बुधवार, 4 अप्रैल 2018

फेसबुक पोस्ट : मिट्टी से दूर मत भागिए

बताओ कौन-कौन धूल मिट्टी में उलट पुलट किया है? कौन कौन कंडे या उपले बनाया है? पूरा पढ़ना, क्या पता तनाव दूर करने का समाधान मिल जाए

शहरों की भीड़-भाड़ भरी जिंदगी और बाज़ार के मायाजाल ने हमें खुद की सेहत के लिए इतना ज्यादा प्रोटेक्टिव बना दिया है कि हम कुछ ज्यादा ही सचेत हो गए और प्राकृतिक मिट्टी- धूल, हवा और पानी से दूर होते गए..बाजार ने इनको हमारी सेहत का घोर दुश्मन जो बना दिया है। घरों के आंगन में लोग बागवानी करते थे लेकिन अब शहरों की ऊंची-ऊंची इमारतों के दफ्तरों और घरों में लोग आर्टिफिशियल पेड़-पौधे लगाकर मन को बहला लेते हैं। बच्चे धूल से सन जाएं तो माँ-बाप ये समझ बैठते हैं कि बच्चे ने बीमारियों को उठाकर घर तक ले आया है, आखिर इतना खौफ़ किस बात का? बात-बात में बच्चों के हाथ में टिशु पेपर थमाने वाले माँ-बाप क्या वाकई बच्चों को बीमारी से बचा पा रहे हैं? या उनका बच्चा दिन प्रतिदिन पहले की तुलना में ज्यादा कमजोर हो रहा है? क्या हम बच्चों, जवानों और बुजुर्गों में जीवन-स्पर्धा के चलते दिन-ब-दिन पनप रहे तनाव को दूर कर पाने में सफल हैं या प्रोजेक जैसी दवाओं के भरोसे तनाव से निपटारे की ओर अग्रसर हैं? समस्याओं की जड़ों तक जाएं तो पता चलेगा कि आर्टिफिशियल लाइफ के चलते हम पहले से ज्यादा विकृत और कमजोर हो चले हैं। डिप्रेशन, मानसिक दबाव और थकान हर घर के किसी ना किसी सदस्य को घेरे हुए हैं। तो अब क्या करें?

कुछ ना करें, रोज सुबह शाम खुले आसमान के नीचे घूमे फिरें, धूल मिट्टी के करीब जाएं और हो सके तो बागवानी करें, गमलों से मिट्टी की अदला-बदली करें, प्लास्टिक की दस्तानें पहनकर नहीं, खुले हाथों से...जो लोग गाँव कस्बों के करीब रहते हैं वो लोग खेत खलिहान जाएं, मिट्टी में खूब खेलें, घूमे फिरें..क्योंकि..मिट्टी में होता है एक खास बैक्टिरिया..मायकोबैक्टेरियम वैकी (Mycobaterium vaccae)..ये एक ऐसा सूक्ष्मजीव है जो हमारे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स की क्रियाविधि को तेज करता है और सेरोटोनिन के उत्पादन को भी बढ़ाता है जिसकी वजह से मानसिक तनाव काफी कम होता है। बेहतर सेहत के लिए मिट्टी कनेक्शन की बात आपसे आपके बुजुर्गों ने कई बार करी होगी फिर भी हम सभी मिट्टी और धूल से बिकट खौफ खाए रहते हैं, क्यो? बचपन में हमें चोट लग जाया करती थी तो पिताजी कहते थे कि खून बहते घाव पर पेशाब कर दो और उस पर मिट्टी चिपका दो..अजीब लगेगा आपको ये जानकर..पर हमें कभी दुबारा किसी क्रीम, टेबलेट या डॉक्टर की जरूरत नहीं पड़ती थी। बड़े हुए, पढ़े लिखे और फिर माइक्रोबायोलॉजी की पढ़ाई भी की तो एक नयी बात पता चली..एक्टिनोमायसिटीज़ के बारे में..ये भी मिट्टी में पाए जाने वाले कमाल के बैक्टिरिया हैं, प्राकृतिक तौर पर मिलने वाले खास एन्टीबायोटिक्स भी हैं ये..यानी जिस मिट्टी को हम घाव पर लगाया करते थे वो एंटीबायोटिक का काम करती थी और हमारी पेशाब एक टिंक्चर की तरह..मिट्टी में कितना कुछ छुपा हुआ है..और हम हैं कि मिट्टी के नाम से भौं सिकोड़ लेते हैं...वापस मायकोबैक्टेरियम वैकी की बात करते हैं...पता है इस बैक्टिरिया पर कई तरह की शोध पहले भी की जा चुकी है और कई तरह की शोध अभी भी जारी है..सुना है ये टी.बी. के बैक्टिरिया की भी ऐसी की तैसी कर देता है...यानी टी.बी. को ठीक करने के लिए दवाओं की खोज करने वाले खोजी लोग मायकोबैक्टेरियम वैकी से भी इसके इलाज की संभावनाएं खोज रहे हैं...खैर..मैं अपनी बात खत्म करूं और एक बार फिर दोहरा दूं..मिट्टी से जितना लगाव रहेगा, जितने इसके करीब जाएंगे..तनाव, घबराहट और मानसिक रूप से होने वाली किसी भी कमजोरी में बेहतर परिणाम जरूर दिखेंगे..एक और हिंट...मायकोबैक्टेरियम वैकी की सबसे पहली खोज गोबर में की गयी थी...बताओ कौन कौन कंडे या उपले बनाया है आज तक? नहीं बनाया तो कोई बात नहीं, इस पोस्ट को शेयर कर दो..आपका तनाव भी दूर होगा..

~ दीपक आचार्य


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