सोमवार, 14 मई 2012

पाटनी पिक्चर पैलेस में जो बच्चा रोया था

विष्णु खरे
मेरे शहर छिंदवाड़ा का बेहतर सिनेमा-घर, जिसका नाम बहुत रोबदार था– पाटनी पिक्चर पैलेस, हमारे घर से इतना नजदीक था कि आखिरी शो में,  हम उसमें दिखाई जा रही फिल्मों के शमशाद बेगम या मर्दों के गाने, कोरस, डांस म्यूजिक या डायलॉग देर सुनसान रातों में घर-बैठे सुन सकते थे। बहुत छुटपन में मां या बुआओं के साथ ही (और उन्हें भी) सिर्फ ‘धार्मिक’ और ‘सामाजिक’ फिल्में देखने जाने की अनुमति थी। तब `लेडीज’ को बालकनी में बिठाया जाता था, ताकि वे पुरुष दर्शकों से अलग और सुरक्षित बैठ कर चैन से फिल्म देख सकें।

पहली
फिल्म जो मैंने देखी अपनी सबसे पहली फिल्म के बारे में मुझे कुछ स्मृति-विभ्रम है। मुझे अपनी मां की गोद में बैठकर ‘सिकंदर’ या ‘राम-राज्य’ देखने की याद है, लेकिन ‘सिकंदर’ 1941 की है, जब मैं हद-से-हद एक-डेढ़ बरस का रहा हूंगा, जबकि ‘राम-राज्य’ के वक्त ज़रूर तीन बरस का हो चुका था। लेकिन छोटे शहरों में कभी-कभी बहुत लोकप्रिय फिल्में सब बड़ी जगहों के बाद ही दिखाई जाती थीं। ’सिकंदर’ का तब बहुत लोकप्रिय गाना `कदम कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गए जा’ जो सिकंदर बने पृथ्वीराज कपूर और उनके यूनानी घुड़सवारों का प्रयाण-गीत था और अधिकांशतः सिलुएत शैली में फिल्माया गया था, मुझपर स्थायी असर छोड़ गया है। बाद में जब भी मैंने ‘सिकंदर’ या वह गाना टीवी  पर देखा है, मैं पाटनी सिनेमा की उस बालकनी, धुएं से पीले पड़ चुके, उसके कराहते हुए बड़े-बड़े पंखों, वहीं पर बने महिला पेशाब-घर, जिसमें मुझे भी जाना पड़ता था और नीचे की बीड़ी-सिगरेट की मिली-जुली तीखी बू, पिक्चर शुरू होने के पहले और इंटरवल में `पान बीड़ी माचिस सिगरेट’ बेचने वालों की उसी पुकार की दुनिया में पहुंच जाता हूं और अपने को मुश्किल से लौटा पाता हूं। `राम राज्य’ की मुझे ज्यादा याद है, इसलिए वह मेरी पहली फिल्म हो नहीं सकती। वह मन्ना डे की पहली हिंदी फिल्म जरूर है – `चल तू दूर नगरिया तेरी’।

क्लास बंक करके सिनेमा
जबसे कॉलेज शुरू हुए हैं, भारत में उनका एक महती योगदान विद्यार्थियों को बंकिंग के अपराध-बोध से मुक्त करवाना भी है। सिनेमा के मैटिनी शो, यानी तीन बजे, तक तो सारी क्लासेज कभी की हो चुकी होती थीं। लेकिन स्कूलों में नाइंथ क्लास में आ जाना हम जैसे विद्यार्थियों को थोड़े दुस्साहस और एडवेंचर-भाव से भर देता था, हालांकि तब भी स्कूल के चपरासियों तक से डर लगता था। मेरे साथ भयावह स्थिति यह थी कि मेरे स्कूल में मेरे पिता भी मास्टर थे और हाई स्कूल में ही और वह भी फुल मैथेमेटिक्स और फुल साइंस के। वे संसार के कुछ सर्वश्रेष्ठ किन्तु सबसे जंडैल टीचरों में से थे, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जो भी खरे मास्साब से पढ़ा है इसकी तस्दीक कर सकता है, और घर में जो उनका आतंक था वह अब भी अनिर्वचनीय है। लेकिन कहा भी जाता है कि जिसमें सबसे ज्यादा जोखिम हो उस एडवेंचर में अलग ही थ्रिल होती है। मेरे और मुझ जैसे कुछ अन्य विद्यार्थियों की किस्मत से शहर में रेलवे-फाटक के पास एक नया सिनेमा खुल गया, जिसमें 3 से 6 के मैटिनी शो तो होने ही लगे, उनमें अंग्रेजी फिल्में! 1954-55 में छिंदवाड़ा में अंग्रेजी फिल्में!! – भी दिखाई जाने लगीं। चार्ली चैप्लिन, लॉरेल-हार्डी, बस्टर कीटन आदि की और फ्रान्केंस्टाइन, ड्रैकुला, द इनविजिबल मैन, फ्लैश गोर्डन वगैरह और हिंदी की ‘शबाब’ जैसी फिल्में भी मैटिनी में लगीं। तो यदि दो बजे के बाद खतरनाक टीचरों की अनिवार्य क्लासें नहीं रहती थीं, लास्ट पीरियड  खेल का होता ही था, तो हम चार-पांच मरजीवड़े अलग-अलग पतली गलियों से कट कर अपनी फिल्मी मंजिले-मकसूद की जानिब रुख करते थे। सेकंड क्लास का टिकट सात आने का होता था। `शबाब’ शायद एक हफ्ता चली और मैंने तथा (अब दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय गोल्फ-कोर्स विशेषज्ञ) इन्दरवीर सिंह (जुनेजा) ने पांच बार देखी। वह बहुत खूबसूरत था और जब केश खोल कर ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में नूतन-प्रेरित पोर्शिया बनता था,  तो बधाई देने हेतु उसे गले लगाने के लिए बेताब वयस्क शहरी प्रशंसकों की शौकीन भीड़ को स्कूल-मंच के पीछे से तितर-बितर करना पड़ता था।

विश्व सिनेमा और हम
पूरे भारतीय सिनेमा पर टिप्पणी कर पाना बहुत कम लोगों के बस की बात होगी। अपने सारे अज्ञान की धृष्टता से साथ कह सकता हूं कि विश्व के एक महानतम निदेशक, जो हमारे शाश्वत गर्व के लिए हमारे यहीं हुए, सत्यजित राय के सर्वोत्तम सक्रिय 25 वर्ष, यानी 1955 की ‘पथेर पांचाली’ से लेकर 1980 की ‘सद्गति’ तक, या थोड़ी रियायत लेकर 1984 की ‘घरे बाहिरे’ तक, एक विचित्र  संयोग से भारतीय सिनेमा के भी सर्वश्रेष्ठ वर्ष हैं। सभी प्रमुख भाषाओं के वे निदेशक, जिन्होंने भारत को विश्व सिनेमा  पर एक अस्मिता दी, इसी दौर में उभरे। इन्हीं वर्षों में हमारी फिल्मों को सर्वाधिक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। सूची बहुत लंबी है। मुझे एक चीज समझ में नहीं आती कि मराठी और गुजराती में सार्थक सिनेमा इतना पिछड़ा  क्यों  रहा। 1990 तक हमारे सिनेमा ने विश्व सिनेमा में कुछ स्थान बनाया।  

दुर्भाग्यवश, सत्यजित राय को छोड़कर भारत से कोई और वैसा आदर, ख्याति और स्वीकृति अर्जित नहीं कर सका। आज प्रतिष्ठित फिल्मोत्सवों में भारत को अच्छी फिल्मों के अभाव के कारण ही याद किया जाता है। भारतीय डाइस्पोरा और डॉलर, पौंड, यूरो आदि मुद्राओं के आगे रुपये की कमजोरी के कारण कुछ भारतीय फिल्में विदेशों में करोड़ों का बिजनेस दिखा देती हैं, लेकिन रूस और एशिया के कुछ हमसे भी पिछड़े देशों को छोड़ कर अधिकांश वास्तविक विदेशी दर्शक हमारी फिल्में देखने नहीं जाते। सभी दृष्टियों से हमारी लोकप्रिय फिल्में हॉलीवुड की तीसरे दर्जे की फिल्मों से भी बचकाना हैं। मुझे कभी-कभी हॉलैंड के रोत्तर्दम फिल्मोत्सव को देखने का मौका मिल जाता है, लेकिन  मैं वहां लोकप्रिय या सार्थक भारतीय फिल्में, उनके निदेशक या अभिनेता बहुत कम देख पाता हूं। यही हाल एक बार कान और एक बार ला रोशेल में नजर आया। बर्लिन, कान, वेनिस, लोकार्नो सरीखे फिल्मोत्सवों में अब भारतीय फिल्मों को पुरस्कार-मिलना बंद हो चुका है। 

मेरी पसंद की दस फिल्में
पिछले सौ साल का पूरा, मूक और सर्वभाषिक, भारतीय सिनेमा कहां देखने को उपलब्ध है? कथित कला-सिनेमा की बात करें, राय नहीं करते थे, तो सिर्फ राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन और बिमल राय ही मेरी पसंद की दस फ़िल्में लेकर भाग निकलेंगे। जब फर्स्ट-रेट उपलब्ध है, तो रियायत देकर सेकंड-रेट को क्यूं चुनूं? लेकिन यदि आज हिंदुस्तानी की दस लोकप्रिय फिल्में चुनना हो तो मैं ‘रामराज्य’, `किस्मत’, `आज़ाद’, `देवदास’,’ श्री 420’, `पाकीज़ा’, `चलती का नाम गाड़ी’, `संघर्ष’, `प्यासा’, `उमराव जान’ और `पानसिंह तोमर’ को छाटूंगा। 


मेरा फेवरिट फिल्मकार
मैं सत्यजित राय के आगे भारत में किसी को भी मान नहीं सकता। विश्व में भी वे शीर्षस्थों में से एक हैं। मैं उनसे तीन बार मिला हूं और छह बार उनके चरण छुए हैं और धन्य हुआ हूं। बेशक उनकी कुछ फिल्में उन्हीं के निर्मित मानदंडों से कुछ नीचे रह जाती हैं लेकिन किसी ने कम-से-कम दस फिल्में महान बनाई हों, यह अब भी अकल्पनीय लगता है। 


मोस्ट ओवररेटेट और अंडररेटेड
हिन्दुस्तानी लोकप्रिय सिनेमा में यह कहना मुश्किल है कि ‘मुगल-ए-आजम’ ज्यादा ‘ओवररेटेड’ है या ‘शोले’। एक को पृथ्वीराज कपूर ने चलाया, दूसरी को अमजद खान ने। वैसे ‘कागज के फूल’ भी कम पकाऊ  नहीं है।  सबसे अधिक ‘अंडररेटेड’, बल्कि देखी ही नहीं गई, फिल्म जिया सरहदी की दिलीप कुमार–मीना कुमारी वाली ‘फुटपाथ’ है। उसकी अपने वक्त से बहुत आगे की  विषयवस्तु एक ड्रग-माफिआ, जन-द्रोह और मध्यवर्ग का नैतिक पतन हैं। आज उसे अनुराग, विशाल या तिग्मांशु सरीखे युवा ‘रीमेक’ कर सकते हैं। अंत में दिलीप कुमार का इकबालिया बयान इतना मार्मिक है कि मैं बारह बरस की उम्र में पाटनी पिक्चर पैलेस में रो दिया था। छिन्दवाड़ा क्या, अच्छे-अच्छे शहरों में वह एक ही दिन चल पाई थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि हबीब तनवीर उसमें एक्स्ट्रा की हैसियत से एक तहमद-छाप चाकूबाज गुंडा बने हैं, जो दिलीप कुमार को मारना चाहता है। जब मैंने हबीब भाई से पूछा तो उन्होंने मजाक में मुझसे कहा था कि किसी और को बताना मत, वर्ना वह चाकू अब भी मेरे पास है। 


नई तकनीक और सिनेमा
बड़े या महान सिनेमा को आमतौर पर  तकनीकी तामझाम की जरूरत नहीं होती। अब तो मोबाइल पर फिल्में बना डालने का जमाना है। वीडियो कैमरे बेहद सस्ते हैं। फिल्म बनाना अब कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक, अधिक ‘टपोरी’ हो गया है। सुना है पिछले एक-दो वर्षों में करीब 150 युवा पहलवान फिल्मी अखाड़े में कूदे हैं। देखना है कि सत्यजित गुरु की लंगोट कसने और गुर्ज उठाने  के लायक कोई पट्ठा सामने आता है या नहीं।   


(सौ साल के सिनेमा में नॉस्टेल्जिया भी है और आज की बात भी है। कौन है इस सिने-सदी का सबसे महान फिल्मकार और विश्व सिनेमा के मुकाबले कहां खड़े हैं हम? ऐसे ही कई सवालों के जवाब में देशी-विदेशी सिनेमा पर नजर रखने वाले वरिष्ठ कवि की टिप्पणी )


अमर उजाला मनोरंजन से साभार


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