गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

अमेरिका में महिला अधिकारों की वकालत करेगी दया बाई

  • 1980 में छिंदवाड़ा में मजदूरी से जिंदगी के सफर की शुरुआत
  • केरल के कोटम जिले में 22 फरवरी 1941 में जन्मी है दया बाई 
  • दस साल पहले अभिनेत्री नंदिता दास ने छिंदवाड़ा आकर समर्थन किया
  • जीवन की सांझ में अमेरिका में मिलेगा अंतराष्ट्रीय सम्मान

छिंदवाड़ा. मजदूरी से जिंदगी के सफर की शुरुआत करने वाली दया बाई अमेरिका में न केवल महिला अधिकारों की वकालत करेंगी बल्कि अंतराष्ट्रीय बिरादरी के समक्ष अपने संघर्षमय जीवन का अनुभव भी सुनाएंगी। इस 75 वर्षीय महिला को इंडो-अमेरिका प्रेस क्लब की ओर से न्यूयार्क में 9 से 12 अक्टूबर तक आयोजित कान्फ्रेंस में आदिवासियों और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिए सम्मानित करने के लिए चुना गया है।

जिला मुख्यालय से 70 किमी दूर हर्रई के पास सघन आदिवासी ग्राम वरूड़ की महिला का मूल नाम मैथ्यू मरसी है। वे आदिवासियों के बीच दयाबाई के नाम से ज्यादा लोकप्रिय है। केरल के कोटम जिले के पुवरली गांव में 22 फरवरी 1941 में जन्मी दया ने बीएससी, एलएलबी और एमएसडब्ल्यू जैसी डिग्री हासिल की और वर्ष 1980 में हर्रई में बस गई। शुरुआती दिनों में उन्हें 5 रुपए दिन की मजदूरी करनी पड़ी। इस 36 वर्ष के दौरान आदिवासियों को उचित मजदूरी दिलाने, वन और पुलिस उत्पीडऩ से बचाने और मानव अधिकार उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठाने में उन्होंने राष्ट्रीय पहचान बना ली है।

संघर्ष की इस शख्सियत दया ने 'पत्रिकाÓ को बताया कि वे 8 अक्टूबर को दिल्ली से न्यूयार्क के लिए रवाना होंगी। अंतराष्ट्रीय कान्फ्रेंस में उनका व्याख्यान होगा। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र सभा में भी उनके आमंत्रित किया गया है। उनका मकसद महिला अधिकारों के साथ पर्यावरण के संरक्षण के प्रति जागरुकता है। वे छिंदवाड़ा के आदिवासी अंचल में रहकर यहीं काम कर रही है।

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अब तक मिले राष्ट्रीय पुरस्कार
  1. वनीता वूमन ऑफ द ईयर पुरस्कार-2007
  2. अयोध्या रामायण ट्रस्ट पुरस्कार-2008
  3. होली वूमन ऑफ ईयर पुरस्कार-2010
  4. रोटरी क्लब नेशनल अवार्ड-2011,12 व 15
  5. इसके अलावा केरल की 11-12वीं की पुस्तकों में दया के संघर्ष की कहानी।

मांगा था 15 दिन का वीजा, मिला दस साल का
इस 75 वर्षीय महिला ने न्यूयार्क जाने के लिए अमेरिकी विदेश विभाग में 15 दिन के वीजा की मांग की थी लेकिन अमेरिकी सरकार ने उनकी उपलब्धियों को देखते हुए दस साल का वीजा दे दिया। हालांकि दया के पास पासपोर्ट की अवधि पांच साल है।

तब उनके समर्थन में आई थी नंदिता दास
आदिवासी महिलाओं के हित में संघर्षरत दयाबाई बताती है कि उन्होंने हर्रई की आदिवासी महिलाओं को दूरदराज के इलाकों में बेचने का मामला हमेशा जोर-शोर से उठाया है। दस साल पहले फिल्म अभिनेत्री नंदिता दास ने छिंदवाड़ा आकर उनका समर्थन किया था। एक अन्य अनुभव में उन्होंने ग्राम बारगी में स्कूल खोलने के संघर्ष के बारे में बताया, जिसमें उन्हें स्थानीय राजनीतिज्ञों से लेकर सरकार तक से आदिवासियों की शिक्षा के लिए लडऩा पड़ा।
साभार- पत्रिका छिंदवाड़ा

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