रविवार, 20 अप्रैल 2014

ये जिला छिंदवाड़ा है साहेब

मोहन कुमार नागर
ये जिला छिन्दवाड़ा है साहेब 
जिसके कोयले से 
मध्य प्रदेश की सिगड़ी जलती है 
यहाँ इंसानों से कहीं अधिक चूहे
या यूँ कहें
कि इंसानी शक्ल के चूहे
जो अपना ज्यादातर वक़्त
बिलों में ही बिताते हैं
और केवल अपने
और अपनों के लिए रसद जुटाने
यदा कदा ही बाहर आते हैं --



इनके बिलों के
यहाँ बाकायदा सरकारी नाम हैं
पाथरखेड़ा , अम्बारा , इकलेहरा , जमकुंडा
वगैरा - वगैरा
और बिलों की खुदाई ..
और खुदाई ..
और खुदाई के लिए खातों में दर्ज चूहे

ये जिला छिन्दवाड़ा है साहेब
जो एक तिहाई पोपला है
और दिन दर दिन
इसका पोपलापन बढ़ता ही जा रहा है

यहाँ बिलों की
एक अजीब सी भूल भुलैया है
और एक भी चूहा
इसका मुकम्मल अंत नहीं जानता
कहाँ जाकर होना है
ये तो कतई ही नहीं
हाँ इतना जरूर सुनाई मैं आता है
बस एक हफ्ता और निर्देश मिल जाए
तो क्या इकलेहरा ,
क्या जमकुंडा --
सब एक हो जाएँ

ये जिला छिन्दवाड़ा है साहेब
जहाँ चूहे
व्यवस्थित बिल खोदने का
खानदानी हुनर लेकर जन्मते हैं
ताउम्र बिल खोदते हैं
यहीं खप जाते हैं
पर गिनती में कम नहीं होते
की मरते - मरते
अपने जैसे कुछ और चूहे छोड़ जाते हैं

इन चूहों का हुनर देखना हो
तो आपको
इनके बिलों में उतरना होगा साहेब
जिसके लिए अच्छे खां की दाल
पीली हो जाती है

एक अँधेरी काली सुरंग
जाने किन किन मोड़ों से गुजरती
तीन बाई पांच की पगडण्डी
जो कहीं इससे ज्यादा कहीं कम ,
धुप्प अँधेरा ..
सड़े अंडे सी तीखी गंध
और मुंह पर बफार मारती हम्माम सी भाप
आप १५ मिनट से ज्यादा
यहाँ शायद ही सांस खेंच पायें
उसके बाद शर्तिया ही आपको बाहर आना होगा
कि बिल मैं सांस ले पाना तो
चूहों का हुनर है साहेब
आप इंसानों का यहाँ क्या काम ?

खैर
अब बात छिन्दवाड़ा की चल ही रही है
तो केवल चूहों की ही बात सुनना या पढ़ना
आपको अजीब तो लग ही रहा होगा
कि बका जा रहा हूँ मैं चूहों पर
क्या सोचेंगे छिन्दवाड़ा
और छिन्दवाड़ा के बाहर के लोग
जब सुनेंगे या पढेंगे ये सब
कि छिन्दवाड़ा में
क्या केवल चूहे ही रहते है ?

तो पूरा वक्तव्य ये है साहेब
की छिन्दवाड़ा एक मुकम्मल जिला है
यहाँ इंसानों से ज्यादा चूहे रहते हैं
कुछ मुकम्मल चूहे
कुछ इंसानी शक्ल वाले चूहे
और जहाँ चूहे हों
ये कैसे हो सकता है ?
कि वहां बिल्लियाँ ना हों ...

बिल्लियाँ --
काली धुस्स बिल्लियाँ
अँधेरी , काली खोह
घात लगाये बिल्लियाँ
नज़र चूकी नहीं
कि झपट्टा मारकर
मुंह में ले जाती बिल्लियाँ
बिल खुदवाती बिल्लियाँ
हाजरी लगाती बिल्लियाँ
चूहों के लिए
हर आठ - आठ घंटे पाली का
हूटर बजवाती बिल्लियाँ

ये चूहों का जिला है साहेब

यहां बिल्लियाँ राज़ करती हैं 

(मोहन कुमार नागर की कविता फेसबुक वॉल से) 

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