बुधवार, 8 नवंबर 2017

श्रद्धांजलि : बिना बहीखाता पढ़ाते थे स्वर्गीय डीएस बोरीकर सर

राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी 2003 में सम्मान समारोह के दौरान दाएं से दूसरे स्थान पर स्वर्गीय बोरीकर सर। साथ में वाडिया सर, गंगवार मेडम, दिनेश डिगरसे और पंकज चौधरी । 

स्वर्गीय श्री डीएस बोरीकर सेनि शिक्षक (दाएं से दूसरे स्थान पर) शाउमा वि उमरानाला में बतौर वाणिज्य के व्याख्याता व प्रभारी प्राचार्य रहे। गांव की तीन पीढ़ियों ने उनसे शिक्षा प्राप्त की।

मेरे परिवार में मेरे पिता, भाई व मातृकुल से मामा-मौसी ने भी उनसे पढ़ा। श्री बोरीकर सर को विद्यालय में अनुशासन के प्रतीक रूप में जाना जाता रहा है। बिना किताब अकाउंटस, बहीखाता पढ़ाने वाले बोरीकर सर जिन्हें पूरी किताब रटी थी वे इसी विद्यालय मे पढ़े और यहीं से सेवानिवृत्त हुए।

उमरानाला से उनका खास लगाव था। वर्ष 2003 में जब  मैंने राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी में प्रतिभागिता की तब उस हेतु आयोजित सम्मान समारोह में श्री बोरीकर सर भी उपस्थित थे, यह मेरे लिए गौरवान्वित होने का क्षण रहा है।

आज वह वाणिज्य का महारथी अपनी भू-लोक की यात्रा को विराम दे, एक नई यात्रा पर चल पड़ा है। उनका इस संसार से विदा होना शिक्षा जगत में भारी क्षति है।

बताते हुए गर्व महसूस होता है कि सर सेवानिवृत्त होकर भी शिक्षा का ज्ञान प्रसारित करने में पीछे ना रहें वे निरंतर पढ़ाते रहे, गांगीवाड़ा के एक विद्यालय में वे बतौर मेहमान शिक्षक के तौर पर एवं घर में भी पढ़ाते रहे।

मेरे गांव के वरिष्ठ नागरिक और बोरीकर सर के मित्र दादा रामाजी खापरे (69) ने सर के दिव्यलोक प्रस्थान पर गहरे दु:खद शब्दों में कहा "मेरा एक अच्छा दोस्त भी आज चला गया, स्कूल के समय से आज यह समय कैसे आ गया पता ही ना चला। "

(इन शब्दों के साथ स्वर्गीय बोरीकर सर को श्रद्धांजलि अर्पित की है, उनके छात्र और शिक्षक पंकज चौधरी ने)

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