शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

आज भी प्रतुल चंद द्विवेदी के प्रशंसक है कमलनाथ

आरपी कस्तूरे

प्रतुल जी के स्वभाव ने गैरों को भी अपना बना लिया था। कमलनाथ आज भी उनके प्रशंसक है।

एक जमाना था जब संघ का स्वयंसेवक जनसंघ में जाता था। इनकी राजनीति के दुश्मन भी, इनकी ईमानदारी पर आँख बंद कर भरोसा करते थे। उस समय के जनसंघ के नेता पूजनीय थे। उनका दामन साफ था। जो कुछ भी करते, समाज के लिए करते थे। उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं था। मैं दो-तीन ऐसे लोगो को जानता हूं, जो आज भी घर- घर में वंदनीय है। उनमें से एक स्वर्गीय प्रतुल चंद द्विवेदी है। जो संघ के उस समय के नामी गिरामी प्रचारक थे।

मेरे गृह नगर छिंदवाडा (मध्यप्रदेश) में हर कोई उन्हें सम्मान से देखता था। उस समय के कलेक्टर भी उन्हें सम्मान देते थे। मास्टर साहब के नाम से जाने जाते थे। बीजेपी में आए, दुर्भाग्य से एक भी चुनाव नहीं जीत सके। बीजीपी ने नहीं, कमलनाथ ने उनके घर के पास उनकी मूर्ति लगाई। वे आज भी सबके दुलारे है। संघ की शिक्षा के अनुसार वे किसी को दुश्मन नहीं मानते थे। सबके लिए वे आदरणीय थे। आज भी है। दूसरे श्री सुदरलाल शक्रवार है, जिनकी गिनती संघ के हार्डकोर नेताओं में होती है। एक समय तक साथ देना, इनका स्वभाव है। शिवराज सिंह चौहान जी ने इन्हें शायद कोई पद दिया था। उस पद की गरिमा को बखूबी निभाया, न कोई हल्ला था, ना कोई गुल्ला। अनुशासित स्वयं सेवक के रूप में इनकी गणना होती है। ये व्यवहारिक नहीं थे जबकि प्रतुल जी व्यवहारिक थे।

लोकप्रियता में कोई भी प्रतुल जी की बराबरी नहीं कर सकता था। हालांकि वे एक भी चुनाव नहीं जीते, कमलनाथ से हमेशा हारे। कहा जाता है कि मैदान में पराजित योध्या का कोई स्थान नहीं होता। किंतु यह अपवाद ही था कि विजेता उनके हर सुख दुःख में शामिल रहा था। ऐसा विजेता मिलना कठिन है। प्रतुल जी के स्वभाव ने गैरों को भी अपना बना लिया था। कमलनाथ आज भी उनके प्रशंसक है।

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