शनिवार, 6 अप्रैल 2019

एक दुनिया यह भी..

जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान शहर के एक अच्छे स्कूल जाने का मौका मिला,वैसे तो हर सुबह ऑफिस के लिए निकलना आम बात है...पर उस दिन सरकारी दफ्तर से परे इस बढ़िया स्कूल , जहां खेलकूद से लेकर ना जाने और कितनी सारी सुविधाएं थी, ने दिलोदिमाग को कुछ नया देखने का मौका दिया।

पर मन में एक ख्याल और भी आ रहा था , एक तरफ ये अत्याधुनिक स्कूल और एक हमारे गाव देहात के स्कूल - जहां बैठने के लिए दरी ही मिल जाए तो काफी है, पढ़ाई की क्वॉलिटी तो दूर की बात।
जितना बड़ा इस स्कूल का हॉल था ,कई सरकारी स्कूल की पूरी बिल्डिंग भी उतनी बड़ी नहीं होती।

यहां के प्राइमरी स्कूल के बच्चे भी नॉलेज लेवल पर काफी आगे लगे।अच्छे से सभी टीचर अपना काम जो कर रहे थे।इंग्लिश मीडियम में पढ़ाई हो रही थी,और छोटे छोटे बच्चे हमारे प्रश्नों को इंग्लिश में जवाब कर रहे थे।इनका सामना तो सरकारी स्कूल के बच्चे बड़ी मुश्किल से ही कर पाएंगे।तभी आजकल कई बड़े अधिकारी , संसाधन संपन्न लोग प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला करवाते है।उनका उज्जवल भविष्य जो बनाना है..

एक बात और गौर करने वाली है कि प्राइवेट सेक्टर हो या सरकारी सेक्टर- इन जगहों पर उच्च अधिकारी ज्यादातर बड़े प्राइवेट स्कूलों से पढ़े मिलते है, अपवादों को छोड़कर..

कुछ लोगो का मानना है कि हिंदी ही पढ़ाई का माध्यम होनी चाहिए।तो फिर UPSC से लेकर बैंक ,IIT IIM और मेडिकल, इंजीनियरिंग में क्यों इंग्लिश मीडियम रखे जाते है।

और अगर इंग्लिश मीडियम ही रखना है ,जो कि जरूरी भी माना जाता है, तो फिर क्यों सरकारी स्कूलों में हिंदी या लोकल भाषा पढ़ाई जाती है। मेरे जैसे सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चो को आगे चलकर इंजिनियरिंग से लेकर UPSC तक ना जाने कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इन युवाओं को छोटी मोटी नौकरी के लिए भी दर दर की ठोकरें खानी पड़ती है।
क्यों गांव देहात के बच्चो का भविष्य हल्के में लिया जाता है..

आज भी हमारी पूरी तहसील में SSC ,bank exam से ऑफिसर गिनती के 5-6 नहीं मिल पाते। IIT ,IIM me भी यही हाल है।सरकारी स्कूल से पढ़े अधिकतर बच्चो का नॉलेज लेवल इस हद तक कम होता है कि वे लोग इन एग्जाम की तैयारी का भी नहीं सोच पाते।  

यह आर्टिकल हिंदी Vs English medium नहीं, और न ही सरकारी स्कूलों को बुरा बताने के लिए लिखा गया है ...बल्कि खराब क्वालिटी की education के खामियाजे भुगत रहे बच्चो से जुड़ा है।
अगर हमारे केंद्रीय विद्यालय,नवोदय विद्यालय और कुछ अच्छे सरकारी स्कूल जैसे एक्सीलेंस स्कूल , हाई क्वालिटी  education  दे सकते है तो बाकी सरकारी स्कूल क्यों नहीं।आज भी करोड़ों बच्चे इन सरकारी स्कूलों में पढ़ते है। देश का भविष्य इन स्कूलों में तय होता है...

Written by- Avadh Kishor Pawar,
                     सहायक आयुक्त ,आयकर
                     भारतीय राजस्व सेवा

Note-
My thoughts are personal in nature.This article does not represent the view of my department.

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