रविवार, 7 जून 2020

पत्रकारिता की चुनौतियों से लड़कियों को आगाह करें, नकारात्मक पक्ष बताएं, मगर फील्ड में आने से न रोकें




मुझे लगता है कि लड़कियों को सफलता पाने की कभी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए। न ही किसी होड़ में खुद को शामिल करना चाहिए। उन्हें अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा करना चाहिए, और पूरे सम्मान के साथ निडर होकर अपने कार्यक्षेत्र (पत्रकारिता हो या कोई और क्षेत्र) में काम करना चाहिए। अगर लड़कियां अपने रास्ते में अपने सम्मान के साथ चले तो दुनिया की नज़र में बुरे कहलाने वाले लोग भी सामने आएंगे तो सम्मान ही देंगे।




_*पत्रकारिता के पेशे में आने से पहले अगर कोई आपसे मार्गदर्शन चाहता है तो क्या करना चाहिए? इसमें अगर इच्छुक शख्स कोई लड़की है तो… क्या उसे आने के लिए प्रेरित करना चाहिए या मना कर देना चाहिए। इस पर आधारित फेसबुक पोस्ट पर पढ़िए लेखिका, पत्रकार, काटूर्निस्ट, कमेंटेटर, रेडियो एनाउंसर यानी बहुमुखी प्रतिभा की धनी गीतांजलि गीत की प्रतिक्रिया…*_

उन्होंने लिखा है कि…
यहां सबके विचार पढ़े, अपनी भी बात रखूंगी…

मेरी पत्रकारिता में रुचि तब शुरू हुई, जब मैं साल 1987 में उज्जैन से बीएससी ग्रेजुएशन कर रही थी, उस समय नई दुनिया जो इंदौर से निकलता था, श्री बसंतीलाल सेठियाजी के समय की बात है। उसमें पाठकों के पत्र कॉलम में और अन्य कॉलम में मेरे आलेखों को स्थान मिलता था। उस समय न किसी से मोबाइल पर बात होती थी, न फोन का प्रचलन था। न किसी को जानते थे। न किसी से कोई पहचान थी, बस पोस्ट आफिस से टिकट खरीद लाए। अपना आलेख लिखकर भेज दिया नई दुनिया को। उनमें मैं ज्वलंत मुद्दों को उठाती थी।

बड़े खुशी की बात है, उन दिनों नई दुनिया अपने लेखकों को भी पत्र द्वारा सम्मान दिया करता था। मेरे पास मेरे सम्मान में लिखा श्री महेंद्र सेठिया जी द्वारा भेजा गया पत्र आज भी सुरक्षित रखा हुआ है। मेरे कॉलेज में प्रोफ़ेसर्स भी बोलते थे, नई दुनिया इंदौर की अपनी पहचान और अपना स्तर है वह सिर्फ दमदार आलेखों को स्थान देता है। वो लोग कहते थे- नई दुनिया में हम कुछ भेजते है तो नहीं छपता है। तुम्हारा छप जाता है, खुशी की बात है।

बीएससी के बाद साल 1993 के आसपास छिन्दवाड़ा में स्थानीय दैनिक चाणक्य व जनमित्र से और दैनिक मध्यदेश से जुड़ी और दैनिक मध्यदेश में समसामयिक विषय पर कार्टूनिस्ट के रूप में पहचान बनाई। इसी में महिला परिशिष्ट देखती थी। जिस दिन पेस्टर नहीं आया, उस दिन अपने महिला परिशिष्ट की पेस्टिंग भी की। उन दिनों बटर पेपर पर समाचार प्रिंट होते थे। उसे कांच के ऊपर ग्राफ पेपर पर पेस्ट करते थे। वे सारे पेज प्रिटिंग के लिए जाया करते थे।

*छिंदवाडा में पत्रकारिता के क्षेत्र में जुड़ी तो पतिदेव (वरिष्ठ पत्रकार और कवि राजेंद्र राही) का साथ था। जब पति महोदय किसी काम से या कवि सम्मेलन में शहर से बाहर हुए तो उस दिन के अखबार में सम्पादकीय लिखकर आफिस कर्मचारियों की मदद से मैं अखबार को प्रिंटिंग प्रेस में भी भिजवा दिया करती थी। मुझे पत्रकारिता में काम करने में अच्छा लगा कभी किसी बुरे अनुभव का सामना नहीं हुआ।*

…लेकिन मैं यहां (फेसबुक पोस्ट पर) आप लोगों के विचार पढ़ रही हूं कि लड़कियों को पत्रकारिता में नहीं आना चाहिए। मुझे लगता है लड़कियों को कोई भी क्षेत्र हो, उधर बढ़ने से पहले वहां के माहौल के बारे में ज़रूर पता करना चाहिए कि उनके लिए क्या सही होगा और क्या नहीं, तभी आगे बढ़ना चाहिए।

बेटी के जन्म के बाद मैंने साल 1999 के आसपास यूपीएससी क्लियर किया था। पर मेरी परिस्थितियां नहीं थी कि सब छोड़कर बाहर जाऊं। तब से मेरा भी सपना था कि बेटी बड़ी होकर आईएएस अफसर बने, मैंने उसे कम उम्र में ही जनरल नॉलेज और सामान्य विषय पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन जैसे ही वह ट्वेल्थ (बारहवीं) पास हुई तो उसने अपनी रुचि दो क्षेत्रो में, पहली अंतरिक्ष रिसर्च विज्ञान और दूसरा फ़िल्म प्रोडक्शन में ज़ाहिर की। फिर भी मैंने गलती की, उसे बीएससी मैथ्स में ये सोचकर एडमिशन दिला दिया कि ग्रेजुएशन के बाद इसे आईएएस की कोचिंग के लिए बाहर भेज दूंगी। आखिर वही हुआ जो उसने सोचा था। अब लगता है अच्छा हुआ। उसने अपना मनपसंद विषय ले लिया।

अब हम अभिभावकों का कर्तव्य होता है हम उसे उसके क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों से उसे अवगत कराएं, वह अपनी जगह के जिन नकारात्मक पहलू से अनजान है उसे सचेत कराए। ताकि वह सही दिशा में, सही तरीके से आगे बढ़े। और भ्रमित भी न हो। चुनौती हर क्षेत्र में है। हमें कैसे काम करना है, कैसे लोगों के साथ रहना है। ये हम पर निर्भर करता है।

मुझे लगता है कि लड़कियों को सफलता पाने की कभी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए। न ही किसी होड़ में खुद को शामिल करना चाहिए। उन्हें अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा करना चाहिए, और पूरे सम्मान के साथ निडर होकर अपने कार्यक्षेत्र (पत्रकारिता हो या कोई और क्षेत्र) में काम करना चाहिए। अगर लड़कियां अपने रास्ते में अपने सम्मान के साथ चले तो दुनिया की नज़र में बुरे कहलाने वाले लोग भी सामने आएंगे तो सम्मान ही देंगे।

…इसलिये मैं समझती हूं कि चाहे पत्रकारिता हो या कोई भी क्षेत्र लड़कियां कार्यस्थल में अपने आपको अपनी मेहनत से इतना योग्य बना ले कि उनके बिना काम कुछ अधूरा-सा लगे, हर कोई उन्हें पूछे। तो मजाल है कोई उन्हें भ्रमित कर जाए।

*अगर आप लोग लड़कियों को पत्रकारिता में आने से रोक रहे है तो निश्चित ही आप लोगों ने भी कुछ देखा समझा होगा, बिना अनुभव के कोई ये सलाह नहीं देता। फिर भी जो आपसे सलाह मांग रही है आप उसके अभिभावकों को बुलाकर उनके सामने खुलकर अपनी बात कहिए कि क्यों मना कर रहे है? या हां कर रहे है तो वहां उत्पन्न होने वाली चुनौतियों से भी आगाह कराइए। अपने अनुभव उसे बताइए। तभी आप उसे सही दिशा दे पाएंगे।*

*©® गीतांजलि गीत, छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)*

लेखिका परिचय : गीतांजलि गीत बहुमुखी प्रतिभा की धनी है। उनकी रुचि कॉलेज के समय से ही पत्रकारिता में थी। वे लंबे समय से स्तंभकार, काटूर्निस्ट, एनाउंसर, डायरेक्टर के रूप में मीडिया में सक्रिय है। आकाशवाणी छिंदवाड़ा और इग्नू के इंदौर केंद्र में सेवारत रही है। उन्हें संभवत छिंदवाड़ा की पहली महिला पत्रकार होने का गौरव भी हासिल है। सीखने की उम्र कभी खत्म नहीं होती। इसी सोच के साथ फिलहाल वे फिल्म प्रोडक्शन का डिप्लोमा कोर्स माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल से कर रही है।



कोई टिप्पणी नहीं: