शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

विपक्ष की महिमा

आप कहेंगे ये कैसा शीर्षक हुआ 'विपक्ष की महिमा' भला विपक्ष का भी कोई महत्त्व होता है, हम बात तो करते है परफ़ेक्ट वर्ल्ड की पर पक्ष-विपक्ष के संतुलन को नकार देते है विपक्ष की अपनी महिमा होती है, विपक्षी को कहीं अधिक मेहनत करनी होती हैं, मोदी जी 18 घंटे काम करते है,पर राहुल बाबा 19 घंटे अपने "विपक्षी पात्र" में बने रहने की कोशिश करते हैं राहुल बाबा की यह मेहनत नकार दी गई है।

मोदी जी के 15 लाख के कोट को बोली लगा के कोई खरीद ले गया, वही राहुल बाबा के फटे कुर्ते को कोई महत्त्व ही नहीं दिया गया। भला ये भी कोई बात हुई,
विपक्षियों की यह मेहनत हमेशा से ही उपेक्षित रही हैं।
सदन का जो हास्य है वो सिर्फ विपक्ष से है, बिना विपक्ष केवल बिजली पानी और विकास के प्रस्ताव जैसे बोरिंग विषयों पर ही बात की जाती और लोकसभा और विधानसभा सदस्यों की अटेंडेंस भी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों सी हो जाती।

जरा कल्पना कीजिये रामायण में यदि रावण नहीं होता तो क्या इतना रस आता, सोने की लंका पुष्पक विमान, अशोक वाटिका सारे रुचिकर द्रव्य रावण के पास थे।
भला रावण होना भी कोई आसान काम था, दस सिरों का बोझ, सोने की लंका का मेंटनेस, कुंभकर्ण सा भाई जो 6-6 महीने सिर्फ खाता था इतना सब सहते हुए भी उसने उफ नहीं की।

रावण नहीं रहे, रहते तो कोई प्रतिष्ठित पब्लिशर उनकी आत्मकथा प्रकाशित करने को उतावला होता, और यक़ीन मानिये रामायण से अधिक प्रतियां बिक गई होती।
बहुत से रामराज्य की कामना करने वाले राजनीतिक दलों को कई दिनों का रोजगार मिल जाता, कोई रावण के खिलाफ मुकदमा दायर करता तो कोई ट्विटर पर ट्वीट वॉर प्रारंभ किए देता फेसबुक पर भी #isupoort_ravan और #ban_ravan ट्रेंड कर रहा होता, मीडिया को प्राइम टाइम TRP मिल जाती, कोई जनकल्याण की संकल्पित पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किए देती।

खलनायकों ने हमेशा से ही परस्वार्थ किया है, नायकों के किरदार बहुत सरल होते है, खलनायकों को बहुत मेहनत करनी होती है, अपने प्रपंच बनाने में भयानक रूप धारण करना पड़ता है, कभी घनी दाढ़ी रखनी होती हैं तो कभी केशों के अनेक स्वांग धरने होते है। नायकों को तो एक प्रेयसी मिलती है, पर खलनायक को 18% GST on cosmetics होने के बावजूद बहुत सी प्रेयसियों को झेलना पड़ता है। खलनायक अपने परिवार को छोड़कर नायक के परिवार की फ़िक्र करता है,जाने कितनी फिल्मों में बिछड़े/बिखरे हुए परिवार को खलनायकों ने अपने अड्डे /ठिकाने में मिलवाया है।

नायक को "नायक" की उपाधि खलनायक के कारण मिलती है, खलनायको की पूरी जिंदगी इसी को मेंटेन करने में ज़ाया हुई जाती है।

इति समाप्तम...

डॉ.आशीष पाल "मुसाफ़िर"


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