रविवार, 11 मार्च 2018

दुर्लभ पीला पलाश खोजा तंसरामाल के वैद्य प्रीतम डोंगरे ने

तंसरामाल के वैद्य प्रीतम डोंगरे 

  • प्लोरा आफ मध्य प्रदेश कहा जाता है औषधीय गुणों से युक्त पीले रंग के पलाश को 
  • पिछले साल तामिया इलाके में  चर्चा का विषय था पीले पलाश का दुर्लभ पेड़
छिंदवाड़ा। पीला पलाश जो कि बहुत कम मात्रा में पाया जाता है पर हमारे सतपुड़ा की वादियों में इसके कुछ दुर्लभ पेड़ आज भी मौजूद है। इन्हीं में से एक पेड़ मोहखेड़ ब्लॉक के ग्राम तंसरामाल के वैद्य प्रीतम डोंगरे ने खोजा है। ऐसा माना जा रहा है कि आसपास के जंगलों में एक पीले पलाश का पेड़ है।

मान्यता है कि पीले पलाश में मां पितांबरी देवी वास पाया जाता है। तंत्र विद्या में इसका उल्लेख मिलता है। इसे घर में रखना शुभ माना जाता है। साल 2017 में तामिया इलाके में भी पीले रंग के पलाश का पेड़ चर्चा में आया था।

जमुनियाखुर्द माध्यमिक शाला में पदस्थ शिक्षक नीरज मुरकुटे तथा तामिया वन परिक्षेत्र में श्रीझौंत बीट में पदस्थ वनरक्षक संतोष भलावी सोनू व्यक्तिगत तौर पर लाल-पीले पलाश के संरक्षण के कार्य में जुटे हुए हैं।

तामिया विकासखंड में पीला पलाश का एकमात्र वृक्ष तामिया के दौरियाखेड़ा में बचा है। जहां पहले दो पेड़ थे एक काटा जा चुका है। वहीं दूसरे पीले पलाश के पेड़ कोइ संरक्षित किया जा रहा है।

एक तरफ देशभर में लाल पलाश सिरमौर बना हुआ हैं तो दूसरी तरफ पीला पलाश सभी जगह बदहाल है। इसके संरक्षण के लिए कम ही प्रयास हो रहे है। लाल पलाश के पुष्प को जहां यूपी समेत कई राज्यों में राजकीय पुष्प का दर्जा देकर आदर दिया गया है। वहीं दुर्लभ प्रजाति के पीले रंग के फूल वाले पलाश को संरक्षित करने की जगह नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।
जंगल की ज्वाला के नाम से मशहूर पलाश फूल के साथ ही पूरा पौधा और उसके  विभिन्न भाग कई उपयोग में आते हैं। वास्तव में पलाश के पीले फूल की दुर्लभ प्रजाति है। पीले पलाश के फूलों पर तो ग्लोबल वार्मिग का असर भी नहीं होता। पीले रंग के पलाश को प्लोरा आफ मध्य प्रदेश कहकर सम्मानित किया जाता है।

तामिया में 1939 में हुई थी खोज

वनरक्षक संतोष भलावी की माने तो पीले पलाश के वृक्ष की सर्वप्रथम खोज वन अधिकारी मि. सैग्रिया ने 1939 में की थी। उन्होंने अपने शोध ग्रंथ में इसका नाम व्यूटिया ल्यूटिया रखा। सन्‌ 1961 में डा. महेश्र्वरी ने इसे लाल पलाश ब्यूटिया मोनोस्पर्मा की प्रजाति माना है। इसे ब्यूटिया मोनोस्पर्मा प्रजाति ल्यूटिया नाम दिया। इसका व्यूटिया नाम सर विलियम राक्सवर्ग ने 18 वीं शताब्दी ने पर्यावरण प्रेमी जान स्टूअर्ट अर्ल आफ ब्यूट इंग्लैंड के प्रधानमंत्री की स्मृति में रखा। मोनोस्पर्मा का अर्थ है एक बीज वाला क्योंकि इसकी फली में एक बीज होता है। ल्यूटिया का अर्थ होता है सुनहला या पीला। यह दुर्लभ वृक्ष है इसे संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है।

शिक्षक नीरज मुरकुटे ने बताया कि हम दोनों युवा मिलकर ग्रामीणों को पलाश के बारे में जागरूक कर रहे है। मुरकुटे ने बताया कि जबलपुर संभाग में बालाघाट (कटंगी ) से सिवनी के बीच में एक ग्राम में सफेद पलाश का पेड़ है जिसे भी संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। सफेद और पीले पलाश का उपयोग जनजातीय ग्रामीण तंत्रमंत्र के लिए करते है। गौरतलब है कि लाल पलाश बीज से लग जाता वही पीला और सफेद बीज से नहीं होता इसके चलते इसकी स्थिति दुर्लभ हो गई है।

सोर्स - मीडिया रिपोर्ट्स

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