शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

एक हमारे जिले के सर्पमित्र और दूसरे ये सांपों के दुश्मन....

(पढ़िए नवंबर, 2012 को मीडिया में आई सर्पमित्रों के काले कारनामों की कुछ खबरें)

।। ज़हर का व्यापार करने के लिए सांपों को दी जाती है प्रताड़ना।।

नागपुर। एक तरफ तो हम सांप का आदर-सत्कार और पूजा करते हैं वहीं दूसरी तरफ सांप को देखते ही मार भी दिया जाता है. वैसे तो सांप जंगलों में रहते हैं या फिर खेत-खलिहानों में पाए जाते हैं. लेकिन बढ़ते शहरीकरण की वजह से सांप अक्सर लोगों के घर में भी निकल आते हैं. अब हालत ये है कि जब भी कोई इंसान सांप को देखता है तो वह डर के मारे थर-थर कांपने लगता है. ऐसे में याद आता है एक ही नाम, सर्प मित्र. तुरंत ही आनन-फानन में सर्प मित्र को बुलवाया जाता है और सांप को सुरक्षित पकड़ कर जंगलों की ओर रवाना करने की व्यवस्था की जाती है. सर्प मित्र सांप को बिना कोई नुकसान पहुंचाए पकड़ते हैं और ऐसा कुछ नहीं करते जिससे सांप को कोई नुकसान हो.

अब कल्पना कीजिए कि अगर सर्प मित्र ही सांप का दुश्मन बन जाए तो. महाराष्ट्र के नागपुर में ऐसा ही कुछ हुआ. यहां सर्प मित्र के चोले में सांपों का कारोबार करने वाला गिरोह सक्रिय था. नागपुर वन सुरक्षा कर्मियों ने इस मामले को सुलझाने का दावा किया है. इन लोगों ने दस आरोपियों को गिरफ्तार किया है.यह गिरोह ज़हरीले सांपों को पकड़ कर उन्हें तकलीफ देकर, उनका जहर निकाल लेता था. इस ज़हर को काले बाज़ार में देश-विदेश में भारी रकम में बेच दिया जाता था.

इस काम लगे पांच लोगों ने तो बाकायदा सर्प मित्र का विज़िटिंग कार्ड तक छपवा रखा था. इसे देखकर लोग इन्हें सांप दिखने की सूरत में सूचित करते थे और इन लोगों को आसानी से सांप सुलभ हो जाते थे. इतना ही नहीं किसी को इन पर कोई शक भी नहीं होता था. वन विभाग को इस गिरोह की भनक लगी तो उसने गिरोह को भंडाफोड़ करने के लिए एक मज़बूत जाल बिछाया और दस लोगों को गिरफ्तार करने में सफलता पाई.

गिरोह के पास से 8 मिली ग्राम ज़हर मिला है. अधिकारियों ने इनके पास से 8 कोबरा सांपों को भी छुड़ाया है. नागपुर बाजार में गुरुवार 13 सितंबर को पकड़े गए ज़हर का मूल्य सात से आठ लाख आंका जा रहा है. कुछ सर्प विशेषज्ञों का कहना है की इस ज़हर का प्रयोग नशे के लिए भी किया जाता है. सामूहिक रेव पार्टी जैसी जगहों पर उन्माद के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है.

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।। सांपों की तस्करी के अड्डे बने नागपुर और वर्धा ।।

महराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले की चार बरस पहले की घटना। एक प्रसिद्ध सर्पमित्र के घर वनविभाग ने जब दबिश दी तो करीब 7 सौ प्रजातियों का पता चला। इनमें सांप, नेवले और छिपकलियां भी थीं। इन सब का वह क्या वह करना चाहता था, यह आज भी राज ही है। वह मुकदमा आज भी चल रहा है।

ठाणे में हाल ही में एक सर्पमित्र के यहां से 50 लाख के विष की बरामदगी के साथ उसको गिरफृतार किया गया। ऐसी ही कार्रवाई पिछले महीनों मुंबई, कोल्हापुर और नागपुर में भी की गई। अमरावती में छत्री तालाब के पास एक सर्पमित्र की पान की टपरी है। इसके काउंटर पर सांप रखे गए हैं। लोग कौतूहलवश आते हैं और उसकी ग्राहकी भी बढती है। 15 साल पहले जिले में मात्र 4 सर्पमित्र थे। आज उनकी संख्या बढकर सात हजार के उपर पहुंच गई है। वन विभाग के पास केवल 40 सर्पमित्र ही पंजीबंद्ध हैं। राज्य के सभी जिलों में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है, लेकिन पूरे राज्य में नागपुर और वर्धा ये दोनों जिले सांपों की तस्करी के बडे अड्डे बन गए हैं।

।। विष के नाम पर अलग ही बाजार ।।
सांपों का विष बताकर अलग ही कुछ बेचने का गोरखधंधा जारी है। नशे के लिए, औषधि के लिए अंधश्रद्धा के चलते यह विष लिया जाता है। सांपों का विष निकालने के बाद उसे एक खास पद्धति से ड्राय करना पडता है। इसके लिए 30 से 40 लाख रुपए की मशीन लगती है। राज्य में किसी तो भी सर्पमित्र के पास यह मशीन होगी? इस कारण विष के नाम पर कुछ तो भी गोरखधंधा चलने की बात गले उतरती है।

।। सांपों के अंग और व्यापार— जिंदा सांप की कीमत 5 हजार से लेकर एक लाख रुपए ।।
अजगर की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 10हजार डॉलर यानी 5 लाख रुपए के करीब है। रेड सेंड बोआ यानी दोमुंह प्रजाति का सांप 30 से 50 लाख तक बिकता है। दक्षिण—पूर्व एशिया में इस सांप की बहुत मांग है। केंसर के इलाज के लिए भी उसका इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग सांपों को खाते भी हैं। खासतौर पर दक्षिण एशियाई देशों की अधिकांश होटल्स में सांपों के मांस से बनाए गए पदार्थों के व्यंजन बडे चाव से खाए जाते हैं। कुछ लोग शौकिया तौर पर सांप पालते हैं। अपने इस शौक की खातिर वे अलग—अलग प्रजातियों के सांपों की खोज में रहते हैं।

।। सांप की खाल की कीमत एक लाख रुपए ।।
सांप की खाल से बने कोट, हेंडबेग, पर्स, जूते आदि वस्तुओं की अमेरिका, यूरोप केनेडा, और चीन के मार्केट में जबरदस्त मांग है। अजगर, धामण, घुघ्घुस और कोबरा आदि की खाल विशेष तौर पर पसंद की जाती है। विश्व प्रसिद्ध डिजाइनर्स द्वारा निर्मित अजगर की खाल के बेग सेलिब्रिटी की शान समझी जाती है। इसके अलावा अजगर की खाल के जॅकेट, बेल्ट और स्कर्टस का फैशन जोरों पर है और इसके लिए लगने वाले लाखों अजगरों और सांपों की आपूर्ति भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, थायलेंड, न्यूजीलेंड और फिलीपींस से होती है। अकेले यूरोप में ही साल भर में लाख से ज्यादा अजगरों की खाल आयात की जाती है।

सांपों के विष की कीमत प्रति ग्राम 75 हजार से लेकर एक लाख रूपए
सांपों के अवयवों में उसका विष सर्वाधिक मूल्यवान होता है। विभिन्न प्रकार की औषधियों में उसका इस्तेमाल किया जाता है। केंसर, एचआयवी यानी एड्स और मधुमेह जैसी बीमारियों की रोकथाम के लिए ये दवाएं उपयोगी साबित होती हैं। सांपों के विष का एक विशेष प्रकार का घटक केंसर का मूल माने वाले ट्यूमर को रोक सकता है, ऐसी विशेषज्ञों की राय है। इस कारण दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में सांपों की विभिन्न प्रजातियों के विष पर बडी तादाद में प्रयोग शुरु हैं। खास तौर पर चीन में अनेक पारंपरिक औषधियों में विष का इस्तेमाल होता है। इसके लिए उन्हें विष की जरुरत पडती है। मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले माफिया भी सांपों की भारी तस्करी करते हैं। केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ही नहीं तो देश में मादक पदार्थों के निर्माण में सर्प के विष का धडल्ले से इस्तेमाल होता है।

।। निष्ठुरता के साथ मारे जाते हैं सांप ।।
सांपों का विष निकालते समय उन पर बडी निर्दयता से अत्याचार किए जाते हैं। उनके दांत गंभीर रुप से जख्मी होने से कई बार वे मौत के मुंह में समां जाते हैं। विष ग्रंथि सांपों को मिली एक बडी देन है। सांपों का विष एक प्रकार से लाल होता है। सांपों का शिकार करने के लिए या आत्मरक्षा करने के लिए उसका इस्तेमाल किया जाता है। उसी प्रकार उसकी खाल निकालने का तरीका भी बहुत ही निष्ठुर है। सबसे पहले जिंदा सांप को झाड से लटकाकर ताना जाता है और कीलें ठोकी जाती हैं। एक बाजू से चीरा लगाकर खाल को साइड किया जाता है। उसे नमक लगाकर सुखाया जाता है। कई बार इसके लिए रसायन का इस्तेमाल भी किया जाता है। इस प्रकार से चमडी तैयार की जाती है। खाल निकालने के बाद वह सांप दो से तीन दिन जिंदा रहता है। इस कारण उसे भारी पीडा होती है।

।। सांप पालने की भी अनुमति लेना होती है ।।
किसी भी वन प्राणी के प्रदर्शन करने के लिए केंद्रीय प्राणि संग्रहालय प्राधिकरण, भारत सरकार की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। सीझेडए के नियम बहुत सख्त हैं, इसके लिए उनकी खानापूर्ति के बाद ही अनुमति मिल सकती है। सांप केवल प्राणि संग्रहालय में ही प्रदर्शित किए जाते हैं।

।। सर्पमित्रों के अधिकार ।।
खेती और वन भूमि ये सांपों के नैसर्गिक आश्रय स्थल हैं किंतु शहरीकरण बढने से, कृषि भूमि का आबादी में बदलने के कारण उनका आश्रयस्थल खतरे में है। बढती बस्तियों के कारण सांप ज्यादा संख्या में दिखने लगे और इसके साथ ही सर्पमित्रों का उदय हुआ। 10 से 15 साल पहले सर्पमित्रों का सिलसिला शुरु हुआ, तब गिने—चुने ही सर्प मित्र थे। कालांतर में उनकी संख्या बढ गई। शहरी और ग्रामीण भाग के अनेक सर्पमित्र अपनी जान की परवाह न करते हुए सांपों की जान बचाने बचाकर उन्हें जंगल में छोडने का महती कार्य कर रहे हैं।

राज्य में साधारणत: एक से डेढ लाख सर्पमित्र हैं। उनके पास कितने कोबरा हैं, कितने अजगर हैं, इस पर से उनका वजन तय होता है। ऐसे शौकिया सर्पमित्रों की संख्या देखने पर साधारणत: हरेक के बंद दरवाजों में एक समय करीब दस सांप मिलेंगे। अर्थात राज्य भर में इन सर्पमित्रों के घरों में सामन्यत: दस लाख सांप होने का अंदाज है। इन सांपों का आगे का क्योता है, यह भी एक रहस्य है। पकडे गए सांपों को तुरंत जंगल में छोडना होता है।

कई सर्पमित्र ऐसा करते भी हैं, लेकिन सर्पों का संग्रह करने वाले सर्पमित्रों की संख्या भी कम नहीं है। इस पर वनविभाग का कोई नियंत्रण नहीं है। सांपों के संदर्भ में बढते खतरे को ध्यान में रखकर सर्पमित्रों को पहचान पत्र देने का नया प्रस्ताव सामने आया है। एक वार्ड में दो सर्पमित्र होना चाहिए और वे भी प्रशिक्षित होना चाहिए, यह सूचना इस नए प्रस्ताव में दी गई है।

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