singh, श्याम शर्मा Shyam Sharma केएम श्रीवास्तव Krishnamohan Srivastava से अच्छा खासी दोस्ती हो चुकी थी। कुणाल ने अब फिल्म पत्रकारिता छोड़ कर खुद की कास्टिंग एजंसी शुरु की है और अपना ऐक अलग स्थान बनाया है। वजीर ने नौकरी छोड़ कर खुद की बॉलीवुड ट्रेड पत्रिका शुरु की और आज वह सफलापूर्वक चल रही है। वजीर की शादी में हम जम कर नाचे थे। श्याम शर्मा हालांकि अच्छा अभिनेता है लेकिन उसे Murli Sharma मुरली शर्मा जैसा मौका नहीं मिल। मुरली शर्मा भी अभिनेता बनने के पहले इंडियन एक्सप्रेस में पत्रकारिता कर चुके हैं। हरी मृदुल Hari Mridul एक बेहद अच्छे कवी है और फिल्म पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने अपनी इस कला को बखूबी जीवंत रखा है। साहित्य में उनकी रुची कमाल की है और उनकी रचनाएं भी बेमिसाल है। संजय मासूम Sanjay Masoomm आज चोटी के फिल्म लेखक बने हैं जो पहले नवभारत टाईम्स में पत्रकारिता करते थे। अनिल राही Anil Rahi अच्छी आवाज के धनी है जो अब धारावाहिक लिखने का काम कर रहे हैं। इंद्रमोहन पन्नू Indermohan Pannu जैसा मित्र बहुत ही विरला मिलते हैं।  भारती दुबे Bharati Dubey एक बहुत ही अच्छी मित्र है जो आज भी अपना दबदबा कायम रखे हुए हैं। पूजा सामंत Pooja Samant ने हिंदी और मराठी फिल्म पत्रकारिता में अपना अलग स्थान बनाया है। ज्योती वेंकटेश Jyothi Venkatesh आज भी उसी जोश के साथ फिल्म पत्रकारिता कर रहे हैं। आज गुजरात समाचार मे काम कर रहे आशिष भिंडे Ashish Bhinde साहित्य  में अपना नाम कर रहे हैं.

पीटर मार्टिस Peter Martis स्क्रीन में काम करते थे जो बाद में पीआरओ बन गए। इसी तरह आलोक माथुर Alok Mathur भी स्क्रीन में काम करते थे बाद में पीआरओ बन गए। ऐसे कई पत्रकार हैं जो बाद में पीआरओ का काम करने लगे। चंदेरी में राजू पटेल थे, जो कमाल के थे। हमेशा आऊट ऑफ बॉक्स सोचते थे। उनका दिमाग हमेशा नया कुछ करने का प्रयास करता था जिससे पाठकों को बेहद कमाल की सामग्री पढ़ने को मिलती थी। अब वह किसी प्रोडक्शन हाऊस में हैं। दिलीप ठाकूर Dilip Thakur बहुत पुराने और मंजे हुए फिल्म पत्रकार हैं। वह  फिल्मों में ही जीते हैं। उन्हें गुगल की जररूत नहीं पड़ती। आज भी उसी उत्साह के साथ वह काम करते हैं। श्रीकिशोर शाही Shrikishore Shahi सामना के उम्दा फिल्म रिपोर्टर हैं। मेरे बहुत ही अच्छे मित्र भी हैं। सुरेंद्र गांगण Surendra Gangan मेरे साथ फिल्म पत्रकारिता करते थे आज वह हिंदुस्तान टाईम्स में पालिटिकल बीट बहुत ही खूबसूरती से कवर कर रहे हैं। सकाल के संतोष भिंगर्डे Santosh Bhingarde एक बहुत ही सच्चे पत्रकार है. मेरा बहुत अच्छा दोस्त है. ऐसे दोस्त कम ही मिलते है.

कोमल नाहटा Komal Nahta और तरन आदर्श Taran Adarsh उस  जमाने में भी चोटी पर थे और आज भी चोटी पर हैं। हालांकि ऊंचाई पर पहुंचने के बाद कुछ लोग खुद को शहंशाह समझने लगते हैं, लेकिन इन दोनों ने कभी भी ऐसा महसूस नहीं होने दिया। आज भी उन्हें कोई भी किसी भी तरह की मदद मांगता है तो दे देते हैंं। इसी कड़ी में स्क्रीन की संपादिका उदय तारा नायर का भी नाम लेना पड़ेगा। इनकी जैसी संपादिका अच्छे तकदीर वालों को ही मिलती है। पत्रकारों को हर तरह की मदद करने के लिए उदया तारा तैयार रहती थी। विनोद मिरानी Vinod Mirani  एक बेहद अच्छ इंसान हैं.

*©® मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे की फेसबुक पोस्ट*

हालांकि यहां मैं एक अनुभव बताना चाहूंगा। एक बहुत बड़ी हिंदी की महिला पत्रकार हैं। मैं नया-नया आया था तो सोचा उन्हें मिल कर अच्छी पत्रकारिता करने के लिए कुछ टिप्स लिए जाएं। मैंने उन्हें फोन कर मिलने की इच्छा जताई। उन्होंने सुबह आठ बजे उनके घर बुलाया। मैं आठ बजे पहुंचा। पहुंचने के बाद घर की घंटी बजाई और वह पत्रकार घर के बाहर आई और कहा मैं क्या टिप्स दे सकती हूं तुम्हें खुद ही अपनी जमीन तलाशनी है, खुद के कांटैक्ट डेवलप करो और आगे बढ़ो। इतना कह कर वह अंदर गई। पहले तो मैंं काफी नर्वस हुआ, लेकिन उनकी बातों पर अंमल कर खुद का स्थान बनाया।


फोटोग्राफरों में प्रदीप बांदेकर Pradeep Bandekar कुंदन गोस्वामी Kundan Goswami, उमेश व्यास (जो अब जयपुर या कहीं और हैं।), जगदीश औरंगाबादकर (जो अब इस दुनिया में नहीं है) इनके नाम प्रमुखता से याद आते हैं। प्रदीप जैसा दोस्त आपको ढूंढ कर भी नहीं मिलेगा।

शकील अहमद, एएल चौगुले, शरद राय Sharad Rai, अशोक भाटिया  अशोक रामचंद भाटिया Shantiswaroop Tripathi शांतीस्वरूप त्रिपाठी, Dharmendra Pratap Singh धर्मेंद्र प्रताप सिंह दि के नाम भी याद आते हैं। शकील ने फिल्म पत्रकारिता ही छोड़ दी है, अब वह कहां है पता नहीं। आनंद भारती Anand Bharti  एक बहुत अच्छे पत्रकार है। विकी ललवानी भी बहुत दिनो से संपर्क मे नही है. राजेश श्रीवास्तव Rajesh Shrivastava भी एक बेहतरीन फिल्म पत्रकार है।

आनन-फानन में यह नाम याद आए जिनके साथ मेरी अच्छी जमती थी। जिन्हें मैं दोस्त कह सकता हूं। अगर किसी का नाम गलती से लेना रह गया होगा तो माफ करें और कमेंट बॉक्स में लिख कर भेजें।

*©® मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे की फेसबुक पोस्ट*

ये पोस्ट सभी पत्रकारिता के छात्रों और नए पत्रकारों के लिए उपयोगी हो सकती है।

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