मंगलवार, 9 मार्च 2010

बाबा का जन्मदिन, सतपुड़ा के पुरखा संपतराव धरणीधर का जन्मदिन


  1. मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए हुई थी बाबा से मुलाकात
  2. जब मिला तब बाबा धरणीधर पार कर चुके थे 75 बसंत
ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।

बाबा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो छोटे-बड़े सभी को अपनी ओर आकृर्षित करता था। बाबा सभी से बहुत दोस्ताना अंदाज में मिलते और बतियाते थे। बाबा की यादों को मैं कभी भी बिसरा नहीं सकता। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि मैं उनके अंतिम समय में उनके पास नहीं था।
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आज है 10 मार्च। बाबा का जन्मदिन। यानी सतपुड़ा के पुरखा बाबा संपतराव धरणीधर का। 'मुझे फांसी पर लटका दो ... कि मैं भी एक बागी हूं' वाले बाबा। 'किस्त-किस्त जिंदगी' के रचयिता। जब मैं बाबा से मिला वे ७५ बसंत पार कर चुके थे। बाबा से मेरी मुलाकात मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए ही हुई। बाबा का कविता पाठ, इंटरव्यू मैंने आकाशवाणी छिंदवाड़ा से सुना था। जिसमें उनकी बातचीत और कविताओं ने मुझे आकृर्षित किया था। इसके साथ ही यह बात भी मुझे उनकी तरफ खींच रही थी कि वे मेरे गांव तन्सरामाल के नजदीकी कस्बे मोहखेड़ के रहने वाले थे।

उस समय मैं छिंदवाड़ा शहर में ही रहकर कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था। आकाशवाणी जाने का सिलसिला मेरा लगातार जारी था। यही मेरी मुलाकात कार्यक्रम अधिकारी श्री अमर रामटेके जी से हुई। वे उन दिनों बस स्टेशन के पास यादव लॉज में रहते थे। उनसे वहां कई मुलाकातें हुई। एक मुलाकात के दौरान मैंने उनसे बाबा के बारे में पूछताछ की। उन्होंने जिला अस्पताल के कमरा नं। पांच में जाने को कहा। अस्पताल पहुंचने में मुझे पता चला कि वे अब दूसरे कमरे में है। काफी मशक्कत के बाद बाबा से मुलाकात हो गई। फिर मेरी उनसे लगातार मुलाकात होने लगी। ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।

बाबा के पास जाने से मुझे छिन्दवाड़ा के साहित्यिक परिदृश्य को समझने में आसानी हुई। बाबा के कमरे में पाठक मंच (किताबों की समीक्षा के लिए प्रदेशभर के जिलों में गठित इकाई) की बैठक होती थी। उन दिनों से ही पाठक मंच के संयोजक श्री ओमप्रकाश 'नयन' जी थे। इसके अलावा कई कवि गोष्ठियां बाबा के कमरे में होती थी। बाहर से आने वाले उनकी पीढ़ी के कई वरिष्ठ कवि, साहित्यकार भी गोष्ठियों में शामिल होते थे। जिनमें इंदौर के स्वर्गीय नईम जी का नाम मुझे याद आ रहा है।

सन् 95 मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया थ। कविता क्या थी तुकबंदी ज्यादा हुआ करती थी। इसके अलावा दो और चार लाइनें। जिन्हें हम शायरी कहकर मुगालते में रहते थे। पहली मुक्तछंद की कविता मैंने 2001-2002 में लिखी होगी। बाबा से मिलने के बाद मैंने एक कविता बाबा पर ही लिख डाली। जो डीडीसी कॉलेज की मैग्जीन में छपी थी। बाबा से मैंने अपनी आतंकवाद वाली कविता के लिए बातचीत की थी।

बाबा को जब कभी भी बाहर किसी कार्यक्रम में जाना होता था हम यानी राम (बाबा का सहायक) और मैं लेकर जाते थे। हम अक्सर बाबा को लेकर हिन्दी प्रचारिणी और टाउन हॉल जाया करते थे। बाबा से अक्सर मिलने वालों में हनुमंत मनगटे जी, सलीम जुन्नारदेवी जी, लक्ष्मीप्रसाद दुबे जी, राजेद्र राही जी, नयन जी, व्योम जी और कई नाम शामिल थे।

बाबा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो छोटे-बड़े सभी को अपनी ओर आकृर्षित करता था। बाबा सभी से बहुत दोस्ताना अंदाज में मिलते और बतियाते थे। बाबा की यादों को मैं कभी भी बिसरा नहीं सकता। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि मैं उनके अंतिम समय में उनके पास नहीं था।

रामकृष्ण डोंगरे 'तृष्णा'

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