रविवार, 19 नवंबर 2017

पद्मावती काल्पनिक या ऐतिहासिक पात्र, जानिए सच्चाई

पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है या सच्चाई इस बात को लेकर काफी बहस छिड़ी हुई है चूंकि इतिहास मेरे पसंद के  विषयों में से एक है इसलिए मैनें नेट पर उपलब्ध सामग्री और मेरे खुद की लाइब्रेरी में उपलब्ध इतिहास की किताबो में से ये निष्कर्ष निकाला है कि रानी पद्मावती जिन्हें पद्मिनी भी कहते है इनके अस्तित्व में होने का कालघटनाक्रम चित्तौड़ में मिल रहा है । इस बात को हम नकार नही सकते लेकिन  अलाउद्दीन खिलजी जिसने अपने वृद्ध चाचा जो इनके ससुर भी थे, जलालुद्दीन  खिलजी इनकी हत्या की और इनके सिर के टपकते लहू के सामने खुद का राज्याभिषेक कराया। इस अलाउद्दीन ने क्या वाकई पद्मावती को पाने के लिए 1303 में  चितौड़ पर हमला किया था? ये पक्का नही मालूम लेकिन हमला किया चितौड़ पर विजय पाई ये सच है । इसके पहले उसने 1301 में रणथंभौर भी जीता और बाद में 1305 में मांडू भी जीता।

रानी पद्मावती का महल उसका जौहर कुंड सभी के प्रमाण मिल रहे है। इनके पति रतनसिंह मात्र एक साल ईसवी 1302 से 1303 तक राजा रहे । बाद में ये अलाउद्दीन खिलजी के हाथों पराजित हुए। अब सवाल ये है मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पद्मावत का काल ईसवी 1520-25 से 1540 के बीच का समय है यानि पद्मावती और पद्मावत रचना के बीच दो सौ साल से ज़्यादा लम्बी अवधि का अंतराल है जो मुहम्मद जायसी को सवालों के घेरे में खड़ा करती है।अब सवाल ये है बरसो बाद मलिक मुहम्मद जायसी को अलाउद्दीन खिलजी रतनसिंह सिंह पद्मावती के बारे में लिखने की प्रेरणा कैसे मिली। कुछ तो प्रमाण जायसी को मिला होगा तब तो वो आगे बढ़ा है । जायसी को अचानक कोई सपना तो नही आया था कि दो सदी से पहले की घटना को महाभारत काल के संजय की दृष्टि से देखे और उनकी कथा को लिख दे। जायसी ने कैसे इसे लिखा इस बात को समझने के लिए हमे अलाउदीन खिलजी की अगली पीढ़ियों की तरफ बढ़ना होगा जिसमे इस वंश के आखिर में खुसरो खां का वध गाजी मलिक यानी गयासुद्दीन तुगलक ने किया। खिलजी वंश में अंतिम व्यक्ति खुसरो खां जो कुतुबुद्दीन मुबारक शाह का प्रधानमंत्री था ये कुतुबुद्दीन मुबारक शाह को मारकर भी खिलजी वंश का शासन चला ही नही पाया और इसी बरस यानि सन 1320 में इसे गाजी मलिक तुरंत मार कर गद्दी पर बैठ गए। और तुगलक वंश की नींव रख दी।

गाजी मलिक यानि गयासुद्दीन तुगलक का काल  1325 तक है ।उसके बाद मोहम्मद बिन तुगलक आया । यही मोहम्मद बिन तुगलक ही वो कड़ी है जिसके काल मे पद्मावती रतनसिंह और अलाउद्दीन की गाथा गायन के रूप में ज़िन्दा थी मोहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा विद्वान था वो बहुत बड़ा  कला प्रेमी था संगीत से गहरा लगाव था यहां उसके काल में लगभग 1200 गायक थे वो गणित चिकित्सा, दर्शन शास्त्र व अन्य विषयों का विद्वान था ये बात और है उसने दो निर्णय युक्तिपूर्ण नही लिए इसलिए उसे सनकी राजा या मूर्ख बुद्धिमान कहा जाता है पहला उसने अपनी राजधानी का नाम बदलकर दौलताबाद बदला दूसरा मुद्रा के सम्बंध में था l जो उसकी सनक को घोषित करता था।लेकिन ये सच है मुहम्मद बिन तुग़लक़ संगीत का बहुत बड़ा प्रेमी था। इसके बाद उसका चचेरा भाई फिरोज़ शाह तुगलक जो बाद में गद्दी पर बैठा ये तुगलक भी संगीत प्रेमी था है  ये राजा जब सिंहासन पर बैठते तो, जन-साधारण के लिए 21 दिनों तक लगातार  संगीत गोष्ठी का प्रबन्ध किया जाता था।

खुद अलाउद्दीन खिलजी के समय संगीत बहुत ज़्यादा पोषित सम्पन्न विस्तारित था  उसके बाद तुगलक वंश में  गयासुद्दीन तुगलक को छोड़कर संगीत का अस्तित्व आगे बढ़ रहा था ये संगीत ही इस बाद का प्रमाण है कि अलाउद्दीन पद्मावती और रतन सिंह की दासता गान में उपलब्ध थी वरना मुहम्मद जायसी को लिखने के लिये ये सबूत कहाँ से मिलते। यहाँ हमें ये प्रमाण मिल रहे है कि संगीत गायक उस समय भक्ति, राजा महाराजा की वीरता, उनकी प्रेम कथाओं या अन्य चर्चित प्रेमकथाएँ या प्रकृति के चित्रण का गायन में अनुसरण करते थे। तुगलक वंश सन 1414 तक था । अब इस क्षेत्र में और आगे बढ़े तो सैयद वंश आया है जिसने बहुत ज़्यादा उपलब्धि हासिल नही की । ये वंश 1451 तक चला फिर बहलोल लोधी ने लोधी वंश की स्थापना की। लोधी वंश में संगीत बहुत ज़्यादा सक्रिय रहा है, यानि अलाउद्दीन खिलजी पद्मावती की गाथा को आगे बढ़ने का पूरा अवसर मिला 1526 में बाबर ने इब्राहिम लोधी को हराकर मुग़ल वंश की नींव रख दी। मुहम्मद जायसी की रचना के प्रमाण सन लगभगसन 1520 -25से लेकर 1540 के बीच के समय के मिल रहे है और मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पद्मावत में शेरशाह सूरी की तारीफ भी हुई है यानि जायसी आरंभ से शेरशाह के साथ रहा और शेरशाह सूरी बाबर के साथ रहा है। सूरी 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई बाबर की सेना में एक सैनिक था 1530 तक बाबर का शासन था फिर उसके बेटे हुमायूँ का शासनकाल आया। अब सन 1540 की बात करे जब पद्मावत की रचना अस्तित्व में आई। उस समय शेरशाह सूरी के साथ मुहम्मद जायसी की उपस्थिति मिल रही है साथ ही उसके शेरशाह सूरी के प्रति वफ़ादार होने के प्रमाण भी मिल रहे है। इस पद्मावत के भीतर शेरशाह सूरी की प्रशंसा भी शामिल है।कुछ विद्वान प्रमाण के आधार पर ये माने कि पद्मावत का लेखन कार्य 1540 के बहुत  पहले  हो चुका था तो सही लगता है। मोहम्मद जायसी भी शेरशाह सूरी का वफादार था वरना एकदम से सन1540 में शेरशाह सूरी का दिल्ली सल्तनत पर बैठना और जायसी का पद्मावत तुरंत लिख लेना सम्भव नही है।साथ ही इस बात के प्रमाण भी मिल रहे है शेरशाह सूरी की नज़र दिल्ली पर सिहांसन पर घात लगाने की बरसों पहले से थी वो बस हुमायूँ के लापरवाह होने का इंतज़ार कर रहा था और ये बात जायसी भी जानते था तभी तो वह अपनी रचना पद्मावत  का श्रेय  शेरशाह के शासन काल को देना चाहते थे।यानी ये निश्चित था 1540 से पहले से पद्ममावत लिखी जा रही थी या लिखी जा चुकी थी बस मुगलवंश के पतन का अवसर तलाशा जा रहा था। जायसी अपनी कृति पद्मावत मुग़लो को भी समर्पित कर सकता था पर वो तो सूरी का वफादार था। शेरशाह सूरी की ताकत 1537 से उजागर होने लगी थी। 1540 में उसने  हुमायूँ को हराया दिल्ली छोड़ने को मजबूर कर दिया। और 1540 में शेरशाह सूरी और मलिक मुहम्मद  जायसी दोनों पर्दे के पीछे से निकलकर एकदम सामने आ गए और 1540 में पद्मावत कृति पर  प्रमाणिकता की मुहर लग गयी ।

यहां एक और शब्द है मलिक,,, अलाउद्दीन खिलजी  के समय मलिक काफूर साथ था। इन मलिकों को अलाउद्दीन अपने चाचा को मौत के घाट उतारने के लिए लाया था। उसके समय मलिक सैनिक या सेनापति को कहते थे।
खिलजी वंश के बाद तुगलक वंश आया और इसका संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक का नाम पहले गाजी मलिक ही तो था। मुहम्मद जायसी भी मलिक थे यानि मलिक पहले से ही किसी प्रभावी राजा के साथ चल रहे थे। इस आधार पर ये भी तो हो सकता है ये पद्मावत किसी अन्य मलिक की रचना रही हो और शेरशाह सूरी के वफादार होने के कारण 1540 में इसने इस कृति से मूल मलिक को हटाकर अपना नाम दे दिया  या उसकी कृति के आधार पर पद्मावत लिख ली ।क्योकि 1542 में मुहम्मद जायसी की मृत्यु हो चुकी है औरउसके नाम 21 रचनाओं का उल्लेख है ।लेकिन जायसी पद्मावत से प्रसिद्ध हुआ क्यो?पहले से प्रसिद्ध क्यो नही हुआ ।21 रचनाओं में उसने अगर 1540 के पहले भी लिखा हो तो उसके प्रसिद्धि के प्रमाण पद्मावत से पहले क्यो नही मिल रहे है,,यदि हम दिल्ली सल्तनत के इतिहास पर नज़र डालें तो तुगलक वंश के फिरोज शाह तुगलक के समय घूस ख़ोरी और भ्रष्टाचारी शुरू हो चुकी थी।तो हो सकता है शेरशाह सूरी के समय भी भ्रष्टाचार व्याप्त हो।

जो भी हो ये सच है पद्मावती इतिहास के पन्नो में उपस्थित थी वो काल्पनिक नही थी।

शोध कर्ता---
रेडियो ऑडियो प्रोड्यूसर, एंकर ,नाट्यकर्मी,लेखिका
गीतांजलि गीत
20-11-2017


3 टिप्‍पणियां:

मनोज निगम हास्य कवि ने कहा…

वाह दीदी आप ने सत्यता उजागर कर दी कुछ लोगो का कहना है कि पदमावती का कोई अस्तित्व नही था । बधाईया

संजय जोशी "सजग " ने कहा…

खोज पूर्ण लेख शानदार

संजय जोशी "सजग " ने कहा…

खोज पूर्ण आलेख , बहुत शानदार