गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

अमेरिका में महिला अधिकारों की वकालत करेगी दया बाई

  • 1980 में छिंदवाड़ा में मजदूरी से जिंदगी के सफर की शुरुआत
  • केरल के कोटम जिले में 22 फरवरी 1941 में जन्मी है दया बाई 
  • दस साल पहले अभिनेत्री नंदिता दास ने छिंदवाड़ा आकर समर्थन किया
  • जीवन की सांझ में अमेरिका में मिलेगा अंतराष्ट्रीय सम्मान

छिंदवाड़ा. मजदूरी से जिंदगी के सफर की शुरुआत करने वाली दया बाई अमेरिका में न केवल महिला अधिकारों की वकालत करेंगी बल्कि अंतराष्ट्रीय बिरादरी के समक्ष अपने संघर्षमय जीवन का अनुभव भी सुनाएंगी। इस 75 वर्षीय महिला को इंडो-अमेरिका प्रेस क्लब की ओर से न्यूयार्क में 9 से 12 अक्टूबर तक आयोजित कान्फ्रेंस में आदिवासियों और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिए सम्मानित करने के लिए चुना गया है।

जिला मुख्यालय से 70 किमी दूर हर्रई के पास सघन आदिवासी ग्राम वरूड़ की महिला का मूल नाम मैथ्यू मरसी है। वे आदिवासियों के बीच दयाबाई के नाम से ज्यादा लोकप्रिय है। केरल के कोटम जिले के पुवरली गांव में 22 फरवरी 1941 में जन्मी दया ने बीएससी, एलएलबी और एमएसडब्ल्यू जैसी डिग्री हासिल की और वर्ष 1980 में हर्रई में बस गई। शुरुआती दिनों में उन्हें 5 रुपए दिन की मजदूरी करनी पड़ी। इस 36 वर्ष के दौरान आदिवासियों को उचित मजदूरी दिलाने, वन और पुलिस उत्पीडऩ से बचाने और मानव अधिकार उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठाने में उन्होंने राष्ट्रीय पहचान बना ली है।

संघर्ष की इस शख्सियत दया ने 'पत्रिकाÓ को बताया कि वे 8 अक्टूबर को दिल्ली से न्यूयार्क के लिए रवाना होंगी। अंतराष्ट्रीय कान्फ्रेंस में उनका व्याख्यान होगा। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र सभा में भी उनके आमंत्रित किया गया है। उनका मकसद महिला अधिकारों के साथ पर्यावरण के संरक्षण के प्रति जागरुकता है। वे छिंदवाड़ा के आदिवासी अंचल में रहकर यहीं काम कर रही है।

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अब तक मिले राष्ट्रीय पुरस्कार
  1. वनीता वूमन ऑफ द ईयर पुरस्कार-2007
  2. अयोध्या रामायण ट्रस्ट पुरस्कार-2008
  3. होली वूमन ऑफ ईयर पुरस्कार-2010
  4. रोटरी क्लब नेशनल अवार्ड-2011,12 व 15
  5. इसके अलावा केरल की 11-12वीं की पुस्तकों में दया के संघर्ष की कहानी।

मांगा था 15 दिन का वीजा, मिला दस साल का
इस 75 वर्षीय महिला ने न्यूयार्क जाने के लिए अमेरिकी विदेश विभाग में 15 दिन के वीजा की मांग की थी लेकिन अमेरिकी सरकार ने उनकी उपलब्धियों को देखते हुए दस साल का वीजा दे दिया। हालांकि दया के पास पासपोर्ट की अवधि पांच साल है।

तब उनके समर्थन में आई थी नंदिता दास
आदिवासी महिलाओं के हित में संघर्षरत दयाबाई बताती है कि उन्होंने हर्रई की आदिवासी महिलाओं को दूरदराज के इलाकों में बेचने का मामला हमेशा जोर-शोर से उठाया है। दस साल पहले फिल्म अभिनेत्री नंदिता दास ने छिंदवाड़ा आकर उनका समर्थन किया था। एक अन्य अनुभव में उन्होंने ग्राम बारगी में स्कूल खोलने के संघर्ष के बारे में बताया, जिसमें उन्हें स्थानीय राजनीतिज्ञों से लेकर सरकार तक से आदिवासियों की शिक्षा के लिए लडऩा पड़ा।
साभार- पत्रिका छिंदवाड़ा

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

यादें ही शेष रह जाएगी छिंदवाड़ा-नागपुर नैरोगेज लाइन की

  • 750 किमी की नैरोगेज लाइन बन जाएगी इतिहास
  • विश्व की सबसे बड़ी नैरोगेज रेल लाइन 1913 में शुरू हुई
  • ब्लॉक के बाद 102 साल की यादें हो जाएंगी खत्म


छिंदवाड़ालंबे समय से एशिया के सबसे बड़े नैरोगेज जंक्शन के रूप में पहचाना जाने वाला नैनपुर अब कुछ दिनों के बाद इतिहास बन जाएगा। यह जंक्शन तो रहेगा, लेकिन एशिया में सबसे बड़े नैरोगेज लाइन के जक्शन के रूप में इसकी पहचान समाप्त हो जाएगी। विगत दिनों स्टेशन अधीक्षक नैनपुर एससी दास व विश्व के चर्चित पत्रकार मार्क टुली के बीच हुए संवाद पर गौर करें तो यह दु:खद है। लेकिन आदिवासी जिले मंडला और नैनपुर के विकास में यह दु:खद पहल 'एक मील का पत्थर साबित होगा। इसकी कल्पना तो की जा रही थी। क्रियान्वयन लम्बे इंतजार के बाद सामने आया हैं।
वर्ष 1913 में अंग्रेजी हुकूमत ने नागपुर-जबलपुर के बीच नैरोगेज लाइन की शुरुआत की। उस समय यहां के लोगों के आवागमन के लिए यह साधन किसी चमत्कार से कम नहीं था। उक्त रेलमार्ग के बीच स्थित नैनपुर एशिया के सबसे बड़े नैरोगेज लाइन के जंक्शन के रूप में पहचान बनाई। प्रमुख केन्द्र होने के साथ ही नैनपुर में वर्ष 1965 तक डीआरएम कार्यालय भी संचालित होता रहा।

विश्व की सबसे बड़ी नैरोगेज रेल लाइन का तगमा भी होगा समाप्त

नागपुर-जबलपुर, नैनपुर-बालाघाट व नैनपुर-मंडला फोर्ट के बीच करीब 750 किलोमीटर की नैरोगेज रेललाइन है। यह रेललाइन विश्व की सबसे बड़ी नैरोगेज लाइन है। एक अक्टूबर से लिए जा रहे ब्लॉक के बाद वर्ष 2018 तक यह ब्रॉडगेज लाइन बन जाएगी। ब्लॉक के बाद ही विश्व की सबसे बड़ी रेललाइन का तगमा भी समाप्त हो जाएगा।

950 कर्मचारी हैं तैनात

नैनपुर में करीब 950 कर्मचारी व अधिकारी वर्तमान समय में कार्यरत हैं। इनमें कौन रहेगा और किसको हटाया जाना है, अभी यह तय नहीं हो पाया है। लेकिन उनके स्थानांतरण के संकेत मिल चुके हैं। नैनपुर में करीब नौ सौ रेलवे के आवास भी है,जहां कर्मचारी, अधिकारी निवास करते हैं।
नैरोगेज बंद करने को लेकर मार्क टुली से हुए संवाद में इसको दु:खद बताया, लेकिन विकास के लिए यह आवश्यक है। ब्लॉक इतनी जल्दी मिल जाएगा, इसका अनुमान नहीं था। नैरोगेज लाइन में नैनपुर एशिया का सबसे बड़ा जंक्शन है। नैरोगेज रेल लाइन भी विश्व की सबसे बड़ी लाइन के रूप में जानी जाती है। यह अब इतिहास की बात हो जाएगी।

एससी दास, स्टेशन अधीक्षक नैनपुर जंक्शन
सोर्स- पत्रिका, छिंदवाड़ा

शनिवार, 19 सितंबर 2015

नागपुर-नैनपुर-मंडलाफोर्ट पर एक नवंबर से नहीं चलेगी ट्रेन

वर्ष 2005 से शुरू हुआ ब्रॉडगेज निर्माण का सफर
छिंदवाड़ा.गेज परिवर्तन के लिए ब्लॉक को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लग गया। रेलवे बोर्ड ने एक अक्टूबर से ब्लॉक लिए जाने की अनुमति प्रदान कर दी। नागपुर-छिंदवाड़ा-नैनपुर-मंडलाफोर्ट पर एक नवम्बर को नैरोगेज का पहिया थम जाएगा। बालाघाट-नैनपुर-जबलपुर रेलमार्ग पर एक अक्टूबर को ब्लॉक लिया जाएगा।

यह रेलमार्ग गोंदिया-जबलपुर प्रोजेक्ट से जुड़ा है।
करीब सात साल से अधिक समय से नैरोगेज को ब्रॉडगेज बनाने के चल रहे कार्यों को अंतिम रूप देने की तिथि रेलवे बोर्ड ने तय कर दी। अब उम्मीद जताई जा रही है कि वर्ष 2018 में नागपुर-जबलपुर के बीच अलग-अलग सेक्शन में ब्लॉक खोलकर ब्रॉडगेज की शुरुआत हो जाएगी। इसके लिए ब्रॉडगेज का कार्य कर रही रेलवे की कंस्ट्रक्शन टीम ने बोर्ड को वर्ष 2017 में छिंदवाड़ा-नागपुर का कार्य पूरा करने, वर्ष 2018 तक जबलपुर तक ब्रॉडगेज लाइन शुरू करने को कहा है। इसकी पुष्टि बिलासपुर जोन के सीपीआरओ ने की है। अब देखना यह है कि कंस्ट्रक्शन टीम अपनी बातों पर कितना खरा उतरती है।
       एक अक्टूबर को बंद होने वाले सेक्शन
  1. जबलपुर-नैनपुर : ये ट्रेनें होंगी बंद
  2. एक्सप्रेस- सतपुड़ा अप (10001
  3. बीटीसी-जेबीपी), डाउन (1002 जेबीपी-बीटीसी)।
  4. पैसेंजर- छह अप व छह डाउन।
  5. नैनपुर-बालाघाट :ये ट्रेनें होंगी बंद
  6. एक्सप्रेस- सतपुड़ा अप (10001 बीटीसी-जेबीपी),
  7. डाउन (1002 जेबीपी-बीटीसी),
  8. पैसेंजर- छह अप व छह डाउन।
एक अक्टूबर को बंद होने वाले सेक्शन
जबलपुर-नैनपुर : ये ट्रेनें होंगी बंद एक्सप्रेस- सतपुड़ा अप (10001 बीटीसी-जेबीपी), डाउन (1002 जेबीपी-बीटीसी)। पैसेंजर- छह अप व छह डाउन।
नैनपुर-बालाघाट :ये ट्रेनें होंगी बंद� एक्सप्रेस- सतपुड़ा अप (10001 बीटीसी-जेबीपी), डाउन (1002 जेबीपी-बीटीसी), पैसेंजर- छह अप व छह डाउन।
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एक नवम्बर को बंद होने वाले सेक्शन
  1. नैनपुर-छिंदवाड़ा : ये ट्रेनें होंगी बंद  पैसेंजर- पांच अप व पांच डाउन।
  2. नैनपुर-मंडलाफोर्ट:पैसेंजर- तीन अप व तीन डाउन।
  3. नागपुर-छिंदवाड़ा:पैसेंजर छह अप व छह डाउन।

वर्ष 2005 में सर्वे कार्य से गेज परिवर्तन का कार्य शुरू हुआ। तीन वर्षों तक सर्वे का कार्य हुआ। वर्ष 2008 से निर्माण कार्य शुरू हुआ। टनल सहित ब्रिज के कार्य अब भी निर्माणधीन है। कुछ जगहों पर मिट्टी कार्य हुए हैं, जबकि अधिकांश जगह पर अभी मिट्टी कार्य अधूरा है। मेगा ब्लॉक के बाद इन कार्यों को तेजी से पूरा किया जाना है। कंस्ट्रक्शन टीम के लिए आसान नहीं है। कंस्ट्रक्शन टीम के सदस्य भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि टेण्डर फेल नहीं हुआ तो वर्ष 2018 तक कार्य पूरा हो जाएगा। यदि एक भी टेण्डर फेल हुआ तो पूरा होने में विलम्ब स्वभाविक है।

नागपुर-जबलपुर व बालाघाट-जबलपुर के बीच संचालित नैरोगेज टे्रन में यात्रा करने के लिए जिन यात्रियों ने टिकट आरक्षित कराएं हैं। उनको पूरा पैसे वापस कर दिए जाएंगे। रेलवे बोर्ड से ब्लॉक की अनुमति मिल गई है। बालाघाट-नैनपुर-जबलपुर पर एक अक्टूबर व नागपुर-छिंदवाड़ा-नैनपुर-मंडला फोर्ट पर एक नवम्बर को ब्लॉक लिया जाना है। वर्ष 2017-18 के बीच कार्य के पूरा होने की उम्मीद है। इस दौरान ब्रॉडगेज अलग-अलग सेक्शन में खोला जाएगा।
आरके अग्रवाल, सीपीआरओ बिलासपुर जोन
इन विभाग में मची हलचल, बड़े पैमाने पर होगा स्थानांतरण

उक्त ब्लॉक के साथ ही यहां कार्यरत अधिकांश अधिकारियों, कर्मचारियों का स्थानांतरण तय हो गया। इनमें कामर्शियल 30, आपरेटिंग 25, इंजीनियरिंग 175, कैरिज एण्ड वैगन 20, लोको 110, इलेक्ट्रिकल 25 व मेडिकल के करीब 10 अधिकारी, कर्मचारी शामिल हंै। इलेक्ट्रिकल, मेडिकल से कम लोगों का स्थानांतरण होना है। शेष विभागों में बड़े पैमान पर लोगों को इधर-उधर भेजा जाएगा। इसके लिए सभी को फार्म देकर जोन के तीन स्थानों का आप्शन मांगा गया है।

साभार- पत्रिका डॉट कॉम 

शनिवार, 27 जून 2015

छिंदवाड़ा की शान : बेबाक और जुनूनी है हमारी कनिका शर्मा

‪#‎बेबाकलड़कियां‬


आज से करीब 18 साल पहले मेरे गृहनगर छिंदवाड़ा (म.प्र) में स्कूल जाने  को मैने पहली बार देखा था, और फिर यदाकदा उस बच्ची से मुलाकात भी हो जाया करती थी। अक्सर मुंह में उंगली दबाए, चुपचाप एक किनारे खड़ी रहने वाली, गुमसुम सी नन्ही कनिका किसी दिन भरपूर साहस और पूरे जुनून के साथ सबसे आगे खड़ी दिखेगी, वो भी एक लीड़र बनकर, कभी सोचा ना था। 
वाली एक नन्ही सी बच्च

कनिका की माँ स्वयं एक समाजसेविका, चिंतक, संजिदा महिला और बेहतरीन प्रोफेसर हैं, जबकि पिता एक बैंकर हैं। किसी बच्चे में पारिवारिक संस्कारों को देखना हो तो सालों उनके साथ समय बिताने की जरूरत नहीं होती, बच्चों से पहली एक दो मुलाकातों में ही उनके पैतृक और पारिवारिक संस्कारों को समझा जा सकता है।

डॉ. दीपक आचार्य सर के साथ कनिका शर्मा।
अक्सर खामोश सी रहने वाली कनिका स्कूली शिक्षा के शुरुआती दौर में कतई होनहार नहीं रही लेकिन आर्मी स्कूल में अपने भाई के दाखिले के बाद वो घर में लगभग अकेली सी पड़ गयी और इसी समय ने कनिका को बदलना शुरु किया और फिर माता-पिता और अपने बड़े भाई की प्रेरणा से कनिका ने पूरा दमखम अपनी पढ़ाई में लगाया और वो कर दिखाया जो उस छोटे से शहर के बच्चों के लिए अकल्पनीय सा होता है। गला-काट "कट-ऑफ" के दौर में दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में कनिका को बी.ए. ऑनर्स में दाखिला मिलना, मेरे कान खड़े करने देने वाली खबर थी क्योंकि मैने कभी उसे इतना काबिल नहीं समझा था।

इन दिनों मैं भी कनिका के संपर्क में नहीं था, इस खबर के लगते ही मैने कनिका से फोन पर बात की। उस दिन कनिका से बात करके महसूस किया कि दरअसल कनिका का असल जुनून दिखना अभी भी बाकी है। दिल्ली से ग्रेज्यूएशन निपटने के बाद कनिका पोस्ट-ग्रेज्युएट कोर्स के लिए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़, तुलजापुर, महाराष्ट्र में चयनित हुयीं, ये एक बार फिर बेहद खुशी और गर्व महसूस कराने वाली खबर थी। इस दौर में कनिका कभी महाराष्ट्र में गढ़चिरोली के नक्सल प्रभावित लोगों के साथ समय गुजारती तो कभी मेघा पाटकर जी के नर्मदा बचाओ आन्दोलन में समूह में सबसे आगे होती और कभी दयाबाई के साथ।

इसी दौरान कनिका ने मेरे साथ काम करने की इच्छा जाहिर की, पातालकोट जाना चाहा। मध्यप्रदेश में पातालकोट 3000 फ़ीट गहरी घाटी हैं जो आज भी आधुनिक समाज से कटा हुआ इलाका है। करीब 2500 वनवासियों और 79 स्के.किमी. के क्षेत्रफल में फैले इस घने जंगल और वनवासी इलाके में काम करना आसान नहीं। एक बार घाटी में जाने के बाद आप दुनिया से अलग हो जाते हैं, संपर्क विहीन।

अपनी इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट के सिलसिले में कनिका ने अपने कार्यक्षेत्र के लिए इस घाटी को चुना। स्थानीय वनवासियों के रहन-सहन, खान-पान और प्यार से प्रभावित होकर कनिका ने इस घने जंगल में वनवासियों परिवारों के साथ एक नहीं कई हप्ते गुजारे, एक बार नहीं, कई बार गुजारे..उन्ही के साथ रहना, खाना और दिन-रात व्यतीत करना, उन्ही के जैसा रहना और इनकी समस्याओं को समझकर इन्हें सुलझाना। ये कनिका के लिए कोई "प्लेज़र ट्रिप" ना थी, ये दौर उसे खुद को खुद से पहचान दिलाने वाला था।

महज 21-22 साल की उम्र से बुजुर्गों जैसी सोच, समाज सेवा का भाव और समाज के दबे कुचले तबके के दर्द को समझना और इसे समझकर सुलझाने के उपाय निकालना और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने की सोच के लिए मैं कनिका को बेबाक मानता हूँ। बिहार के सुदूर इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के साथ लंबा वक्त गुजारने के बाद वहाँ PDS की समस्याओं के लिए इन्होनें अपने मित्रों के साथ मिलकर तात्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को जो पत्र लिखा वो PMO में चर्चा का विषय भी बना और तमाम बड़े से बड़े राष्ट्रीय दैनिक अखबारों ने उस पत्र को प्रकाशित भी किया।

इतनी कम उम्र में कनिका का इस तरह समाज सेवा के भाव से जुनूनी होना माँ-पिता और भाई के लिए जरूर गर्व का विषय है लेकिन उनकी इस विषय पर फिक्रमंदी भी जायज़ है। और क्यों ना हो, एक आन्दोलन के लिए अकेली कोलकाता चले जाने के बाद कनिका इतनी बीमार हुयी कि उन्हें वहाँ सरकारी अस्पताल में कई दिनों के लिए दाखिल कराना पड़ा और इस बात की जरा सी भी खबर किसी को ना हुयी। अस्पताल से जैसे तैसे खबर मिलने के बाद ही पता चला की शरीर में खून की भारी कमी के चलते कनीका को आराम करने की सख्त हिदायत है। लेकिन, इतना सब होने के बाद जब मैनें उससे फोन पर बात की तो उसके जुनून और बेबाकीपन में जरा भी कमी नहीं दिखायी दी। फिलहाल कनिका दिल्ली में हैं, कई दिनों से उससे चर्चा भी नहीं हुयी है, लेकिन मेरा दावा है वो कुछ ऐसा कर रही होगी जो मेरा सीना चौड़ा करने के लिए काफी होगा। धन्य हैं कनिका की माँ प्रो. अनिता शर्मा (Anita Sharma) और उनके पिता, धन्य है कनिका के भाई करण (Karan Sharma)।
कनिका मुझे तुम पर बेहद गर्व है..तुम हो असल बेबाक लड़की और ऐसी ही होनी चाहिए #बेबाकलड़कियां..पता है क्या, अपनी आंखों के सामने इतिहास बनते देखना बेहद सुकून देता है, तुम सुकून हो मेरा..खुश रहो कनिका
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Kanchan Pant आपकी किताब 'बेबाक' के लिए ढेर सारी शुभकामनायें
अब Rashmi Thakur Nambiar, Yamini Misra, Sukanya Rath, Jamshed Qamar Siddiqui, Anurag Punetha मैं आपको नॉमिनेट करता हूँ. आपके जीवन में आयी कनिका की तरह एक बेबाक लड़की के बारे में हम सब को बताकर उसे सराहें, सम्मान दें और दुनिया को इनकी ताकत और ज़ज्बे से रूबरू कराएं.

कृपया हिन्दी में #बेबाकलड़कियां या अंग्रेजी में ‪#‎BebaakLadkiyan‬ हैशटैग का प्रयोग ज़रूर करें..
अपनी बात रखें, पूरी बेबाकी से

साभार- डॉॅ. दीपक आचार्य @+Dr Deepak Acharya के फेसबुक वॉल से 

गुरुवार, 25 जून 2015

फिर ना लगे देश में कभी भी आपातकाल !

छिंदवाड़ा। 25 जून 1975 इस दिन को याद कर ही मीसाबंदी सिहर उठते हैं, इसी दिन जिले में सैकड़ों समाजसेविओं और राजनेताओं को आपातकाल के नाम पर जेलों में ठूंस दिया गया, जिन्हें मीसाबंदी कहा जाता है, 19 महीने मीसाबंदियों ने जेल में ही बिताए। इमरजेंसी के 40 साल पूरे होने पर नवदुनिया की टीम ने मीसाबंदियों से आपातकाल का दौर और वर्तमान परिस्थिति पर राय जानी। मीसाबंदियों के मुताबिक उन्हें नहीं लगता अब देश में दोबारा इमरजेंसी के हालात बनेंगे। हालांकि जेपी आंदोलन के बाद कोई दूसरा बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं होने से मीसाबंदी निराश हैं।

उनका मानना है कि अब लोगों में पहले जैसा जज्बा नहीं रहा। मीसाबंदियों के मुताबिक आजाद देश में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए ये सबसे बड़ी लड़ाई थी। 79 वर्षीय मीसाबंदी जयचंद जैन के मुताबिक अब आपातकाल आने जैसी स्थिति नजर नहीं आती, फिर भी यदि ऐसे हालात बने तो वो देश के नाम पर दोबारा जेल जाने को तैयार हैं। उनके मुताबिक भले ही सरकार अब पेंशन देती है। लेकिन जो यातनाएं मीसाबंदी और उनके परिवार वालों ने सही उसका खामियाजा कभी नहीं चुकाया जा सकता।

पूरे परिवार को जेल में डाल दिया
बीजेपी जिला अध्यक्ष रमेश पोफली के मुताबिक उनके पूरे परिवार को जेल में डाल दिया गया। घर में 8 पुरूष सदस्य थे सभी को जेल भेजा गया। उस वक्त उनकी उम्र भी मात्र 16 साल की थी। इस दौर में भी पूरे परिवार ने पूरे हौंसले के साथ परिस्थितियों का सामना किया।

लोगों ने घर आना बंद कर दिया
मीसाबंदियों के मुताबिक आपातकाल के दौरान परिवार के लोगों को भी खासी मुश्किल का सामना करना पड़ा। आपातकाल को लेकर लोगों में इतनी दहशत भर गई थी कि उन्होंने मीसाबंदियों के घर तक जाना छोड़ दिया था। घर में खाने के लाले पड़ गए थे।

इनका कहना है
आडवाणी जी वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन देश में दोबारा इमरजेंसी लगने की आशंका वाले उनके बयान से मैं असहमत हूं, अब देश में लोकतांत्रिक सरकार है। इसलिए ऐसी कोई संभावना नहीं है।
रमेश पोफली, जिलाध्यक्ष, बीजेपी

इमरजेंसी के दौरान हमें इस तरह प्रताड़ित किया गया कि जैसे हम आतंकवादी हों। भगवान करे कि देश को दोबारा ऐसे दिन न देखना पड़े।
जयचंद जैन , मीसाबंदी

रातोंरात सैकड़ों लोगों को जेल में ठूंस दिया गया था। किसी को कुछ नहीं पता था कि क्या हो रहा है। वो दिन भुलाए नहीं भूले जा सकते।
रूपचंद राय, समाजसेवी और मीसाबंदी

साभार- नईदुनिया डॉट कॉम
http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/chhindwara-chhindwara-news-397621