शनिवार, 27 जून 2015

छिंदवाड़ा की शान : बेबाक और जुनूनी है हमारी कनिका शर्मा

‪#‎बेबाकलड़कियां‬


आज से करीब 18 साल पहले मेरे गृहनगर छिंदवाड़ा (म.प्र) में स्कूल जाने  को मैने पहली बार देखा था, और फिर यदाकदा उस बच्ची से मुलाकात भी हो जाया करती थी। अक्सर मुंह में उंगली दबाए, चुपचाप एक किनारे खड़ी रहने वाली, गुमसुम सी नन्ही कनिका किसी दिन भरपूर साहस और पूरे जुनून के साथ सबसे आगे खड़ी दिखेगी, वो भी एक लीड़र बनकर, कभी सोचा ना था। 
वाली एक नन्ही सी बच्च

कनिका की माँ स्वयं एक समाजसेविका, चिंतक, संजिदा महिला और बेहतरीन प्रोफेसर हैं, जबकि पिता एक बैंकर हैं। किसी बच्चे में पारिवारिक संस्कारों को देखना हो तो सालों उनके साथ समय बिताने की जरूरत नहीं होती, बच्चों से पहली एक दो मुलाकातों में ही उनके पैतृक और पारिवारिक संस्कारों को समझा जा सकता है।

डॉ. दीपक आचार्य सर के साथ कनिका शर्मा।
अक्सर खामोश सी रहने वाली कनिका स्कूली शिक्षा के शुरुआती दौर में कतई होनहार नहीं रही लेकिन आर्मी स्कूल में अपने भाई के दाखिले के बाद वो घर में लगभग अकेली सी पड़ गयी और इसी समय ने कनिका को बदलना शुरु किया और फिर माता-पिता और अपने बड़े भाई की प्रेरणा से कनिका ने पूरा दमखम अपनी पढ़ाई में लगाया और वो कर दिखाया जो उस छोटे से शहर के बच्चों के लिए अकल्पनीय सा होता है। गला-काट "कट-ऑफ" के दौर में दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में कनिका को बी.ए. ऑनर्स में दाखिला मिलना, मेरे कान खड़े करने देने वाली खबर थी क्योंकि मैने कभी उसे इतना काबिल नहीं समझा था।

इन दिनों मैं भी कनिका के संपर्क में नहीं था, इस खबर के लगते ही मैने कनिका से फोन पर बात की। उस दिन कनिका से बात करके महसूस किया कि दरअसल कनिका का असल जुनून दिखना अभी भी बाकी है। दिल्ली से ग्रेज्यूएशन निपटने के बाद कनिका पोस्ट-ग्रेज्युएट कोर्स के लिए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़, तुलजापुर, महाराष्ट्र में चयनित हुयीं, ये एक बार फिर बेहद खुशी और गर्व महसूस कराने वाली खबर थी। इस दौर में कनिका कभी महाराष्ट्र में गढ़चिरोली के नक्सल प्रभावित लोगों के साथ समय गुजारती तो कभी मेघा पाटकर जी के नर्मदा बचाओ आन्दोलन में समूह में सबसे आगे होती और कभी दयाबाई के साथ।

इसी दौरान कनिका ने मेरे साथ काम करने की इच्छा जाहिर की, पातालकोट जाना चाहा। मध्यप्रदेश में पातालकोट 3000 फ़ीट गहरी घाटी हैं जो आज भी आधुनिक समाज से कटा हुआ इलाका है। करीब 2500 वनवासियों और 79 स्के.किमी. के क्षेत्रफल में फैले इस घने जंगल और वनवासी इलाके में काम करना आसान नहीं। एक बार घाटी में जाने के बाद आप दुनिया से अलग हो जाते हैं, संपर्क विहीन।

अपनी इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट के सिलसिले में कनिका ने अपने कार्यक्षेत्र के लिए इस घाटी को चुना। स्थानीय वनवासियों के रहन-सहन, खान-पान और प्यार से प्रभावित होकर कनिका ने इस घने जंगल में वनवासियों परिवारों के साथ एक नहीं कई हप्ते गुजारे, एक बार नहीं, कई बार गुजारे..उन्ही के साथ रहना, खाना और दिन-रात व्यतीत करना, उन्ही के जैसा रहना और इनकी समस्याओं को समझकर इन्हें सुलझाना। ये कनिका के लिए कोई "प्लेज़र ट्रिप" ना थी, ये दौर उसे खुद को खुद से पहचान दिलाने वाला था।

महज 21-22 साल की उम्र से बुजुर्गों जैसी सोच, समाज सेवा का भाव और समाज के दबे कुचले तबके के दर्द को समझना और इसे समझकर सुलझाने के उपाय निकालना और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने की सोच के लिए मैं कनिका को बेबाक मानता हूँ। बिहार के सुदूर इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के साथ लंबा वक्त गुजारने के बाद वहाँ PDS की समस्याओं के लिए इन्होनें अपने मित्रों के साथ मिलकर तात्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को जो पत्र लिखा वो PMO में चर्चा का विषय भी बना और तमाम बड़े से बड़े राष्ट्रीय दैनिक अखबारों ने उस पत्र को प्रकाशित भी किया।

इतनी कम उम्र में कनिका का इस तरह समाज सेवा के भाव से जुनूनी होना माँ-पिता और भाई के लिए जरूर गर्व का विषय है लेकिन उनकी इस विषय पर फिक्रमंदी भी जायज़ है। और क्यों ना हो, एक आन्दोलन के लिए अकेली कोलकाता चले जाने के बाद कनिका इतनी बीमार हुयी कि उन्हें वहाँ सरकारी अस्पताल में कई दिनों के लिए दाखिल कराना पड़ा और इस बात की जरा सी भी खबर किसी को ना हुयी। अस्पताल से जैसे तैसे खबर मिलने के बाद ही पता चला की शरीर में खून की भारी कमी के चलते कनीका को आराम करने की सख्त हिदायत है। लेकिन, इतना सब होने के बाद जब मैनें उससे फोन पर बात की तो उसके जुनून और बेबाकीपन में जरा भी कमी नहीं दिखायी दी। फिलहाल कनिका दिल्ली में हैं, कई दिनों से उससे चर्चा भी नहीं हुयी है, लेकिन मेरा दावा है वो कुछ ऐसा कर रही होगी जो मेरा सीना चौड़ा करने के लिए काफी होगा। धन्य हैं कनिका की माँ प्रो. अनिता शर्मा (Anita Sharma) और उनके पिता, धन्य है कनिका के भाई करण (Karan Sharma)।
कनिका मुझे तुम पर बेहद गर्व है..तुम हो असल बेबाक लड़की और ऐसी ही होनी चाहिए #बेबाकलड़कियां..पता है क्या, अपनी आंखों के सामने इतिहास बनते देखना बेहद सुकून देता है, तुम सुकून हो मेरा..खुश रहो कनिका
------------------------

Kanchan Pant आपकी किताब 'बेबाक' के लिए ढेर सारी शुभकामनायें
अब Rashmi Thakur Nambiar, Yamini Misra, Sukanya Rath, Jamshed Qamar Siddiqui, Anurag Punetha मैं आपको नॉमिनेट करता हूँ. आपके जीवन में आयी कनिका की तरह एक बेबाक लड़की के बारे में हम सब को बताकर उसे सराहें, सम्मान दें और दुनिया को इनकी ताकत और ज़ज्बे से रूबरू कराएं.

कृपया हिन्दी में #बेबाकलड़कियां या अंग्रेजी में ‪#‎BebaakLadkiyan‬ हैशटैग का प्रयोग ज़रूर करें..
अपनी बात रखें, पूरी बेबाकी से

साभार- डॉॅ. दीपक आचार्य @+Dr Deepak Acharya के फेसबुक वॉल से 

कोई टिप्पणी नहीं: