शनिवार, 29 जनवरी 2011

छिंदवाड़ा : मशहूर रेडियो एनाउंसर युनुस खान की यादों में


आजकल विविध भारती के अहाते में घुसते ही सब बड़ा सुकून महसूस कर रहे हैं । और इसकी वजह ये है कि विविध भारती के अहाते में आजकल एक गुलमोहर दहक रहा है ।

गुलमोहर मेरी स्‍मृतियों में शामिल रहा है । अभी भी याद है गुलमोहर के लाल होने का मतलब था परीक्षाओं का क़रीब आ जाना । स्‍कूल और कॉलेज की पढ़ाई के दिनों में कभी तसल्‍ली से गुलमोहर के नीचे बैठने का सौभाग्‍य नहीं मिला ।

मुझे याद है म.प्र. के शहर छिंदवाड़ा में हमारे कॉलेज के मैदान के एक छोर पर गुलमोहर का पेड़ था । उसमें लाल फूलों की बहार आई होती थी और हम साइंस की पढ़ाई में बौराये से फिरते थे । फुरसत तक नहीं होती थी उसे देखने की । एक दिन एक मित्र ने कहा—‘ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारे पीछे कुत्‍ता छोड़ रखा है, क्‍या दिन हैं यार, गुलमोहर के नीचे बैठने तक का वक्‍त नहीं है ।‘ और उसके बाद वो भविष्‍य की चिंताओं में डूब गया ।

हम वो लोग थे जो प्री इंजीनियरिंग टेस्‍ट में नाकाम रहे थे यानी मां-बाप के हमें इंजीनियर बनाने के सपने पर पानी फेर चुके थे । इसलिये ज़िंदगी में कोई अच्‍छा कैरियर बनाने का दबाव रहता था । मेरे साथ तो मामला और भी दिलचस्‍प था ।

सामाजिक और पारिवारिक दबाव के तहत मैं बी.एस.सी कर रहा था, वरना मन तो लेखन, पत्रकारिता और रंगमंच में लगता था । उन दिनों में आकाशवाणी छिंदवाड़ा में कैजुअल कंपियर बन चुका था । और युववाणी पेश किया करता था, यानी जो बचा खुचा समय था वो भी खत्‍म । घर वालों ने उम्‍मीद छोड़ दी थी कि इस लड़के को कोई ठीक ठिकाने का कैरियर मिलेगा ।

रेडियोवाणी से साभार
http://radiovani.blogspot.com/2007/05/blog-post_26.html

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

बहुत पसंद हैं मुझे छिंदवाडा के लोग

छिंदवाडा मतलब छिंदवाडा- भाग -2
वो जगह दिल के हमेशा करीब होती है और उस जगह को भी अपनी सफलता का श्रेय जाता है, मगर हम सफलता की चादर से अपनी कमियों को ढकने के बजाए, मिलकर सही दिशा में काम कर सकते हैं.

छिंदवाडा कमलनाथ के नाम से तब तक जोड़ा जाएगा जब तक हम पत्रकारों को नेतागिरी के अलावा कोई ख़ास बात करने का टॉपिक नहीं देंगे. छिंदवाडा बहुत ही शांत और प्यारी जगह है, मुझे यहाँ के लोग बहुत पसंद हैं. कमी लगी तो सिर्फ एक बात की- एमबीशन .

यहाँ पर हम सब बहुत थोड़े में समाधान कर लेते हैं. स्कूल में रट-रटकर अछे नंबर ले आयें तो काफी है, कौनसी डिग्री लेनी है और क्या नौकरी करनी है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता - मगर किस डिग्री के बाद जल्दी से जल्दी ज्यादा पैसा मिलेगा ये मायने रखता है, इत्यादि.

परिवार-पड़ोसियों के प्रपंच, कांग्रेस बीजेपी के मुद्दे, 9 to 5 जॉब और शादियों की तैयारियों से बहार निकलना होगा. ये सोचिये कि जिन शहरों में प्रगति हो रही है, जैसे बम्बई या चेन्नई या कोई भी और मेट्रो. वहां अगर लोग आराम की ज़िन्दगी जिए और छोटे सपनो में समाधान कर लें, तो क्या उन शहरों में प्रगति होगी? फर्क सिर्फ सोच का है. सरकार तो पूरे भारत की झोल है, हम सारा भांडा सरकार के मत्थे नहीं फोड़ सकते!

रही बात उन लोगों कि जो छिंदवाडा में पले बढे हैं, सफल हुए हैं, मगर छिंदवाडा को श्रेय नहीं देते-

कभी गौर फरमाइयेगा कि उन सफल लोगों में काफी लोग दूसरे शहरों में जाकर पढ़ते हैं, दूसरे शहरों में काम भी करते हैं ....भारत बहुत बड़ा देश है और आप किसी भी व्यक्ति की सफलता को एक जगह से नहीं बाँध सकते. श्रेय लूटने के बजाये हमें अपना एमबीशन अपनी महत्वांकांक्षाओं बढाने पर ध्यान देना चाहिए. ये बात बिलकुल सही है कि जहां हमारी शुरुआत हुई थी वो जगह दिल के हमेशा करीब होती है और उस जगह को भी अपनी सफलता का श्रेय जाता है, मगर हम सफलता की चादर से अपनी कमियों को ढकने के बजाए, मिलकर सही दिशा में काम कर सकते हैं.

Sonia Tiwari, Animator
San Francisco (USA)


Email :sonia.emrc@gmail.com

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

छिंदवाड़ा को हमने कुछ नहीं लौटाया

हम यहां 'छिंदवाड़ा मतलब छिंदवाड़ा' सीरिज की पहली कड़ी के रूप में यह अर्टिकल आपके सामने पेश कर रहे हैं। हमें आपके कमेंट, सुझाव और विचारों का इंतजार रहेगा। -
छिंदवाड़ा मतलब छिंदवाड़ा- भाग एक

वास्तव में दोषी हम ही हैं, क्योंकि किसी स्थान की पहचान, वहां रहने वालों से ही होती है और ऐसा नहीं है कि हम असफल है, या हमने कुछ किया ही नहीं है। छिंदवाड़ा के लोगों ने हर क्षेत्र में ना कमाया है और कामयाबी के शिखर तक पहुचे हैं। किंतु उस सफलता का तो छिंदवाड़ा को कभी श्रेय मिला और ही उन व्यक्तियों ने छिंदवाड़ा की ओर पलट कर ही देखा।

भारत की कुछ फीसदी जागरूक जनता जो सम-सामयिक विषयों में रुचि रखती है, वो निश्चित तौर पर छिंदवाड़ा को जानती है, क्योंकि हर लोकसभा चुनावों में छिंदवाड़ा की सीट कई राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल होती है। टीवी न्यूज चैनलों पर चुनाव के एक महीने पहले से ही छिंदवाड़ा में होने वाले संभावित घमासान की चर्चा होती है।
  • क्या छिंदवाड़ा केवल एक व्यक्ति के नाम से ही जाना जाता रहेगा?
  • क्या छिंदवाड़ा की अपनी कोई खूबी नहीं है?
  • क्या छिंदवाड़ा देश के अन्य स्थानों जितना महत्वपूर्ण नहीं है?

इन सवालों को उठाया है छिंदवाड़ा के यूथ अतिशय ने। जवाब जानने के लिए पढि़ए उनका यह अर्टिकल।

मध्य प्रदेश में रहने वाले छिंदवाड़ा को अच्छी तरह से जानते हैं, पर मध्य प्रदेश के बाहर छिंदवाड़ा की अपनी कोई विशेष पहचान नहीं है। भारत की कुछ फीसदी जागरूक जनता जो सम-सामयिक विषयों में रुचि रखती है, वो निश्चित तौर पर छिंदवाड़ा को जानती है, क्योंकि हर लोकसभा चुनावों में छिंदवाड़ा की सीट कई राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल होती है। टीवी न्यूज चैनलों पर चुनाव के एक महीने पहले से ही छिंदवाड़ा में होने वाले संभावित घमासान की चर्चा होती है और इसी बीच जनता जिन शब्दों या व्यक्तियों के नाम सुन लेती है, उन्हें लंबे समय तक याद रखती है। हर पांच वर्षों में ये शब्द और व्यक्तियों के नाम छिंदवाड़ा के नाम के साथ उनके मस्तिष्क में तरो ताज़ा होते रहते हैं।

छिंदवाड़ा की अपनी पहचान को लेकर कुछ सवाल यहां उठाए जा सकते हैं-

क्या छिंदवाड़ा केवल एक व्यक्ति के नाम से ही जाना जाता रहेगा?
क्या छिंदवाड़ा की अपनी कोई खूबी नहीं है?
क्या छिंदवाड़ा भारत के अन्य स्थानों जितना महत्वपूर्ण नहीं है?

गहराई से चिंतन किया जाए तो ऐसा कुछ भी नहीं है,

- बस हम छिंदवाड़ा वासियों ने ही कभी इसे इतनी तवज्जो नहीं दी
- हमने अपनी सफलताओं में छिंदवाड़ा के योगदान को नहीं समझा, और
- छिंदवाड़ा से बहुत कुछ लेने के बाद भी इसे कुछ नहीं लौटाया

वास्तव में दोषी हम ही हैं, क्योंकि किसी स्थान की पहचान, वहां रहने वालों से ही होती है और ऐसा नहीं है कि हम असफल है, या हमने कुछ किया ही नहीं है। छिंदवाड़ा के लोगों ने हर क्षेत्र में नाम कमाया है और कामयाबी के शिखर तक पहुचे हैं। किंतु उस सफलता का न तो छिंदवाड़ा को कभी श्रेय मिला और न ही उन व्यक्तियों ने छिंदवाड़ा की ओर पलट कर ही देखा।

पर 'जब जागे तभी सवेरा' हम अभी भी छिंदवाड़ा को इसकी पहचान दिलाने के लिए प्रयास कर सकते है।

वास्तव में, छिंदवाड़ा की अपनी एक अलग निराली बात है, बस हमें इसे समझना होगा और तभी हम दुनिया के सामने छिंदवाड़ा को इसकी अलग पहचान के साथ पेश कर पाएंगे।

- अतिशय
atishaybio@gmail.com

सोमवार, 10 जनवरी 2011

छिंदवाड़ा मतलब छिंदवाड़ा

छिंदवाड़ा की क्या पहचान... छिंदवाड़ा की कौन सी
बात आपको अच्छी लगती है। कुछ लिखिए छिंदवाड़ा के बारे में। छिंदवाड़ा छवि की विशेष
पेशकश ...छिंदवाड़ा मतलब... कमलनाथ नहीं। छिंदवाड़ा मतलब छिंदवाड़ा। खास आपके सहयोग
से।

(यहां हम न तो कमलनाथ जी के योगदान, उपलब्धियों को कम कर रहे हैं। न तो उस विषय पर चर्चा कर रहे हैं कि छिंदवाड़ा से कमलनाथ बने, या कमलनाथ से आज का छिंदवाड़ा। यह अलग बहस, चर्चा का विषय हो सकता है। लेकिन हम यहां इस विषय पर बात नहीं करेंगे। हम यहां बात करने जा रहे हैं। भारत के ह़दय प्रदेश यानी मध्यप्रदेश के उस खूबसूरत जिले और शहर छिंदवाड़ा की। जो क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश में सबसे बड़ा है। उस जिले की उन महान शख्सियतों के बारे में। जिनके कारण छिंदवाड़ा की एक खास पहचान है। हम कुछ चुनिंदा पर्यटन, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की भी हम चर्चा करेंगे। साथ ही हम आज की न्यू जनरेशन यानी यूथ के बारे में भी चर्चा करेंगे, जो देश के तमाम शहरों और विदेशों में अपनी पहचान बनाने में जुटी हैं। साथ ही अपनी माटी छिंदवाड़ा को भी पहचान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं।)

सवाल- कहां के रहने वाले हो? जवाब- छिंदवाड़ा। फिर सवाल - छिंदवाड़ा कहां? जवाब- छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)। अच्छा-अच्छा कमलनाथ का छिंदवाड़ा।छिंदवाड़ा वालों को अक्सर ऐसे ही सवालों से दो चार होना पड़ता है। मेरे साथ भी यही वाकया पेश आता है। कुछ लोग समझते हैं कि छिंदवाड़ा छत्तीसगढ़ में है। ऐसा मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के बाहर किसी शहर में रहते हुए सुनने को मिलता है। पिछले तीन सालों से मैं दिल्ली में हूँ। यहां अक्सर छिंदवाड़ा को लेकर यही बात होती रहती है। खैंर...।

अब बात। कमलनाथ का छिंदवाड़ा की...। तो छिंदवाड़ा कमलनाथ का नहीं है। न ही कमलनाथ छिंदवाड़ा के। छिंदवाड़ा मतलब... कमलनाथ नहीं है। छिंदवाड़ा मतलब छिंदवाड़ा होता है। कमलनाथ का जन्म १८ नवंबर, १९४६ को कानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। दून स्कूल में उनका एजूकेशन हुआ। बाद में उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। कमलनाथ छिंदवाड़ा के सांसद और छिंदवाड़ा से मंत्री है। इसलिए लोगों को छिंदवाड़ा मतलब कमलनाथ ही याद आता है।

देश में कई जिले हैं। सभी जिलों का नाम सबको याद हो ये जरूरी भी नहीं है। फिर किसी जिले या शहर को अपनी राष्ट्रीय और विश्वव्यापी पहचान बनाने में काफी वक्त लगता है।

वापस कमलनाथ पर आते हैं। यहां यह बताना लाजिमी होगा कि कमलनाथ को पूर्व प्रधानमंत्री स्व। इंदिरा गांधी छिंदवाड़ा लेकर आई थी। छिंदवाड़ा के शुक्ला ग्राउंड (मौजूदा इंदिरा गांधी स्टेडियम) में कमलनाथ को जनता से रूबरू कराया गया था। ये सन १९७९ की बात है। उस समय इंदिरा गांधी ने कमलनाथ को तीसरा बेटा कहा था। कमलनाथ पहली बार ७ वीं लोकसभा के लिए छिंदवाड़ा से सांसद चुने गए थे। इसके बाद वे लगातार वहां से सांसद चुने जाते रहे है।

पंखा वाले बाबा-

कमलनाथ को छिंदवाड़ा में 'पंखा वाले बाबा' के नाम से जाना जाता है। क्योंकि कमलनाथ अपने हेलिकॉप्टर से जिले के दूर-दराज इलाकों में आसानी से पहुंच जाते हैं। कांग्रेस पार्टी की ओर से कमलनाथ तीन दशक से छिंदवाड़ा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें एक-दो बार ही हार का मुंह देखना पड़ा होगा।