बुधवार, 26 दिसंबर 2012

वक्त से पहले वक्त से आगे कमलनाथ का छिन्दवाड़ा


विकास का श्रेष्ठतम स्वरूप है छिन्दवाड़ा !

उद्योग क्षेत्र-
1 पैक हाउस अठारह करोड़ की लागत से बने मोहखड विकास खण्ड के ग्राम तन्सरामाल में संतरा उत्पादक किसानों के लिए निर्मित।
2 मसाला पार्क-20 करोड़ की लागत से मसाला फसलों के उत्पादक किसानों को उनकी कृषि उपज का उचित मूल्य दिलवाने तथा रेाजगार उपलब्ध कराने की दृष्टि से निर्मित।
3 टेक्सटाईल्स पार्क-400 करोड़ की लागत से निर्मित होने वाले टैक्सटाईल्स पार्क के साथ में 40 मेगावाट विद्युत परियोजना एक साथ संचालित करने का दृढ़ संकल्प।
औद्योगिक क्षेत्र-
1. हिंदुस्तान युनिलिवर की स्थापना 2. रेमण्ड की स्थाना 3. भंसाली की स्थाना 4. ब्रिटानिया की स्थापना, 5. सूर्यवंशी स्पिनिंग मिल की स्थापना, 6. पीबीएम पॉलीटेक्स की स्थापना 7. क्योरबर्थ लिमिटेड की स्थापना 8. ऑटोमेटेड सेंटर फॉर टेस्टिंग इंसपेक्शन ऑफ व्हीकल्स की स्थापना इन फेेक्ट्रियों में जिले के युवा वर्ग को रोजगार दिलवाया गया है। साथ ही 10-12 वीं पास युवाओं के लिए कमलनाथ जी द्वारा देश की नामी गिरामी कंपनियों में रोजगार उपलब्ध कराकर उन्हें सक्षम बनाने का प्रयास किया गया है। छिंदवाड़ा शहर में जानी मानी कंपनियों के कैंपस लगाकर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया गया।

सड़क सुविधाएं-सड़कों के महाजाल में छिंदवाड़ा जिला देश में प्रथम जिला है। 1. राष्ट्रीय राजमार्ग को छिंदवाड़ा से जोडऩे के लिए रिंग रोड का निर्माण राशि 1433 करोड़ रूपये स्वीकृत रूपये स्वीकृत। नरसिंहपुर से छिंदवाड़ा मार्ग, मुलताई से छिंदवाड़ा सिवनी बाईपास, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत 400 से 800 तक की जनसंख्या वाले आदिवासी व गैर आदिवासी ग्रामों में ग्रामीण सड़कों का निर्माण स्वीकृत। छिंदवाड़ा शहर के चारफाटक रेलवे क्रॉसिंग छिंदवाड़ा से सिवनी मार्ग पर फ्लाईओवर ब्रिज का निर्माण कार्य, छिंदवाड़ा के ग्राम ईमलीखेड़ा में अण्डरब्रिज का निर्माण पाण्डुर्ना रिंग रोड हेतु 23 करोड़ की योजना स्वीकृत कार्य, भारत सरकार के उपक्रम एनटीवीसी और एनबीसी के द्वारा एक करोड़ दस लाख रूपये की राशि पाण्ढुर्ना, सौंसर एवं बिछुआ की विभिन्न सड़कों हेतु स्वीकृति, डब्ल्यूसीएल के मार्फत सीएसआर पर छिंदवाड़ा जिले में करोड़ों रूपये की सड़कों का महाजाल शीघ्र प्रारंभ, एनटीपीसी तथा एनबीसीसी एवं पावरग्रिड ईपीआई, बीएचईएल के द्वारा छिंदवाड़ा जिले में करोड़ों रूपये की सड़कों का महाजाल शीघ्र प्रारंभ, एनटीपीसी तथा एनबीसीसी एवं पावरग्रिड ईपीआई बीएचईएल के द्वारा छिंदवाड़ा जिले में आंतरिक सड़कों का कार्य शीघ्र प्रारंभ। ग्रामीण अंचलों एवं पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु आईएपी एकीकृत कार्य योजना प्रति वर्ष तीस करोड़ की राशि एवं बीआरजीएफ (बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड) चालीस करोड़ अतिरिक्त राशि पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु प्रतिवर्ष केन्द्र सरकार द्वारा सौगात दिलाई गयी।

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साभार- उगता भारत

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

खुदरा पर 'कमल' से लड़ाई में कमल ने ही साख बचाई

 वह अपने लोकसभा क्षेत्र का बहुत खास ख्याल रखते हैं, इतना ज्यादा कि मध्य प्रदेश में उसे 'केंद्र शासित जगह' कहा जाता है। अपने संसदीय क्षेत्र का खास ख्याल रखने की वजह से कई बार उन्हें अपनों की झिड़की भी सुननी पड़ती है। एक बार मंत्रिमंडल की बैठक के दौरान उन्होंने छिंदवाड़ा से जुड़ा कोई मसला उठाया तो तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को उन्हें यह कहना पड़ा था कि यह छिंदवाड़ा के स्थानीय निकाय की बैठक नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक है।

आदिति फडणीस /  December 14, 2012
बहु-ब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के मसले पर पिछले दिनों संसद में बहुत गहमा-गहमी हुई। इस पर संसद के दोनों सदनों में जोरदार बहस हुई। दिग्गज नेताओं ने इसके पक्ष और विपक्ष में एक से बढ़कर एक तर्क पेश किए। इसी सिलसिले में अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) के नेता और राज्यसभा सांसद वी मैत्रेयन बहुब्रांड खुदरा में एफडीआई की खामियां गिना रहे थे। मैत्रेयन ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार बहुत बड़ी गलती करने जा रही है। हालांकि बहस के दौरान अपने भाषण में सरकार पर कटाक्ष करते हुए बहस के नतीजे के निचोड़ पर यही कहा, 'आनंद शर्मा हार गए लेकिन कमलनाथ जीत गए।' उनका इशारा साफ तौर पर यही था कि वाणिज्य मंत्री जहां हारे वहीं संसदीय कार्यमंत्री को जीत मिली।


जाहिर है इस टिप्पणी के बाद दोनों मंत्रियों के चेहरों के हावभाव अलग नजर आने थे और ऐसा हुआ भी। एक ओर जहां वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने उनके बयान पर उदासी भरी मुस्कान से जवाब दिया जबकि संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ अपनी खुशी पर काबू नहीं रख सके। उन्होंने शालीन दिखने की भरसक कोशिश की लेकिन अपनी इस कवायद में वह बुरी तरह नाकाम रहे और फिर वह किसी पॉप स्टार की मानिंद अकड़ में सदन से बाहर निकले, जहां उनके साथी उनकी पीठ थपथपा रहे थे और उनसे हाथ मिलाने को आतुर नजर आ रहे थे।


एक  संवाददाता ने उनसे सवाल किया कि वह सुबह कितने बजे सोकर उठते हैं? उन्होंने जवाब दिया, 'मुझसे यह पूछिए कि मैं रात को सोता कितने बजे हूं?' पिछले हफ्ते उनका अधिकांश वक्त भाग-दौड़ और जोड़-तोड़ में ही बीता। कमलनाथ उन लोगों से फोन पर बातचीत से लेकर व्यक्तिगत रूप से मेल-जोल में लगे थे, जिनके बारे में उनको यकीन था कि वह उन्हें अपने पाले में ले आएंगे और विपक्ष के प्रस्ताव को गिरा देंगे। इसलिए इसमें बहुत ज्यादा हैरानी की बात नहीं कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव और पार्टी के प्रमुख संकटमोचक अहमद पटेल से जब यह पूछा गया कि उनकी पार्टी मायावती का समर्थन हासिल करने में कैसे कामयाब रही तो उन्होंने यही जवाब दिया, 'आप कमलनाथ से पूछिए।'


बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती का समर्थन सुनिश्चित करने के लिए कमलनाथ ने उन्हें उनके ही महत्त्वाकांक्षी अभियान से साधा। यह तो सभी जानते हैं कि प्रोन्नति में दलितों के आरक्षण का मसला मायावती के लिए राजनीतिक रूप से बहुत अहम है, ऐसे में उसी की दुहाई देते हुए कमलनाथ ने कहा कि अगर वह इस विधेयक को अंजाम तक पहुंचाना चाहती हैं तो उन्हें यही दिखाने की जरूरत है कि विपक्ष कमजोर, बिखरा हुआ है जो सिर्फ शोर-शराबा मचाने से ज्यादा कुछ और नहीं कर रहा है। अन्यथा 117वां संविधान संशोधन विधेयक कभी मूर्त रूप नहीं ले पाएगा। वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) का समर्थन हासिल करने के लिए उन्होंने सपा सुप्रीमो को समझाया कि इससे उनकी धुर राजनीतिक विरोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कमजोर होगी। कमलनाथ ने यादव को समझाया कि एफडीआई प्रस्ताव से भाजपा को छोटे व्यापारियों के बाहुल्य वाली लोकसभा सीटों पर नुकसान उठाना पड़ेगा जो उसकी बड़ी ताकत रहे हैं। सब कुछ सरकार के हक में गया। हर चीज एकदम तय हिसाब से हुई और सदन में सरकार ने साबित कर दिया कि पूरा संगठित विपक्ष भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।


एफडीआई पर मतदान के बाद कमलनाथ मुश्किलों को आसान बनाने वाले खास शख्स बन गए। मगर इसकी वजह से उनका ध्यान उनकी दूसरी जिम्मेदार से विमुख नहीं हुआ। उनके पास शहरी विकास मंत्रालय का दायित्व भी है। वह रोजाना निर्माण भवन के अपने दफ्तर जाते हैं और शाम तक जरूरी फाइलों को निपटाते हुए देखे जा सकते हैं। उनसे मुलाकात करने वाले हर एक व्यक्ति को डाटाबेस में अपना पूरा ब्योरा दर्ज कराना होता है। फिर जैसे ही सूरज अस्ताचल की ओर चला जाता है, तो उन्हें अपने लोकसभा क्षेत्र छिंदवाड़ा का ख्याल आता है जिसका वह लोकसभा में नौवीं मर्तबा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 

वह अपने लोकसभा क्षेत्र का बहुत खास ख्याल रखते हैं, इतना ज्यादा कि मध्य प्रदेश में उसे 'केंद्र शासित जगह' कहा जाता है। अपने संसदीय क्षेत्र का खास ख्याल रखने की वजह से कई बार उन्हें अपनों की झिड़की भी सुननी पड़ती है। एक बार मंत्रिमंडल की बैठक के दौरान उन्होंने छिंदवाड़ा से जुड़ा कोई मसला उठाया तो तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को उन्हें यह कहना पड़ा था कि यह छिंदवाड़ा के स्थानीय निकाय की बैठक नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक है।


कुछ लोग उन्हें आपातकाल के दौर में संजय गांधी से घनिष्ठïता की वजह से भी याद करते हैं। मगर वक्त के साथ न केवल अनुभव बल्कि कमलनाथ का कद भी बढ़ा है। यहां तक कि राहुल गांधी जैसे नेता उनकी मिसाल देते हैं। हाल के सूरजकुंड चिंतन शिविर में गांधी ने उनका नाम लेते हुए कहा कि अपने संसदीय क्षेत्र पर उनकी जबरदस्त पकड़ है और बताया कि उनकी यह खासियत अनुकरणीय है। पार्टी में उनके दूसरे सहयोगी भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते हैं। किसी राजनीतिक दल में ऐसे विरले उदाहरण ही होते हैं। मगर उनके लिए सब कुछ बहुत आसान नहीं होने वाला। कमलनाथ की सबसे बड़ी चुनौती आने वाला बजट सत्र होगी जहां उन्हें सरकार की हर हमले से हिफाजत करनी होगी। कमलनाथ में ऐसा करने का माद्दा है-भौगोलिक विशेषताओं पर उनका नियंत्रण पहले ही साबित हो चुका है।


साभार- http://hindi.business-standard.com

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

कमलनाथ और छिंदवाड़ा एक दूसरे के पर्याय

कमलनाथ और छिंदवाड़ा एक दूसरे के पर्याय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
शहरी विकास मंत्री कमलनाथ और छिंदवाड़ा एक दूसरे के पर्याय हैं। छिंदवाड़ा आज जो भी अस्तित्व है उसका एक बड़ा स्तंभ कमलनाथ जी हैं। आज से तीस बरस पहले तक छिंदवाड़ा महज जिला मुख्यालय के रूप में ही जाना जाता था किंतु 1980 के बाद जब से कमलनाथ ने यहां की बागडोर संभाली उत्तरोत्तर विकास करता हुआ छिंदवाडा देश के नक्शे में अपना अलग स्थान बना चुका है।

 जहां पहले यह स्थान देश के अन्य भागों से अलग थलग था, आज देश के बाकी हिस्सों से यातायात के नज़रिये से तो जुड़ा ही है व्यापार, व्यवसाय और राजनैतिक नजरिये से भी प्रदेश और देश का एक प्रमुख केंद्र बन गया है।

पहले आमला से परासिया तक ही रेल की बड़ी लाइन थी परासिया से छिंदवाड़ा तक का सफर नेरो गेज लाइन से ही करना पड़ता था। कमलनाथजी की पहल से ही इसका अमान परिवर्तन होकर आज छिंदवाड़ा से सीधे ही दिल्ली तक गाडियां उपलब्ध हैं। एवं शेष रेल ट्रेक मे नागपुर छिंदवाड़ा का अमान परिवर्तन का कार्य प्रगति पर होकर आगामी दो वर्ष में पूर्ण होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इसके बाद दक्षिण भारत से सीधे ही छिंदवाड़ा का संपर्क हो जायेगा।

छिंदवाड़ा सिवनी नैनपुर अमान परिवर्तन के लिये भी सर्वे हो रहा है और आगामी कुछ ही वर्षों में यह काम भी हो सकेगा। यह सब केवल कमलनाथजी के प्रयास का ही परिणाम है। मुलताई से सिवनी एवं नरसिंहपुर से छिंदवाड़ा नागपुर रोड राष्ट्रीय राजपथ होकर कार्य स्वीकृत होकर कार्य आरंभ किये जा रहे हैं। निकट भविष्य में जब यह सब काम पूर्ण होंगे तो छिंदवाड़ा का नक्शा ही बदल जायेगा। यह शहर अब महानगर की ओर अग्रसर होता दिखाई पड़ने लगा है। यह केवल कमलनाथ के कारण ही।

इंजिनियरिंग कालेज, कालसेंटर फ्लाई ओवर इनका निर्माण होगा तो छिंदवाड़ा की अलग ही पहचान होगी। एक कर्मठ लगनशील संवेदनशीलता संघर्षरत और छिंदवाड़ा के प्रति समर्पित कमलनाथ छिंदवाड़ा वासियों के हृदय में बसते हैं। विरोधी लाख विरोध करें कमलनाथ का ताज छीनना वर्तमान में तो असंभव है।

अभी हाल में ही आपने बिछुआ क्षेत्र के ग्राम खमरा में [1]खमरा सांख सरवाड़ा [2]खमरा सुरगी और [3]खमरा दातला लुहार बतरी मार्ग के निर्माण का भूमि पूजन किया।राजीव जल मिशन के लिये 6 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की। खमरा बिछुआ में मां दुर्गा और राधा कृष्ण मंदिर निर्माण कराने की घोषणा की।


साभार
प्रवक्ता डॉट कॉम

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

इंडियन क्रेजी फॉर अनमैरिड पर्सनालिटी

अविवाहित शख्सियत के लिए भारतीयों में दीवानगी

हमारे देश ने आजादी के ६५ सालों में आर्थिक, वैज्ञानिक, शिक्षा के रूप में जो तरक्की की है वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। इसके अलावा भारतीय समाज के हर वर्ग का विकास, खासकर युवकों ने जो हमारे देश की तरक्की में योगदान दिया है उसे देश कभी नहीं भूल सकता, पर इन सब के अलावा भी कुछ ऐसे लोग जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ को कुचलकर, अपनी निजी इच्छाओं को त्याग कर समाज और देश के लिए जो योगदान दिया है या कहे बलिदान दिया है उसे कोई भी हिन्दुस्तानी कभी नहीं भूल सकता। आने वाला समय या हिंदुस्तान का उज्जवल भविष्य इन्हीं के किए हुए कर्मों का मार्गदर्शन कर आगे बढे़गा। जी हां हम बात कर रहे हैं जीवनभर अविवाहित रहने का संकल्प लेने वाली शख्सियतों के बारे में।

  दोस्तों आज मैं हिंदुस्तान की उन महान हस्‍तियों को जिक्र कर रहा हूं जिन्होंने विवाह जैसे अटूट बंधन में न बंधकर समाज और देश की सेवा को ही अहम समझा। चाहे वो सेवाएं राजनैतिक हो, सामाजिक हो, विज्ञान हो, मनोरंजन हो, या उद्योग हो। बस अपने कर्त्तव्‍य को निभाते चले आ रहे है। जिनमें मैं सबसे पहले उन दो बड़ी हस्तियों का परिचय देना चाहता हूँ जिनकी काबिलियत पर गर्व कर इस देश ने उन्हें सबसे बड़े नागरिक सम्मान यानी भारत रत्न से सम्मानित किया।
  - एपीजी अब्दुल कलाम
  - लता मंगेशकर
एपीजी अब्दुल कलाम " मिसाइल मैन ऑफ इंडिया " के नाम से मशहूर, इन्होंने भारत के लिए पहला परमाणु बम बनाया, इसके बाद ये सिलसिला आज भी लगातार जारी है. इनकी काबिलियत को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें २००२ में भारत का राष्ट्रपति बनाया गया। आज भी वे किसी न किसी रूप में देशसेवा में तल्लीन है. हम सभी आज उन्हें गर्व से शुभकामनाएं देते हुए सलाम करते है। दूसरा नाम लता मंगेशकर का है, "सुरों की मलिकाएं हिंदुस्तान"  जो अपनी सुरीली आवाज से पूरे देश का मनोरंजन कई दशकों तक करती आ रही. उन्होंने लगभग २० भाषा में ५००० से अधिक गीत गाए है. साल (१९४८-७४) के बीच २५०० गीत गाने  का  "The guinness book of records"  है। जो कि एक विश्व रिकॉर्ड है. और आज भी ये सुरों की मलिका हमारे देश के लिए किसी न किसी रूप में सेवाएं दे रही है।

  अब हम भारतीय राजनीति की बात करें तो उसमें भी सबसे सफल और आदर्श के साथ लिए जाने वाला नाम अटल बिहारी वाजपयी है, जो की एक बहुत ही अच्छे कवि के रूप में भी जाने जाते है, जिनकी कई कविताएं काफी प्रचलित भी हुई. सिद्धांतवादी इस हस्ती ने ये फैसला किया की वे कभी विवाह नहीं करेंगे और अपना पूरा जीवन देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया. अटलजी भारत के दो बार प्रधानमंत्री रह चुके है और देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी यानि भारतीय जनता पार्टी के खासमखास भी है।

आज हम देश की राजनीति की सबसे बड़ी बहस की चर्चा करें या २०१४ के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के दावेदारों का उल्लेख करे तो सबसे ऊपर दो अविवाहित राजनेता नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का ही नाम आता है। इसमें कोई शक नहीं है कि भारतवासी नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष के रूप में देख रहे है। गुजरात का जिस तरह से उन्होंने विकास किया है वो सबके सामने है। वहीं दूसरी ओर गांधी परिवार ने इस देश के लिए अपनी जान तक दी है तो आज उस परिवार के युवा राजनेता राहुल गाँधी देश के युवाओं की धड़कन बन गए है। वे अपने निजी स्वार्थ को न देखते हुए सक्रिय राजनीति में है। राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों की मानें तो २०१४ में होने वाले लोकसभा चुनाव में ये दोनों ही हस्तियां अपनी-अपनी पार्टियों के लिए सबसे बड़ी और अहम भूमिका निभाएंगी।

अब हम बात करते है भ्रष्टाचार जैसे ज्वलनशील मुद्दे पर। जिस तरह आज हमारा देश भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को लेकर जागरूक हुआ है उसका सारा श्रेय समाज सेवी अन्ना हजारे को ही जाता है। अन्ना जी ने जिस तरह भ्रष्टाचार का मुद्दा देश की जनता के सामने उठाया है उससे पूरे देश में क्रांति ला दी है।  केंद्र सरकार या राज्य सरकारों द्वारा किए गए कई घोटाले सामने आ रहे है। अगर हमारा देश सुधार के रास्ते पर चलता है तो इसका काफी कुछ श्रेय अन्ना जी को ही जाएगा। आने वाला राजनीतिक परिवर्तन भी इन्हीं की वजह से कहलाएगा। यूं कहे तो अन्ना जी जो देश के लिए कर रहे है वो हमें महात्मा गांघी की याद दिलाता है। हमारा भारतीय समाज इस महापुरुष, अन्ना हजारे का आभार व्यक्त करता है।

आज भारतीय समाज में महिलाओं को जो मान सम्मान दिया जा रहा है वह काबिले तारीफ है, पर उसमें भी देखा जाए तो अविवाहित महिलाएं ज्यादा लोकप्रिय है। इनमें अगर हम कुछ नाम लें, जैसे- ममता बनर्जी ,जयललिता, मायावती, उमा भारती। अब इन नामों को देखा जाए तो ममता बनर्जी और जयललिता क्रमशः पश्चिम बंगाल और तमिल नाडू की मुख्यमंत्री है। अब मायावती और उमा भारती क्रमशः उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री रह चुकी है। यानी भारतीय राजनीति में इन महिलाओं को विशेष स्थान मिल चुका है। भविष्य की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी पार्टी को इनके सहयोग के बिना सरकार बनाना मुश्किल दिखाई देता है। यानी आने वाले लोकसभा चुनाव में ये महिलाएं अपनी अहम भूमिका निभाएंगी।
 
अब हम उद्योग जगत के क्षेत्र में चर्चा करे तो हिंदुस्तान का सबसे सम्मानीय उद्योग घराना टाटा समूह का नाम सबसे ऊपर देखा जाता है। जिससे जुड़ी शख्तियत रतन टाटा है। वे भी अविवाहित है। उन्होंने देश में हमेशा से ही ऐसा व्यापार किया है जिससे कि देश की जनता का भला हो, ऐसे प्रोडक्ट जनता के सामने पेश किए, जिसे लोग उसे आसानी से अपना सके। आज भी देश में टाटा के प्रोडक्ट सबसे ज्यादा विश्वसनीय माने जाते है। यहां तक की देश की जनता को १ लाख की कार टाटा नैनो दे दी और निस्वार्थ भाव से आज भी निरंतर देश की जनता के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत रखते है।

अगर हम भारतीय फिल्म उद्योग की बात करें तो आज का सबसे बड़ा सुपरस्टार, जिसकी पूरी दुनिया दीवानी है जिसके फेसबुक पर आते ही सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को भी पीछे छोड़ दिया, ऐसी चाहत लोगो के दिलों में बिठाने वाले और अपनी जिंदगी के ४७ बसंत देख लेने के बाद भी अभी तक अविवाहित है। जी हां हम सलमान खान के बारे में बात कर रहे है। जिन्होंने लगातार ५ सुपर हिट फिल्म देकर भारतीय फिल्म जगत के सबसे महंगे और सबसे चहेते सितारे बन गए है। सलमान खान के बारे में कहा जाता है की " वो यारो के यार है " और समाज सेवा के क्षेत्र में वो गरीब व अनाथ बच्चों के लिए चेरिटेबल ट्रस्ट भी चलाते है उनकी "Human Being"  ट्रस्ट काफी शोहरत बटोर चुकी है. हमारा इस सुपरस्टार तो सत-सत सलाम !

तो दोस्तों! यही वे लोग है, जिन्हें लेकर आज के हिंदुस्तानी काफी क्रेजी है। इसीलिए कहा जाता है-"Indian crazy for unmarried personality"                                                                                                                   
         (लेखक अरशद अली छिंदवाड़ा जिले के मूलनिवासी है। फिलहाल मुंबई में कार्यरत है।)

बुधवार, 4 जुलाई 2012

छिंदवाड़ा में जन्मा पाकिस्तानी ‘लाल’ सरहदों में उलझा

छिंदवाड़ा (एजेंसी).महज दो दिन पहले ही इस दुनिया में आने वाला “रेहान” दो देशों की सरहदों के बीच उलझ गया है. रेहान के माता-पिता और अन्य परिजनों ने यह नहीं सोचा था कि थोड़ा-सा वक्त छिंदवाड़ा में गुजारने का सुख उन्हें परेशानी में डाल देगा.

दरअसल, पाकिस्तान के सियालकोट में रहने वाली हमीदा बानो ने मंगलवार को जिला चिकित्सालय में एक बच्चे को जन्म दिया है. वीसा पर भारत आई हमीदा और उसके परिजन रेहान के दुनिया में आने से तो खुश हैं लेकिन अब परेशानी अपने घर लौटने में आ रही है.

परिवार में नए सदस्य के जुड़ने से अब उन्हें रेहान को पाकिस्तान ले जाने के लिए उच्च स्तर पर अनुमति लेनी होगी जिसमें समय लग सकता है. वहीं हमीदा बानो के साथ पाकिस्तान से आए परिजनों को ४ जुलाई को खत्म हो रही वीसा अवधि को बढ़ाने की मशक्कत भी करनी पड़ेगी.

छिंदवाड़ा में राज टॉकीज के पास रहने वाले अब्दुल सत्तार खान पंजाबी की पुत्री हमीदा बानो का निकाह पाकिस्तान के सियालकोट में रहने वाले मोहम्मद शरीफ के साथ हुआ था. इस दंपति के पहले से पांच बच्चे हैं. गत ४ जून को हमीदा बानो अपने परिवार के साथ छिंदवाड़ा अपने मायके आई थी. उन्हें सरकार ने ४ जुलाई तक का वीसा प्रदान किया है.

गर्भावस्था में छिंदवाड़ा आई हमीदा को पाकिस्तानी डॉक्टरों ने बताया था कि उनकी डिलेवरी संभवतः जुलाई के दूसरे सप्ताह में होगी. हमीदा निश्चिंत थी कि तब तक वह अपने मायके से ससुराल यानि सियालकोट लौट जाएगी. लेकिन पाकिस्तानी डॉक्टरों का कयास गलत साबित हुआ और हमीदा ने समय पूर्व २६ जून की रात जिला चिकित्सालय में एक बालक को जन्म दे दिया.

बालक के जन्म लेते ही परिवार में खुशी की लहर तो दौड़ी लेकिन माथे पर चिंता की लकीरें भी उभर आईं. दरअसल, इस परिवार के पास ४ जुलाई तक का वीसा है. उन्हें ट्रेन से पाकिस्तान लौटना है.
दिल्ली से अटारी के लिए सप्ताह में दो दिन बुधवार और रविवार को ट्रेन निकलती है. इस सप्ताह रविवार यानि १ जुलाई और बुधवार ४ जुलाई को दिल्ली से अटारी ट्रेन जाना है. पहले तय कार्यक्रम के मुताबिक हमीदा का परिवार १ जुलाई को दिल्ली से अटारी के लिए निकलने वाला था. ताकि वीसा अवधि समाप्त होने के पहले वे वापस पाकिस्तान पहुंच जाएं. लेकिन रेहान के जन्म से अब वीजा अवधि तक पाकिस्तान लौट पाना संभव नहीं है.

सोमवार, 14 मई 2012

पाटनी पिक्चर पैलेस में जो बच्चा रोया था

विष्णु खरे
मेरे शहर छिंदवाड़ा का बेहतर सिनेमा-घर, जिसका नाम बहुत रोबदार था– पाटनी पिक्चर पैलेस, हमारे घर से इतना नजदीक था कि आखिरी शो में,  हम उसमें दिखाई जा रही फिल्मों के शमशाद बेगम या मर्दों के गाने, कोरस, डांस म्यूजिक या डायलॉग देर सुनसान रातों में घर-बैठे सुन सकते थे। बहुत छुटपन में मां या बुआओं के साथ ही (और उन्हें भी) सिर्फ ‘धार्मिक’ और ‘सामाजिक’ फिल्में देखने जाने की अनुमति थी। तब `लेडीज’ को बालकनी में बिठाया जाता था, ताकि वे पुरुष दर्शकों से अलग और सुरक्षित बैठ कर चैन से फिल्म देख सकें।

पहली
फिल्म जो मैंने देखी अपनी सबसे पहली फिल्म के बारे में मुझे कुछ स्मृति-विभ्रम है। मुझे अपनी मां की गोद में बैठकर ‘सिकंदर’ या ‘राम-राज्य’ देखने की याद है, लेकिन ‘सिकंदर’ 1941 की है, जब मैं हद-से-हद एक-डेढ़ बरस का रहा हूंगा, जबकि ‘राम-राज्य’ के वक्त ज़रूर तीन बरस का हो चुका था। लेकिन छोटे शहरों में कभी-कभी बहुत लोकप्रिय फिल्में सब बड़ी जगहों के बाद ही दिखाई जाती थीं। ’सिकंदर’ का तब बहुत लोकप्रिय गाना `कदम कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गए जा’ जो सिकंदर बने पृथ्वीराज कपूर और उनके यूनानी घुड़सवारों का प्रयाण-गीत था और अधिकांशतः सिलुएत शैली में फिल्माया गया था, मुझपर स्थायी असर छोड़ गया है। बाद में जब भी मैंने ‘सिकंदर’ या वह गाना टीवी  पर देखा है, मैं पाटनी सिनेमा की उस बालकनी, धुएं से पीले पड़ चुके, उसके कराहते हुए बड़े-बड़े पंखों, वहीं पर बने महिला पेशाब-घर, जिसमें मुझे भी जाना पड़ता था और नीचे की बीड़ी-सिगरेट की मिली-जुली तीखी बू, पिक्चर शुरू होने के पहले और इंटरवल में `पान बीड़ी माचिस सिगरेट’ बेचने वालों की उसी पुकार की दुनिया में पहुंच जाता हूं और अपने को मुश्किल से लौटा पाता हूं। `राम राज्य’ की मुझे ज्यादा याद है, इसलिए वह मेरी पहली फिल्म हो नहीं सकती। वह मन्ना डे की पहली हिंदी फिल्म जरूर है – `चल तू दूर नगरिया तेरी’।

क्लास बंक करके सिनेमा
जबसे कॉलेज शुरू हुए हैं, भारत में उनका एक महती योगदान विद्यार्थियों को बंकिंग के अपराध-बोध से मुक्त करवाना भी है। सिनेमा के मैटिनी शो, यानी तीन बजे, तक तो सारी क्लासेज कभी की हो चुकी होती थीं। लेकिन स्कूलों में नाइंथ क्लास में आ जाना हम जैसे विद्यार्थियों को थोड़े दुस्साहस और एडवेंचर-भाव से भर देता था, हालांकि तब भी स्कूल के चपरासियों तक से डर लगता था। मेरे साथ भयावह स्थिति यह थी कि मेरे स्कूल में मेरे पिता भी मास्टर थे और हाई स्कूल में ही और वह भी फुल मैथेमेटिक्स और फुल साइंस के। वे संसार के कुछ सर्वश्रेष्ठ किन्तु सबसे जंडैल टीचरों में से थे, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जो भी खरे मास्साब से पढ़ा है इसकी तस्दीक कर सकता है, और घर में जो उनका आतंक था वह अब भी अनिर्वचनीय है। लेकिन कहा भी जाता है कि जिसमें सबसे ज्यादा जोखिम हो उस एडवेंचर में अलग ही थ्रिल होती है। मेरे और मुझ जैसे कुछ अन्य विद्यार्थियों की किस्मत से शहर में रेलवे-फाटक के पास एक नया सिनेमा खुल गया, जिसमें 3 से 6 के मैटिनी शो तो होने ही लगे, उनमें अंग्रेजी फिल्में! 1954-55 में छिंदवाड़ा में अंग्रेजी फिल्में!! – भी दिखाई जाने लगीं। चार्ली चैप्लिन, लॉरेल-हार्डी, बस्टर कीटन आदि की और फ्रान्केंस्टाइन, ड्रैकुला, द इनविजिबल मैन, फ्लैश गोर्डन वगैरह और हिंदी की ‘शबाब’ जैसी फिल्में भी मैटिनी में लगीं। तो यदि दो बजे के बाद खतरनाक टीचरों की अनिवार्य क्लासें नहीं रहती थीं, लास्ट पीरियड  खेल का होता ही था, तो हम चार-पांच मरजीवड़े अलग-अलग पतली गलियों से कट कर अपनी फिल्मी मंजिले-मकसूद की जानिब रुख करते थे। सेकंड क्लास का टिकट सात आने का होता था। `शबाब’ शायद एक हफ्ता चली और मैंने तथा (अब दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय गोल्फ-कोर्स विशेषज्ञ) इन्दरवीर सिंह (जुनेजा) ने पांच बार देखी। वह बहुत खूबसूरत था और जब केश खोल कर ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में नूतन-प्रेरित पोर्शिया बनता था,  तो बधाई देने हेतु उसे गले लगाने के लिए बेताब वयस्क शहरी प्रशंसकों की शौकीन भीड़ को स्कूल-मंच के पीछे से तितर-बितर करना पड़ता था।

विश्व सिनेमा और हम
पूरे भारतीय सिनेमा पर टिप्पणी कर पाना बहुत कम लोगों के बस की बात होगी। अपने सारे अज्ञान की धृष्टता से साथ कह सकता हूं कि विश्व के एक महानतम निदेशक, जो हमारे शाश्वत गर्व के लिए हमारे यहीं हुए, सत्यजित राय के सर्वोत्तम सक्रिय 25 वर्ष, यानी 1955 की ‘पथेर पांचाली’ से लेकर 1980 की ‘सद्गति’ तक, या थोड़ी रियायत लेकर 1984 की ‘घरे बाहिरे’ तक, एक विचित्र  संयोग से भारतीय सिनेमा के भी सर्वश्रेष्ठ वर्ष हैं। सभी प्रमुख भाषाओं के वे निदेशक, जिन्होंने भारत को विश्व सिनेमा  पर एक अस्मिता दी, इसी दौर में उभरे। इन्हीं वर्षों में हमारी फिल्मों को सर्वाधिक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। सूची बहुत लंबी है। मुझे एक चीज समझ में नहीं आती कि मराठी और गुजराती में सार्थक सिनेमा इतना पिछड़ा  क्यों  रहा। 1990 तक हमारे सिनेमा ने विश्व सिनेमा में कुछ स्थान बनाया।  

दुर्भाग्यवश, सत्यजित राय को छोड़कर भारत से कोई और वैसा आदर, ख्याति और स्वीकृति अर्जित नहीं कर सका। आज प्रतिष्ठित फिल्मोत्सवों में भारत को अच्छी फिल्मों के अभाव के कारण ही याद किया जाता है। भारतीय डाइस्पोरा और डॉलर, पौंड, यूरो आदि मुद्राओं के आगे रुपये की कमजोरी के कारण कुछ भारतीय फिल्में विदेशों में करोड़ों का बिजनेस दिखा देती हैं, लेकिन रूस और एशिया के कुछ हमसे भी पिछड़े देशों को छोड़ कर अधिकांश वास्तविक विदेशी दर्शक हमारी फिल्में देखने नहीं जाते। सभी दृष्टियों से हमारी लोकप्रिय फिल्में हॉलीवुड की तीसरे दर्जे की फिल्मों से भी बचकाना हैं। मुझे कभी-कभी हॉलैंड के रोत्तर्दम फिल्मोत्सव को देखने का मौका मिल जाता है, लेकिन  मैं वहां लोकप्रिय या सार्थक भारतीय फिल्में, उनके निदेशक या अभिनेता बहुत कम देख पाता हूं। यही हाल एक बार कान और एक बार ला रोशेल में नजर आया। बर्लिन, कान, वेनिस, लोकार्नो सरीखे फिल्मोत्सवों में अब भारतीय फिल्मों को पुरस्कार-मिलना बंद हो चुका है। 

मेरी पसंद की दस फिल्में
पिछले सौ साल का पूरा, मूक और सर्वभाषिक, भारतीय सिनेमा कहां देखने को उपलब्ध है? कथित कला-सिनेमा की बात करें, राय नहीं करते थे, तो सिर्फ राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन और बिमल राय ही मेरी पसंद की दस फ़िल्में लेकर भाग निकलेंगे। जब फर्स्ट-रेट उपलब्ध है, तो रियायत देकर सेकंड-रेट को क्यूं चुनूं? लेकिन यदि आज हिंदुस्तानी की दस लोकप्रिय फिल्में चुनना हो तो मैं ‘रामराज्य’, `किस्मत’, `आज़ाद’, `देवदास’,’ श्री 420’, `पाकीज़ा’, `चलती का नाम गाड़ी’, `संघर्ष’, `प्यासा’, `उमराव जान’ और `पानसिंह तोमर’ को छाटूंगा। 


मेरा फेवरिट फिल्मकार
मैं सत्यजित राय के आगे भारत में किसी को भी मान नहीं सकता। विश्व में भी वे शीर्षस्थों में से एक हैं। मैं उनसे तीन बार मिला हूं और छह बार उनके चरण छुए हैं और धन्य हुआ हूं। बेशक उनकी कुछ फिल्में उन्हीं के निर्मित मानदंडों से कुछ नीचे रह जाती हैं लेकिन किसी ने कम-से-कम दस फिल्में महान बनाई हों, यह अब भी अकल्पनीय लगता है। 


मोस्ट ओवररेटेट और अंडररेटेड
हिन्दुस्तानी लोकप्रिय सिनेमा में यह कहना मुश्किल है कि ‘मुगल-ए-आजम’ ज्यादा ‘ओवररेटेड’ है या ‘शोले’। एक को पृथ्वीराज कपूर ने चलाया, दूसरी को अमजद खान ने। वैसे ‘कागज के फूल’ भी कम पकाऊ  नहीं है।  सबसे अधिक ‘अंडररेटेड’, बल्कि देखी ही नहीं गई, फिल्म जिया सरहदी की दिलीप कुमार–मीना कुमारी वाली ‘फुटपाथ’ है। उसकी अपने वक्त से बहुत आगे की  विषयवस्तु एक ड्रग-माफिआ, जन-द्रोह और मध्यवर्ग का नैतिक पतन हैं। आज उसे अनुराग, विशाल या तिग्मांशु सरीखे युवा ‘रीमेक’ कर सकते हैं। अंत में दिलीप कुमार का इकबालिया बयान इतना मार्मिक है कि मैं बारह बरस की उम्र में पाटनी पिक्चर पैलेस में रो दिया था। छिन्दवाड़ा क्या, अच्छे-अच्छे शहरों में वह एक ही दिन चल पाई थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि हबीब तनवीर उसमें एक्स्ट्रा की हैसियत से एक तहमद-छाप चाकूबाज गुंडा बने हैं, जो दिलीप कुमार को मारना चाहता है। जब मैंने हबीब भाई से पूछा तो उन्होंने मजाक में मुझसे कहा था कि किसी और को बताना मत, वर्ना वह चाकू अब भी मेरे पास है। 


नई तकनीक और सिनेमा
बड़े या महान सिनेमा को आमतौर पर  तकनीकी तामझाम की जरूरत नहीं होती। अब तो मोबाइल पर फिल्में बना डालने का जमाना है। वीडियो कैमरे बेहद सस्ते हैं। फिल्म बनाना अब कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक, अधिक ‘टपोरी’ हो गया है। सुना है पिछले एक-दो वर्षों में करीब 150 युवा पहलवान फिल्मी अखाड़े में कूदे हैं। देखना है कि सत्यजित गुरु की लंगोट कसने और गुर्ज उठाने  के लायक कोई पट्ठा सामने आता है या नहीं।   


(सौ साल के सिनेमा में नॉस्टेल्जिया भी है और आज की बात भी है। कौन है इस सिने-सदी का सबसे महान फिल्मकार और विश्व सिनेमा के मुकाबले कहां खड़े हैं हम? ऐसे ही कई सवालों के जवाब में देशी-विदेशी सिनेमा पर नजर रखने वाले वरिष्ठ कवि की टिप्पणी )


अमर उजाला मनोरंजन से साभार


सोमवार, 2 अप्रैल 2012

पूर्व केंद्रीय मंत्री एन.के.पी. साल्वे नहीं रहे


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, कट्टर विदर्भवादी व पूर्व केंद्रीय मंत्री एन.के.पी. साल्वे राजनीति में सक्रिय होने के बावजूद कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र से भी सर्मपित रूप से जुडे. थे. सामाजिक कायरें में हिस्सा लेने के लिए वे सदैव तत्पर रहते थे.

पृथक विदर्भ राज्य के निर्माण के लिए जीवनभर सक्रिय रहे. ऐसे में उनके निधन से विदर्भ आंदोलन को बड.ा धक्का पहुंचा है. 18 मार्च को साल्वे ने नागपुर में ही 91वां जन्मदिन मनाया था. उसके बाद कुछ दिनों के लिए वे दिल्ली चले गए थे. वहां उनका स्वास्थ्य बिगड. गया.उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया. रविवार 1 अप्रैल को सुबह पौने छह बजे अस्पताल में ही उनका निधन हो गया.

वे अपने पीछे पुत्र प्रसिद्ध वकील हरीश साल्वे और पुत्री सेंटर प्वाइंट स्कूल की संचालिका अरुणा उपाध्याय, बहू, दामाद, रिश्तेदारों सहित भरापूरा परिवार पीछे छोड. गए हैं. गांधी-नेहरू परिवार पर उनकी असीम o्रद्धा थी. साल्वे ने लगभग 35 साल संसद में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया और विभिन्न पदों को सुशोभित किया. मध्यप्रदेश के छिंदवाड. में 18 मार्च 1921 में उनका जन्म हुआ. फिर भी o्री साल्वे की कर्मभूमि नागपुर थी. बीकॉम के बाद उन्होंने सीए की पढ.ाई की. प्रसिद्ध वकील ननी पालखीवाला की प्रेरणा से राजनीति में आए. 1967 में बैतूल लोकसभा क्षेत्र से विजयी रहे. तब से वे इंदिरा गांधी के सबसे विश्वसनीय नेताओं के रूप में कांग्रेस में पहचाने जाने लगे. आपातकाल के बाद भी उन्होंने इंदिराजी का साथ नहीं छोड।ा। वर्ष 1980 में जब इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आईं तो उसके बाद वर्ष 1982 में o्री साल्वे को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिला. तब से काफी समय तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे. उस दौरान उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों में काम किया.

वे राजीव गांधी के विश्‍वसनीय भी रहे. देश में विद्युत क्षेत्र के निजीकरण व विदेशी निवेश को सहूलियत दिलाने में साल्वे का अहम योगदान रहा. दाभोल बिजली परियोजना उनकी ही देन है. देश की बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने विद्युत क्षेत्र के निजीकरण पर बल दिया.

राजनीति में सक्रिय होने के बाद भी उन्हें क्रिकेट से काफी लगाव था. शालेय व कॉलेज जीवन में वे नागपुर के मोदी क्रिकेट क्लब से क्रिकेट खेलते थे. वर्ष 1943 में अंपायरों के पैनल में थे. वर्ष 1982 से 1985 के बीच उन्होंने बीसीसीआई के अध्यक्ष पद को भी विभूषित किया. खास बात यह है कि उनके ही कार्यकाल में भारतीय टीम विश्‍वकप अपने नाम करने में सफल रही थी.

साल्वे को शुरू से ही कट्टर विदर्भवादी के तौर पर पहचाना जाता है. विदर्भ को अलग राज्य के रूप में वे देखना चाहते थे. उसके लिए वे सतत तत्पर रहे. इसके लिए कई बार उन्होंने संसद में भी आवाज बुलंद की. अंतिम समय तक वे विदर्भ को अलग राज्य के रूप में देखना चाहते थे. लेकिन दुर्भाग्य से उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई. सक्रिय राजनीति में आने के पहले वे देश के प्रसिद्ध सीए के तौर पर पहचाने जाते थे. वर्ष 1949 से उन्होंने सीए की प्रैक्टिस शुरू की थी. उस दौरान उन्होंने गायिका लता मंगेशकर, अभिनेता दिलीप कुमार जैसी हस्तियों के कर सलाहकार का काम देखा. कर प्रणाली और कर सुधार के मामले में उन्हें काफी अध्ययन था. संसद में संबंधित विषय पर उनके भाषणों को आज भी याद किया जाता है. o्री साल्वे शेरो-शायरी के भी जानकार थे. असंख्य उर्दू शेर उन्हें याद थे. अपनी शेरो-शायरी से भी वे लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते थे.

इंदिरा गांधी के प्रति निष्ठावान
एन.के.पी. साल्वे वर्ष 1967 में पहली बार बैतूल लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनकर आए थे. तब से वे इंदिरा गांधी के प्रति निष्ठावान ही रहे. वे इंदिराजी के नजदीकी माने जाते थे. इंदिराजी का साथ उन्होंने कभी भी नहीं छोड.ा. 1977 में इंदिराजी की राजनीति में वापसी में उनका योगदान रहा.

ठुकराया मुख्यमंत्री पद
गांधी परिवार के नजदीकी o्री साल्वे को इंदिरा गांधी व राजीव गांधी की तरफ से तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उतनी ही विनम्रता से साल्वे ने राज्य का सर्वोच्च पद स्वीकार करने से मना कर दिया था. उनका कहना था कि सरपंच पद पर काम कर चुका व्यक्ति ही राज्य के मुख्यमंत्री का पद योग्य तरीके से संभाल सकता है.

क्रिकेट से असीम प्रेम
श्री साल्वे को क्रिकेट से असीम प्रेम था. शालेय जीवन से ही वे क्रिकेट खेलने लगे थे. वे नागपुर के मोदी क्लब की ओर से क्रिकेट खेलते थे. वर्ष 1982 से 1985 के बीच वे बीसीसीआई के अध्यक्ष भी रहे. वर्ष 1983 में पहली बार एशिया क्रिकेटकाउंसिल में अध्यक्ष के तौर पर उनका चयन हुआ.

अंतिम इच्छा
91वें जन्मदिवस के मौके पर एन.के.पी. साल्वे ने कहा था कि विदर्भ को अलग राज्य का दर्जा मिलना चाहिए. और यही मेरी अंतिम इच्छा भी है. उनका कहना था कि एक बार यदि विकसित क्षेत्र से किसी अविकसित इलाके को जोड. दिया जाए तो विकास विकसित हिस्से का ही होता है. इसकी तुलना में अविकसित हिस्सा और पिछड.ता जाता है. यही इतिहास में भी दर्ज है. पृथक विदर्भ के लिए उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री वसंत साठे के साथ मिलकर आंदोलन चलाने का प्रयास किया, लेकिन बढ.ती उम्र के कारण वे आंदोलन नहीं कर सके.

जीवन यात्रा

नाम : नरेंद्रकुमार प्रसादराव (एनकेपी) साल्वे
जन्म : 18 मार्च 1921
जन्मस्थल : छिंदवाड.ा (मध्यप्रदेश)
पत्नी: डॉ. अम्ब्रिती
पुत्र : हरीश साल्वे
पुत्री : अरुणा उपाध्याय
शिक्षण: बीकॉम, सीए
व्यवसाय : वर्ष 1949 से 1982 के बीच देश के प्रतिष्ठित सीए के रूप में पहचाने गए
बैतूल लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व : वर्ष 1967 से 1977 तक.
राज्यसभा सदस्य -1978 से 2002 तक
1980 से 82 तक संसद में कांग्रेस के उपनेता
1982 से 83 तक सूचना व प्रसारण राज्यमंत्री
1982 से 1985 तक बीसीसीआई के अध्यक्ष
1983 से 1984 तक इस्पात व खान राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
1984 में संसदीय कार्य राज्यमंत्री
1985 से 90 तक संसद में कांग्रेस के उपनेता
1987 से 1990 तक नौवें वित्त आयोग के अध्यक्ष
1993 से 1996 तक केंद्रीय ऊर्जा मंत्री
लेखन: 'इज इंडिया दी हाईएस्ट टैक्स्ड नेशन', 'स्टोरी ऑफ रिलायंस कप' नामक पुस्तक प्रसिद्ध हैं. इसके अलावा 'कर प्रणाली प्रबंध' लिखा.

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

कमलनाथ के छि‍दवाड़ा को रेल मंत्री ने दीं ढेरों सौगातें

14मार्च को संसद में रेल बज़ट पास हुआ जिसमें कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को ढेर सारी सौगातें मिली| इसे कमलनाथ का व्यक्तिगत प्रयास कहें या छिंदवाड़ा के प्रति कुछ कर गुजरने की लगन यह सोच का विषय विरोधियों के लिये हो सकता है किंतु छिंदवाड़ा की जनता के अपार लगाव तो स्पष्ट झलकता ही है|

जन अपेक्षाओं से भी ज्यादा यहां रेलवे सुविधाओं की गति को विस्तार देते हुये उन्होंने यह सिद्ध तो कर ही दिया है कि वे छिंदवाड़ा के विकास के लिये कितने क्रियाशील हैं| सरकार में उनकी पहुँच को भी बखूबी जाना जा सकता है| छिंदवाड़ा से नागपुर अमान परिवर्तन का काम तीव्र गति से चल ही रहा है अब इस लाइन को विद्युतीकृत करने के लिये के लिये योजना आयोग के द्वारा 250 करोड़ स्वीकृत होने के बाद इस साल के बज़ट में शामिल होने से यह निश्चित हो गया है कि अमान परिवर्तन के साथ ही यह रेलमार्ग विद्युतीकृत हो जायेगा|

छिंदवाड़ा से आमला के बीच एक और लाइन डालने की स्वीकृति इस बज़ट में मिलने से यह रेल पथ दुहरी लाइन का हो जायेगा और इस लाइन के विद्युतीकरण की सौगत भी इस रेलवे बज़ट में मिलने से नागपुर छिंदवाड़ा आमला लाइन संपूर्ण विद्युतीकृत हो जायेगी और शीघ्र ही दक्षिण से उत्तर की ओर जाने वाली लंबी दूरी की कुछ गाड़ियां छिंदवाड़ा होकर निकलने लगेंगी| अभी उत्तर अथवा दक्षिण की ओर यात्रा करने में जो समय लगता है उसमें कमी आयेगी ही छिंदवाड़ा क्षेत्र के यात्रियों को वे सुविधायें भी मिलने लगेगीं जो बड़े शहर के यात्रियों को मिलती हैं|

पिछले बज़ट में छिंदवाड़ा झांसी और छिंदवाड़ा ग्वालियर ट्रैन को रॊहिल्ला सराय [दिल्ली] तक चलाने की घोषणा सप्ताह में केवल चार‌ दिन चलाने के लिये हुई थी| इस बज़ट में इसे सातों दिन चलाने की घोषणा कर दी गई है| अब इस क्षेत्र के यात्री प्रतिदिन इस गाड़ी से यात्राकर सकेंगे|

निकट भविष्य में छिंदवाड़ा बुंदेलखंड से भी जुड़ेगा |इसके लिये इस रेल बज़ट मे छिंदवाड़ा से गाडरवाड़ा सागर बांदा खजुराहो रेल मार्ग के निर्माणके लिये घोषणा करवाकर कमलनाथ ने एक निष्ठावान समर्थ और प्रभावशाली सांसद होने का परिचय दिया है| आने वाले समय में छिंदवाड़ा खजुराहो जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल से सीधे ही जुड़ जायेगा| छिंदवाड़ा एक बड़ा जंक्शन होगा|

छिंदवाड़ा में तो माडल स्टेशन बन ही रहा है परासिया स्टेशन को भी माडल स्टेशन बनाने के लिये भी इस बज़ट में घोषणा कमलनाथ के अथक प्रयासों का प्रतिफल ही है|

साभार प्रवक्ता

http://www.pravakta.com/railway-minister-kamal-nath-had-a-lot-of-chidvadha-sugaten/railway-2

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

छिंदवाड़ा की बात बड़ी है : प्रभुदयाल श्रीवास्तव

छिंदवाड़ा की बात बड़ी है

टिक टिक चलती तेज घड़ी है
छिंदवाड़ा की बात बड़ी है |

साफ और सुथरी सड़कें हैं
गलियों में भी नहीं गंदगी
यातायात व्यवस्थित नियमित
नदियों जैसी बहे जिंदगी

लोग यहां के निर्मल कोमल
नहीं लड़ाई झगड़े होते
हिंदु मुस्लिम सिख ईसाई
आपस में मिलजुलकर रहते

रातें होती ठंडी ठंडी
दिन में होती धूप कड़ी है

छिंदवाड़ा की बात बड़ी है|

वैसे तो नगरी छोटी है
लगता जैसे महानगर हो
कार मोटरें चलती इतनी
जैसे कोई बड़ा शहर हो

यहां मंत्रियों नेताओं ने
काया कल्प किया मनभावन
बिजली के रंगीन नज़ारे
शहर हो गया लोक लुभावन

भोर भोर सोने की रंगत
चांदी जैसी शाम जड़ी है

छिंदवाड़ा की बात बड़ी है|

घने घने पर्वत जंगल हैं
धवल नवल नदियों की धारा
दिख जाता पातालकोट सा
दिव्य मनोहर भव्य नज़ारा

बैगा और‌ गोंड़ दिख जाते
अपने कंधे गठरी लादे
कितने भोले कितने निर्मल
निष्कलंक हैं सीधे साधे

ईश्वर के पथ पर जाने को
निर्मल मन ही प्रथम कड़ी है

छिंदवाड़ा की बात बड़ी है|

पर सेवा का भाव यहां के
जनमानस में भरा पड़ा है
भले साधना साधन कम हों
लोगों का दिल बहुत बड़ा है

नहीं धर्म आपस में लड़ते
जात पांत में नहीं लड़ाई
हिंदु मुस्लिम सिख ईसाई
गाते मिलकर गीत बधाई

दीवाली से गले मिलन को
ईद राह में मिली खड़ी है

छिंदवाड़ा की बात बड़ी है |

यहां प्रगति का पहिया हरदम
काल समय से आगे चलता
जिसको जो भी यथा योग्य हो
अपनी महनत फल से मिलता

सब्जी गेहूं गन्ना सोया
यहां कृषक भरपूर उगाते
दूर दूर तक जातीं जिन्सें
धन दौलत सब खूब कमाते

खनिज संपदा और वन उपज
बहुतायत से भरी पड़ी है


छिंदवाड़ा की बात बड़ी है|

नये नये निर्माण हो रहे
बसी नईं आवास बस्तियां
बड़े बड़े दिग्गज आते हैं
आती रहतीं बड़ी हस्तियां

राष्ट्र पथों का संगम होगा
रेलों का एक बड़ा जंक्शन
अलग और बेजोड़ दिखेगा
साफ स्वच्छ माँडल स्टेशन

यत्र तत्र सर्वत्र यहां पर
नव विकास की झड़ी लगी है

छिंदवाड़ा की बात बड़ी है|


लेखक परिचय

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

sabhar- parvakta

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

कमलनाथ और छिंदवाड़ा एक दूसरे के पर्याय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
शहरी विकास मंत्री कमलनाथ और छिंदवाड़ा एक दूसरे के पर्याय हैं। छिंदवाड़ा आज जो भी अस्तित्व है उसका एक बड़ा स्तंभ कमलनाथ जी हैं। आज से तीस बरस पहले तक छिंदवाड़ा महज जिला मुख्यालय के रूप में ही जाना जाता था किंतु 1980 के बाद जब से कमलनाथ ने ...

http://www.pravakta.com/kamal-nath-chhindwara-synonymous-to-each-other

शनिवार, 7 जनवरी 2012

छिंदवाड़ा में इंजीनियर के घर 10 करोड़ की संपत्ति

इंदौर : मध्यप्रदेश में एक सहायक इंजीनियर के इंदौर और छिंदवाड़ा जिले में घरों पर लोकायुक्त पुलिस के छापे में भारी नकदी और सोने के अलावा करीब 10 करोड़ रुपए की संपत्ति का पता चला है। अधिकारियों ने बताया कि भारी संपत्ति, भूखंडों और नकदी के बारे में मिली शिकायतों के बाद आज लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र सिंह की अगुवाई में अलग-अलग टीम ने सहायक इंजीनियर रामलखन के इंदौर और छिंदवाड़ा में आवासों पर छापे मारे।

उन्होंने बताया कि अब तक दो बड़े आवासों, इंदौर में चार भूखंडों और मुरैना जिले में एक भूखंड का पता चला है जिसकी कीमत 9-10 करोड़ रुपए आंकी गई है। शहर में उनके दो आवासों से नकद 88 लाख रुपए, एक लाख का सोना, फिक्स्ड डिपोजिट की रसीद, एलआईसी पॉलिसी जब्त की गई है। उन्होंने बताया कि छिंदवाड़ा में जनजातीय विकास विभाग के इस इंजीनियर से पूछताछ की जा रही है। (एजेंसी)

Saturday, January 7, 2012,17:17