गुरुवार, 16 अगस्त 2018

अरे! प्रतुल जी ये बैठने का वक्त नहीं है...

'नमन अटलजी!'

अटलजी का निधन हम सबके लिए एक अपूरणीय क्षति है। यादों के गलियारों से कुछ बातें।

'अटलजी के कहने पर दादाजी ने लड़ा था आखिरी चुनाव...'

पापा के मामा यानी मेरे दादाजी प्रतुलचंद्र द्विवेदी (प्रतुल जी) की वजह से बचपन से अटलजी के कई अनसुने किस्से हमें सुनने को मिले।1993 में मध्यप्रदेश की छिंदवाड़ा विधानसभा सीट से अपना आखिरी चुनाव भी उन्होंने 'अटल जी' के कहने पर ही लड़ा था।उस वक्त मैं ग्यारहवीं में था।

छिंदवाड़ा कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मैं नियमित रूप से दादाजी से मिलने जाया करता था। दादाजी से अटलजी की कई बातें सुनने को मिलती थी।

'अरे! प्रतुल जी ये बैठने का वक्त नहीं है...!'

1993 के विस चुनाव के दौरान छिंदवाड़ा स्टेडियम में अटलजी की जनसभा थी। शायद वो प्रचार का आखिरी दिन था। उन दिनों मोबाइल तो थे नहीं, दादाजी सुबह से छिंदवाड़ा में जनसंपर्क कर रहे थे। अटलजी सभास्थल पर आ चुके थे। लेकिन दादाजी तब तक वहां नहीं पहुंच पाए थे। जबकि अटलजी ने अपनी चिरपरिचित शैली में भाषण देना शुरू कर दिया था। अटलजी का भाषण जारी था... दादाजी मंच पर आए और आकर बैठ गए। भाषण देते देते अटल जी ने अचानक कहा - अरे भाई हमारे प्रत्याशी प्रतूल जी कहां है? दादाजी ने कहा -  मैं यहीं बैठा हूं।

अटल जी ने चुटकी ली और हंसते हुए कहा --- प्रतुल जी ये बैठने का वक्त नहीं है। अापको हमने चुनाव में खड़ा किया है। अगर आप ही बैठ गए तो विरोधी क्या कहेंगे। और पूरी सभा में जोरदार ठहाके लगने लगे।

'कवि सम्मेलन में बुलाना चाहते थे दादाजी'
होली में हर साल छिंदवाड़ा में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन होता है। संभवत: देश का ये एक ऐसा इकलौता कवि सम्मेलन है जो रंग खेलने वाले दिन होता है। देश के कई जाने माने कवि इसमें आते रहते हैं। दादाजी ने ही इस परंपरा की नींव रखी थी। अटलजी को बतौर कवि इस कवि सम्मेलन में वो बुलाना चाहते लेकिन उनकी ये ख्वाईश भी कभी पूरी नहीं हो सकी।

अटलजी के विराट व्यक्तित्व व कृतित्व को
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

सोर्स : अमिताभ अरुण दुबे के वाट्सएप से


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