शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

"भारती भा गई !!!"


"भारती भा गई !!!"

तिलक का हो गया शगुन
मिल गए सारे गुण
शादी की घडी आ गई
डोंगरे को भारती भा गई

कोई मिल गया
दिल का फूल खिल गया
जन्मों का रिश्ता मिल गया
साथ निभाने का वचन हो गया

आयोजन हुआ तिलक का
19 दिसम्बर रविवार
हो गया डोंगरे को
भारती से प्यार

dear all pls meet my soulmate "BHARTI"(soon would be mrs dongre)

बुधवार, 24 नवंबर 2010

केंद्र ही भूल गया पातालकोट

छिंदवाड़ा ज़िले में स्थित पातालकोट क्षेत्र प्राकृतिक संरचना का एक अजूबा है. सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों की गोद में बसा यह क्षेत्र भूमि से एक हज़ार से 1700 फुट तक गहराई में बसा हुआ है. इस क्षेत्र में 40 से ज़्यादा मार्ग लोगों की पहुंच से दुर्लभ हैं और वर्षा के मौसम में यह क्षेत्र दुनिया से कट जाता है.
पातालकोट 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां कुल 12 गांव और 27 छोटी-छोटी बस्तियां हैं, लेकिन आज़ादी के 40 वर्ष बाद 1985 में इस क्षेत्र के सबसे बड़े गांव गैलडुब्बा को पक्की सड़क से जोड़ा गया. अभी 12 गांव और 27 बस्तियां सड़क सुविधा से अछूती हैं.
पातालकोट में भारिया जनजाति सदियों से बसी हुई है, लेकिन आज़ादी के छह दशक बाद भी यह क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से बुरी तरह कटा हुआ है. कहने को तो विकास और जनकल्याण की तमाम योजनाएं इस क्षेत्र में काग़ज़ों पर लागू है, लेकिन सरकारी तंत्र की लापरवाही और लालची प्रवृत्ति के कारण इस क्षेत्र के ज़्यादातर लोगों को सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ नहीं मिल रहा है. सरकारी काग़ज़ी हिसाब बताता है कि इस इलाक़े के विकास के लिए सरकार ने 400 करोड़ रुपयों से ज़्यादा खर्च किया है. यह जानकारी तीन साल पुरानी है. तब कांतिलाल भूरिया कांग्रेस के लोकसभा सांसद थे और एक समिति के ज़रिए इस क्षेत्र के विकास और जनकल्याण कार्यक्रमों की जांच भी की गई थी. भूरिया ने इस जांच में गहरी रुचि दिखाई थी, लेकिन जांच के नतीजों और उसके बाद सरकार द्वारा की गई सुधारात्मक कार्यवाहियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. यह सुखद संयोग है कि कांतिलाल भूरिया ही आज देश के आदिम जाति कल्याण मंत्री हैं. उनके मंत्रालय में देश की जनजातियों और वनवासियों के विकास और कल्याण के लिए हर साल अरबों रुपये खर्च होता है. बेहतर होगा कि कांतिलाल भूरिया पातालकोट के प्रति संवेदनशील मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं और विकास की दृष्टि से उपेक्षित गरीबों और अभावग्रस्त लोगों को जनकल्याण और विकास के कार्यक्रमों का लाभ दिलाने की पहल करें.

1985 में बनी पहली सड़क

पातालकोट 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां कुल 12 गांव और 27 छोटी-छोटी बस्तियां हैं, लेकिन आज़ादी के 40 वर्ष बाद 1985 में इस क्षेत्र के सबसे बड़े गांव गैलडुब्बा को पक्की सड़क से जोड़ा गया. अभी 12 गांव और 27 बस्तियां सड़क सुविधा से अछूती हैं.

50 साल बाद झंडा फहराया

भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था, लेकिन पातालकोट में 50 साल बाद 1997 में पहली बार स्वतंत्रता दिवस के दिन स्कूल में तिरंगा झंडा फहराया गया.
सरकारी योजनाओं का हाल यह है कि 1998 में यहां 369 बच्चों में से एक ही बच्चे को विभिन्न प्रकार के टीके लगे थे. यहां शिशुमृत्यु दर और मातृमृत्यु दर सबसे ज़्यादा है.

आंगनवाड़ी केन्द्र बना अफसरों का विश्रामगृह

कहने को 2007 में यहां सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्र खोला और बच्चों को स्वास्थ्य सेवाएं तथा पोषण आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की, लेकिन समय पर चिकित्सा सामग्री और पोषण आहार सामग्री नहीं मिलने से यह केंद्र नियमित काम नहीं करता है.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 3 फरवरी 2007 को पक्के आंगनवाड़ी केंद्र का लोकार्पण किया था, तब उनके साथ शासन के मंत्री, विधायक और ज़िले के कलेक्टर सहित आला अफसर भी पातालकोट में उतरे थे. मुख्यमंत्री ने आंगनवाड़ी केंद्र में रात बिताई और उसके बाद कलेक्टर ने उसमें ताला लगा दिया, अब यह केंद्र ज़िले के छोटे अफसरों के दौरे के समय उनके विश्रामगृह के रूप में काम में लाया जाता है. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने घर से ही काम करती हैं, लेकिन सामग्री के अभाव में वह भी काम करना बंद कर देती हैं.

प्रसव और चिकित्सा के लिए 25 किलोमीटर का लंबा रास्ता

पातालकोट के ग्रामीणों को सरकारी चिकित्सा एवं प्रसव सुविधा का लाभ लेने के लिए अपने गांव से 25 किलोमीटर दूर तामिया जाना होता है। सरकार ने मातृ मृत्यु दर और शिशुमृत्यु दर कम करने के लिए घरों में परंपरागत दवाइयों द्वारा प्रसव कराने पर रोक लगा दी है और संस्थागत प्रसव अर्थात अस्पतालों में प्रसव कराने पर उचित प्रोत्साहन राशि देने का नियम बनाया है, इसके साथ ही कन्या जन्म पर लाडली लक्ष्मी योजना के तहत सरकार कन्या के फिक्स डिपॉजिट भी देती हैं जो कि कन्या के वयस्क हो जाने पर एक लाख रुपए की राशि के रूप में उसे मिलता है. इसलिए सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने का लालच इस इलाक़े के अभावग्रस्त और ग़रीब लोगों में बढ़ता जा रहा है, लेकिन पूरे इलाक़े में आसपास कोई अस्पताल है ही नहीं. मजबूरी में यहां के निवासियों को अपनी गर्भवती महिला को पांच किलोमीटर पैदल डोंगरा गांव तक ले जाना होता है और फिर वहां घंटों इंतजार के बाद बस या ट्रक के जरिए 25 किलोमीटर दूर तामिया सरकारी अस्पताल पहुंचना पड़ता है. अस्पताल में गर्भवती महिला को यदि सरकारी डॉक्टर ने भर्ती कर लिया तो ठीक, वरना और भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. यही हाल गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों का हैं, इन्हें भी तामिया ही इलाज के लिए जाना होता है.
चौथी दुनिया से साभार

छिंदवाड़ा, जहाँ एसबर्न का बनवाया तालाब अशरफ का हो गया है


छिंदवाड़ा में आज भी सौ, डेढ़ सौ साल पुराने चार कुएँ मौजुद हैं जो सबको पानी देते हैं। इनमें बैरिस्टर प्यारेलाल के बगीचे का कुआँ, कलेक्टोरेट के सामने की मुंडी कचहरी का कुआँ जिसकी समतल छत कटनी पत्थर की है, एक झरने को बाँधकर कुण्ड की तरह बनाया गया कुण्डी कुआँ और 1955 में खोदा गया नगर पालिका का कुआँ। 1998 में जिले में 4800 कुंए और 8 तालाब थे और 1955 तक 7-8 हजार कुएँ बन गए थे। इन कुओं के अलावा कुलबेहरा नदी पर बाँध बनाकर भी छिंदवाड़ा को पानी दिया जाता है। यह कुलबेहरा नदी पेंच नदी में मिलती है, पेंच कन्हान में और कन्हान नदी वैनगंगा में मिल जाती है। कहते हैं कि कुलबेहरा नदी के तल में ज्वालामुखी है। ‘डोह’ का मतलब होता है मुख जैसे- प्रतापडोह आदि। ‘रीड एवं रट्लेज’ की भू-गर्भ शास्त्र की किताब के अनुसार कुलबेहरा नदी में 48 से 50 तक ज्वालामुखी हैं। शायद इसके कारण ही यह नदी बारामासी बनी रहती है।

Author:
राकेश दीवान

गोंडों के देवगढ़ राज्य और आज के छिंदवाड़ा इलाके में कुएँ, झिरियाँ और कहीं-कहीं बावड़ियाँ ही पानी के स्रोत हैं लेकिन जिले के सदर मुकाम में कई पुराने तालाब आज भी मौजूद हैं।

सन् 1818 ईस्वी में परकोटे वाले आज के छिंदवाड़ा शहर का वह हिस्सा बनना शुरू हुआ था जिसे चिटणीसगंज कहते हैं। मराठी में चिटणीस का अर्थ होता है। सचिव या लेखाकार। 1818 से 1830 के बीच भोंसलों के सचिव रहे ये चिटणीस। इनके पास भोंसलों का खजाना था और इसकी सुरक्षा के लिए परकोटे का निर्माण करवाया गया था। बाद में अंग्रेजों ने परकोटे में कमानिया गेट भी बनवाया था। जिले का एक व्यापारिक कस्बा पांढुर्णा छीतू पिंडारी की पहल पर पिंडारियों ने बसाया था। 1904 ईस्वी में ‘बंगाल-नागपुर रेलवे’ कम्पनी ने नागपुर से छिंदवाड़ा होते हुए जबलपुर जाने वाली छोटी लाइन की गाड़ी चलाई थी। उस समय इस रेल का ढीली-ढाली चाल और अव्यवस्था के कारण मजाक में ‘बी नेवर रेगुलर’ यानि समय पर कभी नहीं कहा जाता था।

सन् 1954 में छिंदवाड़ा जिला बना था और उसके पहले कलेक्टर शेक्सपियर बनाए गए थे। जिले में बीके बोल्टम, केप्टन गार्डन और बोल्टेस आदि के बाद 1864 से 1867 के बीच मेजर एसबर्न डीसी बना। उसे दुबारा 1869 में फिर छिंदवाड़ा का कलेक्टर बनाया गया। मेजर एसबर्न ने छिंदवाड़ा में पानी की आपूर्ति करने के लिहाज से बीच शहर में 1864 के आसपास एक तालाब बनवाया था जो आज भी ‘अशरफ’ या ‘एसबर्न’ तालाब के नाम से जाना जाता है। इसी दौर में अंग्रेजों का खजाना और सम्पन्न जैन सेठ-साहूकरों की सुरक्षा के लिए गोलगंज मोहल्ले और उसके आसपास के इलाके को घेरकर परकोटे तथा कमानिया गेट का पुनर्निर्माण भी करवाया गया था।

इन तालाबों के अलावा शहर में जल आपूर्ति का प्रमुख साधन कुएँ ही थे। छिंदवाड़ा पहाड़ी, पठारी और मैदानी तीन तरह के क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में जुन्नारदेव, हर्रई, तामिया आदि इलाके हैं, पठारी क्षेत्रों में चौरई. छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा, परासिया तथा मैदानी क्षेत्रों में नागपुर, सौंसर और महाराष्ट्र से लगे हुए इलाके शामिल हैं। इस भौगोलिक बनावट के कारण वर्षा के स्तर में भी फर्क पड़ता है। और नतीजे में कुएँ, झिरियाँ आदि के जलस्तर बदलते रहते हैं।

छिंदवाड़ा में आज भी सौ, डेढ़ सौ साल पुराने चार कुएँ मौजुद हैं जो सबको पानी देते हैं। इनमें बैरिस्टर प्यारेलाल के बगीचे का कुआँ, कलेक्टोरेट के सामने की मुंडी कचहरी का कुआँ जिसकी समतल छत कटनी पत्थर की है, एक झरने को बाँधकर कुण्ड की तरह बनाया गया कुण्डी कुआँ और 1955 में खोदा गया नगर पालिका का कुआँ। 1998 में जिले में 4800 कुंए और 8 तालाब थे और 1955 तक 7-8 हजार कुएँ बन गए थे। इन कुओं के अलावा कुलबेहरा नदी पर बाँध बनाकर भी छिंदवाड़ा को पानी दिया जाता है। यह कुलबेहरा नदी पेंच नदी में मिलती है, पेंच कन्हान में और कन्हान नदी वैनगंगा में मिल जाती है। कहते हैं कि कुलबेहरा नदी के तल में ज्वालामुखी है। ‘डोह’ का मतलब होता है मुख जैसे- प्रतापडोह आदि। ‘रीड एवं रट्लेज’ की भू-गर्भ शास्त्र की किताब के अनुसार कुलबेहरा नदी में 48 से 50 तक ज्वालामुखी हैं। शायद इसके कारण ही यह नदी बारामासी बनी रहती है।

पहले इन क्षेत्रों में झिरियाँ और कुएँ पानी के प्रमुख स्रोत थे। पहाड़ी इलाकों में हर जगह झिरियाँ आझ भी मिलती हैं जिनका उपयोग पेयजल और सिंचाई तक के लिए किया जाता है। बड़कुई गाँव में ही पाँच झिरियाँ हैं जिनमें से एक ‘चोरगुण्डी’ बहुत प्रसिद्ध है। इसमें पहाड़ों से पानी झिरकर आता है। और अब लोगों ने अपनी पेयजल तथा थोड़ी बहुत सिंचाई की जरूरत के लिए पास ही एक तालाब बनाकर पाइप भी लगा लिया है। गर्मी में पानी सूख जाने पर भी इस ‘चोरगुण्डी’ झिरिया से पानी मिल जाता है। और जानवर झिरिया से बने तालाब में पानी पीते हैं। 12000 जनसंख्या वाली जिले की सबसे बड़ी पंचायत मानी जाने वाले बड़कुई गाँव में पहले कुएँ भी थे लेकिन पहले बनी खदानों के कारण 25-30 साल से इनमें पानी कम होता रहा है और अंत में 75 प्रतिशत कुएँ सूख गए। बड़कुई गाँव के एक बड़े मोहल्ले भोपाल बस्ती और मुर्गी टोला में चर्रई बाँध से पाइप लगाकर भी पानी दिया जाता है। लेकिन लोग झिरियों का पानी ही ठीक मानते हैं और वापरते हैं। इसी तरह की एक झिरियाँ चाँदामेटा की चाँदशाह वली की पहाड़ी पर भी है जहाँ एक मंदिर और मजार बने हैं। चांदशाह इलाके के एक प्रसिद्ध फकीर थे। पहाड़ी की तराई की इस झिरियाँ पर एक कुण्ड भी बना है।

इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी) से साभार

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

श्रमशील स्त्रियों पर स्वतंत्र विमर्श जरूरी: मंडलोई

मेरा बचपन तो सतपुडा के जंगलों में ही बीता। चारों ओर प्रकृति अपने तमाम सौंदर्य को समेटे आस-पास हीसरी थी। सरसराती हवाएं, चहचहाते पक्षी, पेडों से छनकर आती गोलाकार रोशनियों का पुंज, ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं, खूंखार जंगली जानवर से लेकर आदिवासियों का जन-जीवन तक सबकुछ तो जीवन के संगीत के रूप में मौजूद था।


यूरोप के नारी-स्वातंत्र्य को भारतीय परिवेश में लागू नहीं किया जा सकता। आदिवासी, दलित, निम्न जातियों की स्त्रियों की पीडा को समझने के लिए अलग नजरिए से चीजों को देखना होगा। श्रमशील स्त्रियों की चिंताओं को आधुनिक विचार के दायरे में लाना होगा। हालांकि इन स्त्रियों के उध्दार के लिए कोई अलग से रूप-रेखा समाज में दिखाई नहीं देती


स्कूल में मजदूर बच्चों के साथ गाली-गलौज होने पर आप सहपाठियों से मार-पीट पर उतारू हो जाते थे। आपने कभी कहा भी था कि अगर कवि नहीं होता, तो गुंडा-मवाली होता। इस उग्र तेवर ने कविता-लेखन की ओर कैसे प्रेरित किया?


ये तो बचपन के दौर की बातें हैं, जब कविता-लेखन शुरु भी नहीं किया था। घर के माहौल, आस-पास के परिवेश और सांस्कृतिक माहौल ने कभी गलत रास्ते पर जाने नहीं दिया। हालांकि पूरी गुंजाइश थी बिगडने की। मेरे भीतर बहुत गुस्सा भरा था जीवन की विपरीत परिस्थितियों को लेकर। इसके कारण मेरी सहपाठियों से मार-पीट और गाली-गलौज भी हो जाती थी। अगर अच्छा सांस्कृतिक माहौल न मिलता, तो जरूर वैसा ही हो जाता। घर की शिक्षा का वातावरण एवं खासकर मां जिनकी रुचि रामायण, धार्मिक-ग्रन्थों में थी, ने अच्छे संस्कार बचपन से ही डाले। पिता कबीर के गीतों को गाते थे। मानस-पाठ भी घर पर बराबर होता रहता था। कुछ इन्हीं कारणों से कभी गलत रास्ते पर नहीं भटके।

'तोडल मौसिया' जैसे किरदार क्या आज भी ग्रामीण परिवेश में देखने को मिलते हैं?


अभी भी कई ऐसे किरदार ग्रामीण परिवेश में मिल जाएंगे, जहां तक अभी नई हवाएं नहीं पहुंची हैं। खेती, किसानी, गरीबों की बस्तियों में अभी भी जीवन वैसे ही ठहरा है। किताबी शिक्षा तो वहां पहुंची नहीं, लेकिन जीवन की किताब से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है। हाशिए के जीवन पर ऐसे किरदार बहुतायत में हैं-परसादी, श्री कृष्ण इंजीनियर, दमडू नाई अभी भी जिंदा हैं। लेकिन इनसे मिलने के लिए घुमक्कडी ज़ीवन जीना होगा, यायावर की तरह भटकना होगा। गांवों, सतपुडा जैसे घने जंगलों की खाक छाननी होगी। तोडल मौसिया ने तो गांव का भाईचारा निभाने के लिए जीते-जी अपना श्राध्द-कर्म कर लिया था ताकि पूरे गांव को एक साथ जिमाया जा सके। वे शादी-शुदा तो थे नहीं, गांव के हर भोज में उनकी उपस्थिति जरूरी थी तो उन्हें यह बुरा लगता कि वे ऐसे ही मरें और क्रिया-कर्म के बाद गांववालों को खिलाने वाला भी कोई न हो। तो उन्होंने लोगों को बिना कारण बताए पूरे गांव को न्यौता दे डाला। तो ऐसे थे हमारे तोडल मौसिया।

आपने बचपन में गरीबी को काफी नजदीक से महसूस किया है। कविता में 'श्रम-शक्ति को प्रतिष्ठा' देने के पीछे क्या यह भी एक वजह रही?


हां, ये तो है ही। लेकिन कुछ लोग अपने संदर्भ में ही नहीं, समाज के संदर्भ में भी जीते हैं। दरअसल कोई रचना सामाजिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर ही लिखी जाती है। मैं लिखता हूं, तो इसमें आस-पास के तमाम लोगों की जिंदगियां भी शामिल होती हैं। ये सभी स्मृति का हिस्सा हैं, जो जाने-अनजाने आपकी रचनाओं में चले आते हैं। ऐसा ही कोई भी रचनाकार करता है। मेरे अनुभव को ही देखें तो यह किसी भी मजदूर के अनुभव से मिलता जुलता होगा, जो दुनिया में कहीं का भी हो सकता है। मैंने कविता में एक जगह दमडू कक्का का जिक्र किया है, जो नाखून बनाने के लिए आया करते थे। शायद आपने पढी हो...


जी, उस कविता में कुछ ऐसा भाव था- 'देखता हूं नाखून तो, बस एक तीखी याद हिडस भरी, वह जो होती तो होते कक्का कहीं, नेलकटरों के इस दौर में, काट तो लेता हूं लेकिन रगडने की मशक्कत, सुविधा कोई कला नहीं।' इसी संदर्भ में आपने एक हुनर के मौत के गर्त में समा जाने की चर्चा भी की है।


हां, कुछ ऐसा ही भाव था। इस समाज में कई कलाएं यूं ही विलुप्त होती जा रही हैं, जिसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जा रहा। इस भाग-दौड भरी जिंदगी में लोगों के पास समय ही कहां है कि इनके बारे में भी कुछ सोच सकें।

समुद्री हवाओं से उठते नमक की गंध, सघन वन की नीरवता और आदिम जन-जातियों का संगीत-आपकी कविता को व्यापक फलक देते हैं। प्रकृति से जुडाव आपने कब महसूस किया?


मेरा बचपन तो सतपुडा के जंगलों में ही बीता। चारों ओर प्रकृति अपने तमाम सौंदर्य को समेटे आस-पास ही पसरी थी। सरसराती हवाएं, चहचहाते पक्षी, पेडों से छनकर आती गोलाकार रोशनियों का पुंज, ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं, खूंखार जंगली जानवर से लेकर आदिवासियों का जन-जीवन तक सबकुछ तो जीवन के संगीत के रूप में मौजूद था।
जरूरत थी, तो उस बिखरे संगीत को गुनगुनाने की। प्रकृति एवं जीवन के संगीत को बहुत नजदीक से सुनने का मौका मिला। प्रकृति में सौंदर्य तो है ही, जीवन का संघर्ष भी मौजूद है। इन सबों को अलग कर देखने की जरूरत नहीं। सतपुडा के जीव-जंतु, आदिवासी, वहां के बोल को संदर्भ से काटकर देखना कठिन होगा। मालवा, छत्तीसगढ, अंडमान-निकोबार न जाने कहां-कहां घुमक्कडी करता रहा। आदिवासी, समुद्र का संबंध तो जीवन का हिस्सा ही बन चुके हैं।

जीवन का बोध, जीवन-संघर्ष से ही अर्जित किया जाता है। निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन की लंबी परंपरा हमारे यहां रही है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर साहित्य-सृजन को आप किस रूप में देखते हैं, जहां प्रकृति एवं आमजनों का संघर्ष नहीं दिखता?


हमारा समय तो रिएलिटी पर आधारित था। लेकिन आज रिएलिटी के साथ वर्चुअल रिएलिटी का भी दौर है। चीजें वर्चुअल ज्यादा हो गई हैं। स्क्रीन, फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं ने देखने की एक दृष्टि पैदा की ही है। जो रचनाकार जैसा होगा, उसी हिसाब से चीजों को देखेगा। जहां एक तरफ आज सही कविताएं हैं, तो दूसरे तरह की कविताएं भी मौजूद हैं। विशुध्द अनुभव से कविता तो क्या, कोई भी विधा नहीं लिखी जा सकती। जीवन का संघर्ष झेलने के बाद ही उनकी गहनतम पीडा रचनाओं में झलकती हैं और रचनाएं लोगों के दिलों में जगह बना पाती हैं।

भवानी प्रसाद मिश्र ने आदिवासी समाज के सामने अपनी अकिंचनता व्यक्त करते हुए कहा था-'मैं इतना असभ्य हूं कि तुम्हारे गीत नहीं गा सकता।' विलुप्त होते आदिवासी समाज की पीडा आपकी रचनाओं में मुखर हैं। आज आपके जन्मस्थान छिंदवाडा में उनकी क्या स्थिति है, किन हालातों में जीने को मजबूर हैं वे?


आदिवासी समाज तो पहले भी उपेक्षित था, आज भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं। ग्लोबलाइजेशन के दौर में बाजार एवं सत्ता का घिनौना खेल जंगलों तक जा पहुंचा है। औद्योगिकरण के नाम पर जंगलों में जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है, पेडों की कटाई जारी है। चाहे छत्तीसगढ हो, मध्यप्रदेश या हिमाचल प्रदेश। यह समाज कहीं भी मुख्यधारा में जगह नहीं बना पाया है। महाश्वेता देवी उन लोगों के बीच रह रही हैं, उन्हें शिक्षित कर रही हैं। कुछ और लोग भी लगे हैं। शिक्षा के कारण ही स्वतंत्र चेतना का विकास हो पाता है और कोई समाज विचारवान बनता है। स्वतंत्र रूप से सोचने का विकास इस समाज में नहीं हो पाया है। इनकी सादगी, सरलता को शहरी समाज अपने तरीके से छलता रहा है। दरअसल जब तक वे शिक्षा से महरूम रहेंगे, विचार का आलोक उन तक नहीं पहुंचेगा, मुख्यधारा में जगह बना पाना मुश्किल होगा।

शहरी जीवन की चिंताएं एवं मध्यवर्ग के दोहरे चरित्र की ओर आपका ध्यान क्यों नहीं गया?


नहीं, मेरी रचनाओं में शहरी वर्ग की चिंताएं भी शामिल हैं। ये मेरी रचनाओं कविता, गद्य, निबंध, लेख में तमाम जगह बिखरी पडी हैं। दरअसल शहरी मध्य वर्ग अपने में ही सिमटा हुआ समाज है। शहरी जीवन में मालिक वर्ग की मक्कारियों के आगे मजदूरों की चालाकियां कुछ भी नहीं। मुझे लगता है कि जो चीज उनका है और उन्हें नहीं दिया जा रहा है, उसे मालिकों से छीन लेने में कोई बुराई नहीं।

स्त्री-विमर्श शहर की मॉडर्न एवं बुध्दि विलास महिलाओं का शगल मात्र बनकर रह गया है? ऐसे में एक मजदूर स्त्री का वात्सल्य भाव, जब मिल का भोंपू बजते ही वह बच्चे को दूध पिलाने बरसात में भींगती दौड पडती है, की चिंताएं कहां जगह पाती हैं?


सीमित अर्थ में ही जगह बना पाई हैं। यूरोप के नारी-स्वातंत्र्य को भारतीय परिवेश में लागू नहीं किया जा सकता। आदिवासी, दलित, निम्न जातियों की स्त्रियों की पीडा को समझने के लिए अलग नजरिए से चीजों को देखना होगा। श्रमशील स्त्रियों की चिंताओं को आधुनिक विचार के दायरे में लाना होगा। हालांकि इन स्त्रियों के उध्दार के लिए कोई अलग से रूप-रेखा समाज में दिखाई नहीं देती। मजदूर या आदिवासियों के लिए स्वतंत्र विमर्श की जरूरत है। इनकी चिंताओं एवं संघर्ष को महसूस करना होगा। नई सोच का उत्खनन करना होगा, सीमित सोच से कुछ नहीं होनेवाला। महाश्वेता देवी के उपन्यास, नागार्जुन की कविताएं और कुछ जगह तो ये चिंताएं दिखती हैं। हालांकि स्पांसर्ड विमर्श में ये चीजें नहीं मिलेंगी।

आजकल आप क्या कर रहे हैं? फिल्म, डाक्यूमेंट्री, कविता या गद्य लेखन।


शमशेर जी और बिरजू महाराज पर डॉक्यूमेंट्री बनाने की तैयारी चल रही है। इन दिनों मूलत: गद्य लिख रहा हूं। उर्दू के प्रभाव वाली कविताओं का संकलन निकालने की भी योजना है। 'कवि का गद्य' जिसमें आलोचना, लेख, निबंध, डायरी और कॉलम भी शामिल होगा, पर भी एक किताब लिख रहा हूं।

नए लेखकों के लिए कोई संदेश।


युवा लेखकों को बंद कमरों से निकलकर समाज, देश, दुनिया को देखना, समझना होगा। यायावरी की जिंदगी जीनी होगी, घुमक्कडी क़र दुनिया के फलसफे को समझना होगा। यही एक रास्ता है।

काठफोड़वा से साभार
वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई के साथ चन्दन राय की बातचीत



गुरुवार, 2 सितंबर 2010

फिल्मवालों को लुभाती रही है छिन्दवाड़ा की सरजमीं


छोटे और बड़े परदों के निर्माता-निदेशकों को छिन्दवाड़ा की सरजमीं हमेशा से लुभाती रही है। छिन्दवाड़ा जिले में फिल्म, सीरियल और कई टीवी डाक्यूमेंट्री की शूटिंग हुई है।

देव आनंद और मुमताज की 'तेरे मेरे सपने' फिल्म की हुई शूटिंग
सन 1971 में बॉलीवुड में बनी मशहूर फिल्म 'तेरे मेरे सपने' की शूटिंग यहां हुई थी। इस फिल्म के प्रमुख कलाकार देव आनंद और मुमताज थे। इसका फिल्मांकन कोलमाइन्स एरिया न्यूटन चिखली में हुआ था। इस शहर के एक स्कूल में फिल्म का एक दृश्य फिल्माया गया था। तब से इस स्कूल को मुमताज के स्कूल के रूप में जानते हैं।
फिल्म 'तेरे मेरे सपने' की डेढ़ माह तक कोयला खदानों वाले इस क्षेत्र में शूटिंग हुई थी। देव आनंद और मुमताज को लेकर स्थानीय लोगों की यादें अब भी धुंधली नहीं हुई हैं। प्राइमरी स्कूल के प्रांगण में एक पेड़ के नीचे पढ़ाने का दृश्य मुमताज पर फिल्माया गया था।


टीवी डाक्यूमेंट्री में दिखा पातालकोट और गोटमार मेला
तामिया के नजदीक स्थित पातालकोट में भी कई टीवी डाक्यूमेंट्री प्रोग्राम की शूटिंग हुई है। जैसे मशहूर दूरदर्शन धारावाहिक सुरभि आदि। पातालकोट की अनोखी दुनिया और यहां की संस्कृति को कई कार्यक्रमों में दिखाया गया है। सुरभि प्रोग्राम में देश-विदेश में सुप्रसिद्ध पांढुर्णा के गोटमार मेले को भी फिल्माया गया है।

दूसरी बॉलीवुड फिल्म की शूटिंग जल्द !
अब जल्द ही दूसरी फिल्म की शूटिंग छिन्दवाड़ा में होने वाली है। अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक डायरेक्टर कुंदन शाह अपनी नई फिल्म की स्टोरी पर काम कर रहे हैं। जिसकी शूटिंग छिन्दवाड़ा में होगी। मशहूर निदेशक और राइटर कुंदन शाह इससे पहले शाहरुख खान अभिनीत कभी हां कभी ना, प्रीति जिंटा अभिनीत क्या कहना, दिल है तुम्हारा जैसी कई फिल्में बना चुके हैं। शाह ने मशहूर टीवी सीरियल नुक्कड़ का भी निर्देशन किया था।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

याद करो कुर्बानी..जब तक न लौंटू यूनिट का ख्याल रखना

जम्मू. जब तक वापस लौटूं यूनिट का ख्याल रखना। अब कब तक उसका इंतजार करेंगे। मुंह से भले कुछ न बोलें, लेकिन कर्नल राजीव तुली के चेहरे से यह गम साफ झलक रहा था। 20 मार्च, 2010 को जम्मू स्थित अपनी यूनिट से राजौरी जाते वक्त कुछ यही मैसेज मेंढर में मंगलवार को शहीद हुए मेजर अमितकुमार ठिंगे ने मैसेज बुक में लिखा था।

परंपरा के अनुसार हर ऑफिसर यूनिट से जाते वक्त मैसेज लिखता है, साथ ही अपना अगला पता भी। मेजर अमित ने इस मैसेज के साथ अपना एड्रेस लिखा था- भारतीय सेना। जो अपने आप में बाकी जवानों के लिए प्रेरणा का काम करेगा। यह कहना है अमित के पहले कमांडिंग ऑफिसर कर्नल राजीव तुली का।


नागपुर में जन्म, भोपाल में पढ़ाई
रक्षा प्रवक्ता ले. कर्नल बिप्लव नाथ ने बताया कि मेजर अमितकुमार ठिंगे का जन्म 19 अप्रैल, 1982 में नागपुर के महाराष्ट्रीयन परिवार में हुआ था। हालांकि उनके माता-पिता बाद में मप्र के छिंदवाड़ा आ गए थे। अमित ने भोपाल के एलएनसीटी कॉलेज से इंजीनियरिंग किया था, जिसके बाद तमाम नौकरियों को नकार वह सेना में आ गए थे। 2007 में सेना में कमीशन होने के बाद 2010 में वह राष्ट्रीय राइफल्स में चले गए।


जोखिम उठाने की जिद करता था
अमित के कंपनी कमांडर ले. कर्नल एचएस संधू के मुताबिक यूं तो मेजर अमित टेक्निकल एंट्री से सेना में भर्ती हुए थे जहां वह बिना दुश्मन से सीधा संपर्क बनाए डच्यूटी कर सकते थे, लेकिन वह हमेशा कमांडिंग ऑफिसर से जिद करते थे कि उन्हें पैरा कमांडो ट्रेनिंग के लिए भेजा जाए, ताकि वह दुश्मन से सीधा लौहा ले सकें।

बाइकिंग के शौकीन थे अमित सर
अमित के जूनियर कैप्टन प्रलय के अनुसार उन्हें आज भी यूनिट में वह पहला दिन याद है, जब उन्होंने मेजर अमित के साथ रूम शेयर किया था। प्रलय के अनुसार मेजर बाइकिंग के बेहद शौकीन थे और उन्होंने अपनी थंडरबर्ड बाइक का नाम ‘एक्सट्रीम मशीन’ रखा था।

कारगिल शहीदों की तरह है
शहीद मेजर अमित ठिंगे के दोस्तों ने भास्कर के साथ यादें बांटते हुए कहा अमित कारगिल शहीदों की तरह ही था। वह युवा अफसरों के लिए मिसाल था। अमित के यूनिट के साथी मेजर हरप्रीत सिंह के अनुसार उनके दोस्त में जोश, जज्बा और देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी। उसे गाना पसंद था। हंसमुख स्वभाव के चलते वह हर किसी को अपना बना लेता था।

छिंदवाड़ा में होगा अंतिम संस्कार
गुरुवार सुबह जम्मू में शहीद मेजर अमित को श्रद्धांजलि दी जाएगी। इसके बाद कैप्टन प्रलय उनके शव को विमान द्वारा जम्मू से नागपुर ले जाएंगे। वहां से सड़क मार्ग से पार्थिव शरीर छिंदवाड़ा ले जाया जाएगा। शुक्रवार को सैन्य सम्मान के साथ वहां उनका अंतिम संस्कार होगा।

शनिवार, 29 मई 2010

मैरिट लिस्ट में छिंदवाड़ा की रुचि प्रसाद

MP Board 10th:लड़कियां लड़कों से आगे

भोपाल. हायर सेकंडरी के बाद छात्राएं हाईस्कूल में भी छात्रों से आगे रही हैं। मप्र माध्यमिक शिक्षा मंडल ने शनिवार को हाईस्कूल का परीक्षा परिणाम घोषित किया है। जिसमें 50.31 फीसदी छात्राएं सफल रही हैं। जबकि सफल छात्रों का प्रतिशत 46.65 है। परीक्षाफल 48.15 फीसदी रहा है, जो पिछले साल की तुलना में 12.82 ज्यादा है। सरकारी स्कूलों का परिणाम 48.57 फीसदी और निजी स्कूलों का 47.71 फीसदी रहा है।


मंडल ने परीक्षा में सफल विद्यार्थियों की अस्थाई मैरिट लिस्ट जारी की है, जिसमें बालाघाट की वर्तिका श्रीवास्तव 600 में से 584 अंक प्राप्त कर प्रथम स्थान पर रही हैं। लिस्ट से महानगरों के नाम गायब हैं, जबकि कस्बा और छोटे शहरों के विद्यार्थियों का दबदबा है। मैरिट लिस्ट में छिंदवाड़ा की रुचि प्रसाद का छठवां स्थान रहा है।

शुक्रवार, 28 मई 2010

अवधेश तिवारी



दुश्मन

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तुम मुझे
नज़र उठाकर देखना नहीं चाहते
पर,
जिधर मेरी नजरें उठती हैं
क्यों देखते हो तुम उसी ओर?

तुम
मेरी बातें सुनना नहीं चाहते
पर, मैं जिन बातों को सुनता हूं
क्यों सुनते हो तुम वहीं बातें?

तुम
मेरे साथ, रोना-हंसना नहीं चाहते
पर, जहां मैं रोता हूं, हंसता हूं
क्यों वहीं तुम भी रोने-हंसने लगते हो?

शायद
मैं केवल दुश्मन नहीं
दुश्मन से कुछ अधिक हूं।
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अवधेश तिवारी
वरिष्ठ उदघोषक , आकाशवाणी छिंदवाड़ा
07162-238238

शनिवार, 8 मई 2010

जातीय जनगणना की मांग जायज : प्रणब

एजेंसी
छिंदवाड़ा। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने देश में जाति आधारित जनगणना की मांग को जायज ठहराया है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद इसे रोका जाना उचित नहीं था। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले सन १९३१ में जाति आधारित जनगणना हुई थी, इसके बाद जब आजादी मिली तो जनगणना में जातियों की गिनती बंद कर दी गई। मुखर्जी ने कहा कि इसे जारी रखना चाहिए था, मगर ऐसा हो नहीं सका। अब यूपीए सरकार इस दिशा में पहल कर रही है।

प्रणब यहां भूतल परिवहन मंत्री कमलनाथ के लोकसभा क्षेत्र में आयोजित लोन मेले में शामिल होने आए थे। महिला आरक्षण विधेयक मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इस पर संसद के अगले सत्र में चर्चा होगी। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने टर्न ओवर टैक्स की सीमा को ४० लाख से ६० लाख रुपये कर दिया है, इससे पहले उनकी ही ओर से १९८४ में इसे ४० रुपये लाख किया गया था। बीच में किसी ने भी इस बारे में नहीं सोचा। इस मौके पर कमलनाथ ने खुद को राजनीति में लाने का श्रेय मुखर्जी को दिया।

सोमवार, 3 मई 2010

'ये है मुंबई मेरी जान'


मुंबई लाइफ के साथ .... अरशद अली


आप अगर हार्डवर्क को सागर की गहराई तक देखना चाहते है तो यहां आपको इस बात की हकीकत पता चल जाएगी कि लोग किस हद तक मेहनत रूपी सोने के गहनों को रोज पसीने की बूंदों से चमका रहे है। ... और वो चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। जिस तरह समुंदर अथाह, शांत, शिथिल होता है वैसे ही यहां के लोग मेहनती है।



मुंबई... लोग यहां अपनी पूरी जिंदगी लो ट्रेक से फास्ट ट्रेक तक लाने में लगा देते हैं, पर किसकी किस्मत कब बदल जाएंगी, ये कोई नहीं जानता।



''यहां राग है, यहां पाग है, यहां दिल में बस प्यार है, यहां दोस्ती, यहां दुश्मनी, दुश्मन यहां चार है"



मुंबई... अगर पूरे भारत के लोगों या उनके रहन-सहन, जीने का अंदाज जानना हो तो इससे अच्छी जगह नहीं हो सकती। हर कोई सोचता होगा कि यहां दिखावा है, ढोंग है, और तरह-तरह की बातें, क्योंकि इसे मायानगरी कहा जाता है। कुछ हद तक ये जायज भी है। क्योंकि यहां हर वर्ग, हर सोच के लोग रहते हैं। हर एक का जीने का अंदाज अलग अलग है। हर कोई अपने हिसाब से जीने पर साहस भी रखता है। परन्तु इससे अलग या इससे हट कर इस जगह का दूसरा पहलू है। अगर यहां दिखावा है तो साथ ही हार्डवर्क भी है।



आप अगर हार्डवर्क को सागर की गहराई तक देखना चाहते है तो यहां आपको इस बात की हकीकत पता चल जाएगी कि लोग किस हद तक मेहनत रूपी सोने के गहनों को रोज पसीने की बूंदों से चमका रहे है। ... और वो चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। जिस तरह समुंदर अथाह, शांत, शिथिल होता है वैसे ही यहां के लोग मेहनती है।


मुंबई... यहां हर मजहब, हर कौम, हर प्रांत से आए हुए तरह-तरह के लोग अपना आशियाना बना लेते है। जिस तरह छोटी-छोटी नदियां समुंदर में आकर समा जाती है। और इस चमक-दमक भरी नगरी में अपनी एक अलग पहचान बनाने केलिए लगातार कोशिशें करते हुए इंसान। यहां पर हम इस तरह के कई वर्गों में बांट सकते हैं; मेहनत का स्तंभ यहां पर आपको जरूर दिखेगा। यहां रोज की भागती-दौड़ती जिंदगी में हर एक शख्स बहुत से अरमान लिए उड़ता है। यहां शायद कोई किसी से इसलिए जुड़ा नहीं है, जैसे आम लोगों की सोच है। क्योंकि अगर वो इस दौड़ भरे खेल में पीछे रह जाएंगे, और हो सकता है हार भी जाएं। इसलिए हर कोई अपने आप से भी चुप है। और हर जगह, हर सोच में अपने आप को देखता है।



कोई यहां एक्टर, एक्ट्रेस बनने के सपने को लेकर आता है, कोई जीवन रूपी मंदिर को सजाने आता है, कोई समाज से या खुद से धोखा खाया आता है। यहां सबकी अलग-अलग कहानी है। यहां भिखारी, मोची से लेकर हर इंसान की एक अलग दुनिया है। यहां सांसे चलती नहीं दौड़ती है, ट्रेनें खुद का ही पीछा करती है। इमारतें आकाश को छूना चाहती है, मंजिलें सिमट कर रह गई है, वाकई ऐसी मिसाल शायद और कहीं न मिले। अलगाव इस रूप में नहीं है कि हम सभी या यहां कोई एकजुट नहीं है। कभी खामोशी या अशांति के दीवाने अपने बेबुनियाद इरादों को लेकर आते हैं, तो सभी मिल कर 'जय हो' के नारे से जुड़े है।


समय शायद धोखा खाता होगा कि काश मैं २४ घंटों से ज्यादा का बना होता, यहां का जीवन समुद्र की तरह चारों ओर ख्वाबों से घिरा है। किसी के पूरे हो जाते है, किसी के अधूरे रह जाते हैं। कोई टूटते तारों की तलाश में है, तो कोई आसमान से भी पार है। पर सभी एक ख्वाब रूपी आसमान में उस सुकून भरी बूंदों के लिए बेताब रहते है, जो शायद अपने ही पसीनों के साथ रोज मिल जाता है। हमें अहसास भी नहीं होता। ठोकर खाते हैं तो लगता है, अरे ये पत्थर तो मैंने ही उठाया था। रास्तों में भी शायद मेरी वजह से आया है।



यहां जिंदगी की हर रंगत, सेलेब्रेशन एक अलग ही अंदाज में सेलेबे्रट किया जाता है। क्योंकि यहां की अपनी एक अलग ही सोच है। 'जीयो और जीने दो' जो हमारे पास आज वक्त है तो हमारा है, और हम उसे पूरी तरह जीएंगे। हम जैसे लाखों लोगों की भी यही कहानी है। बस इसी आस से जीते चले जाते है कि कभी तो...


" Give me some sunshine


Gibe me some rain


Give me another chance


I want to grow up once again "

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

निर्मला देवी

जन्म और बाल्यावस्था :
श्री माताजी का जन्म २१ मार्च १९२३ को छिंदवाडा, मध्य प्रदेश में एक ईसाई परिवार में हुआ। उनके पिता श्री प्रसादराव साल्वे और माता का नाम श्रीमती कोर्नेलिया साल्वे था। वे शालिवाहन राजवंश से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित थे। श्री माताजी के जन्म के समय उनके निष्कलंक रूप को देखकर उन्हें 'निर्मला' नाम दिया, जिसका अर्थ होता है बिना किसी दोष के अर्थात निर्दोष। बाद के वेर्शो में वे अपने अनुयायियों द्वारा श्री माताजी निर्मला देवी नाम से प्रसिद्ध हुई। पूज्यनीय माँ अपने पूर्ण आत्मसाक्षात्कार रूप में इस पृथ्वी में आए है ये उन्हें बहुत कम आयु में ही पता चल गया था। वे पूरी मानव जाती के लिए एक नायाब तोहफा आत्मसाक्षात्कार के रूप में लेकर आए हैं। उनके अभिभावकों ने भारत के स्वतंत्रता अभियान में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनके पिता के महात्मा गाँधीजी के साथ नजदीकी सम्बन्ध थे। वे स्वयं भी भारत के संविधान सभा के सदस्य थे उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम संविधान को लिखने में मदत की थी। उन्हें १४ भाषाओं का ज्ञान था। उन्होंने कुरान का मराठी अनुवाद किया था। श्री माताजी की माता प्रथम भारतीय महिला थी जिन्हें गणित में स्नातक की उपाधि प्राप्त हुई।

भारत के स्वतंत्रता अभियान में श्री माताजी की भूमिका :
श्री माताजी बचपन में अपने माता पिता के साथ गाँधीजी के आश्रम में रहा करती थी। गांधीजी ने उस बच्ची के विवेक और पांडित्य को देखकर उन्हें निरंतर बहुत बढ़ावा दिया। उनके नेपाली नैन-नक्ष्य को देखकर गांधीजी उन्हें 'नेपाली' कहते थे। इतने कम आयु में ही गहरी समझ होने के कारण गांधीजी से अध्यात्मिक मामलो में उनकी सलाह लिया करते थे।

श्री माताजी ने स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. उन्होंने बहुत साहस के साथ एक युवा नेत्री की भूमिका निभाई जो की अदम्य साहस से परिपूर्ण थी। १९४२ के दौर में गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन की घोषणा की। उनके सक्रिय भागीदारिता के कारण श्री माताजी को अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ जेल भी जाना पड़ा।
श्री माताजी को जन्म से ही मनुष्य के सम्पूर्ण नाड़ी तंत्र का ज्ञान था। वे इसके उर्जा केन्द्रों के बारे में भी जानती थी। परन्तु इस सम्पूर्ण ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने हेतु तथा विज्ञान की शब्दकोष को जानने हेतु उन्होंने 'क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, लाहौर' से दावा एवं मनोविज्ञान की पढ़ाई की ।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

छिंदवाडा में जनम लिया हमारी निर्मल मां ने ..........

सहजयोग का मुख्य लक्ष्य दुनिया के हर कोने में प्रेम पहुंचाना है इसके लिए साधकों को अपने ध्यान की गहराई प्राप्त करना होगी। जब तक हम स्वयं को नहीं बदलेंगे, दुनिया में परिवर्तन नहीं ला पाएंगे
- वी के कपूर, सेवानिवृत मेजर जनरल

  • छिंदवाडा के आसपास के गांवों में भी चल रहा है सहजयोग का प्रचार प्रसार
  • एलसीडी प्रोजेक्टर की सहायता से साधकों को दिया जा रहा आत्मसाक्षात्कार
  • इस कार्य के चलते अब माताजी निर्मलादेवी की जन्मस्थली पहुंच रहे हैं लोग
सहजयोग प्रणेता परम पूज्य श्रीमाता जी निर्मला देवी जन्मोत्सव कार्यक्रम के दूसरे दिन पूरे देश से आए सहज योगी भाई, बहनों ने सहज भजनों की प्रस्तुतियां दी । सहजी बच्चों ने कल्चरल प्रोग्राम प्रस्तुत किए । भजनों पर साधक झूम उठे । गायक दीपक वर्मा के भजन देर रात तक चलते रहे ।

रानी की कोठी पर चल रहे जन्मोत्सव कार्यक्रम अन्तर्गत सम्पन्न कार्यशाला को संबोधित करते हुए सेवानिवृत मेजर जनरल वी के कपूर ने तनाव प्रबंधन पर अपने अनुभव सुनाए । साथ ही आपने एडवांसमेंट आफ सहजयोग पर प्रकाश डाला । आपने बताया कि सहजयोग का मुख्य लक्ष्य दुनिया के हर कोने में प्रेम पहुंचाना है । इसके लिए साधकों को अपने ध्यान की गहराई प्राप्त करना होगी। जब तक हम स्वयं को नहीं बदलेंगे, दुनिया में परिवर्तन नहीं ला पाएंगे। श्री सुरेश कपूर ने भी विचार व्यक्त किए । बाहर से आए सहजी भाई, बहनों ने अपने संस्मरण सुनाए । उन्होने बताया कि वे सहज ध्यान पद्धति के द्वारा आज सभी क्षेत्रों में तरक्की कर रहे हैं।

सहजयोग का प्रचार प्रसार छिंदवाडा के आसपास के गांवों में भी चल रहा है । गुजरात के श्री राजेश गुप्ता ओर राजस्थान के श्री भगवतीसिंह द्वारा छिंदवाडा के सहजीसाधकों की सहायता से साधकों को एलसीडी प्रोजेक्टर ओर मानव सूक्ष्म तंत्र की सहायता से आत्मसाक्षात्कार दिया जा रहा है । इस कार्य के चलते लोग अब माताजी की जन्म स्थली पहुंच रहे हैं । श्री गुप्ता और श्री सिंह ने बताया कि छिदवाडा के तकरीबन सभी गांवों में प्रचार प्रसार ओर आत्मसाक्षात्कार का कार्य पूर्ण किया गया है, जोकि अपने आप में एक मिसाल है।

बुधवार, 17 मार्च 2010

अवधेश तिवारी, रेडियो एनाउंसर


परिचय
नाम- अवधेश तिवारी
पिता- श्री रामगोपाल तिवारी
माता- श्रीमती दुर्गा बाई
जन्मतिथि- ०३ जनवरी, १९५९
जन्मस्थान- पिपरियारत्ती (कपूर्धा)
जिला- छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
शिक्षा- एमए (हिन्दी साहित्य)
सम्प्रति- आकाशवाणी छिन्दवाड़ा में वरिष्ठ उद्घोषक के पद पर कार्यरत


अवधेश तिवारी
वरिष्ठ उद्घोषक , आकाशवाणी छिन्दवाड़ा
प्लॉट नं. -१२०, शिक्षक नगर,
छिन्दवाड़ा (.प्र)
दूरभाष- ०७१६२-२३८२३८
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बुधवार, 10 मार्च 2010

सहजयोग आज का महायोग

विश्व को सहजयोग का ज्ञान देने वाली परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी का जन्म स्थल होने का गौरव छिंदवाडा को प्राप्त है।

नागपुर रोड पर कोतवाली के बाजू में श्री माताजी का घर है और यही पर जागतिक आश्रम है.
पहले सहज योग को छिंदवाडा के अलावा सारा विश्व जानता था पर अब छिंदवाडा के लोगो ने भी सहज का आनंद लेना शुरू कर दिया है।

प्रति शुक्रवार को शाम 7 बजे और प्रति रविवार को सुबह 10 बजे यहाँ पर सामूहिक ध्यान होता है.
यह पूरी तरह नि;शुल्क है।

छिंदवाडा में सहज योग सेण्टर के लीडर अड्वोकेट प्रसन्न बाकलीवाल है . किसी भी तरह की जानकारी के लिए उनसे मोबाइल न. 9827260896 पर बात कर सकते है .

K.C.Harjani
AJAY TELECOM,
Chhindwara. MP
9202701001

मंगलवार, 9 मार्च 2010

बाबा का जन्मदिन, सतपुड़ा के पुरखा संपतराव धरणीधर का जन्मदिन


  1. मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए हुई थी बाबा से मुलाकात
  2. जब मिला तब बाबा धरणीधर पार कर चुके थे 75 बसंत
ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।

बाबा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो छोटे-बड़े सभी को अपनी ओर आकृर्षित करता था। बाबा सभी से बहुत दोस्ताना अंदाज में मिलते और बतियाते थे। बाबा की यादों को मैं कभी भी बिसरा नहीं सकता। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि मैं उनके अंतिम समय में उनके पास नहीं था।
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आज है 10 मार्च। बाबा का जन्मदिन। यानी सतपुड़ा के पुरखा बाबा संपतराव धरणीधर का। 'मुझे फांसी पर लटका दो ... कि मैं भी एक बागी हूं' वाले बाबा। 'किस्त-किस्त जिंदगी' के रचयिता। जब मैं बाबा से मिला वे ७५ बसंत पार कर चुके थे। बाबा से मेरी मुलाकात मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए ही हुई। बाबा का कविता पाठ, इंटरव्यू मैंने आकाशवाणी छिंदवाड़ा से सुना था। जिसमें उनकी बातचीत और कविताओं ने मुझे आकृर्षित किया था। इसके साथ ही यह बात भी मुझे उनकी तरफ खींच रही थी कि वे मेरे गांव तन्सरामाल के नजदीकी कस्बे मोहखेड़ के रहने वाले थे।

उस समय मैं छिंदवाड़ा शहर में ही रहकर कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था। आकाशवाणी जाने का सिलसिला मेरा लगातार जारी था। यही मेरी मुलाकात कार्यक्रम अधिकारी श्री अमर रामटेके जी से हुई। वे उन दिनों बस स्टेशन के पास यादव लॉज में रहते थे। उनसे वहां कई मुलाकातें हुई। एक मुलाकात के दौरान मैंने उनसे बाबा के बारे में पूछताछ की। उन्होंने जिला अस्पताल के कमरा नं। पांच में जाने को कहा। अस्पताल पहुंचने में मुझे पता चला कि वे अब दूसरे कमरे में है। काफी मशक्कत के बाद बाबा से मुलाकात हो गई। फिर मेरी उनसे लगातार मुलाकात होने लगी। ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।

बाबा के पास जाने से मुझे छिन्दवाड़ा के साहित्यिक परिदृश्य को समझने में आसानी हुई। बाबा के कमरे में पाठक मंच (किताबों की समीक्षा के लिए प्रदेशभर के जिलों में गठित इकाई) की बैठक होती थी। उन दिनों से ही पाठक मंच के संयोजक श्री ओमप्रकाश 'नयन' जी थे। इसके अलावा कई कवि गोष्ठियां बाबा के कमरे में होती थी। बाहर से आने वाले उनकी पीढ़ी के कई वरिष्ठ कवि, साहित्यकार भी गोष्ठियों में शामिल होते थे। जिनमें इंदौर के स्वर्गीय नईम जी का नाम मुझे याद आ रहा है।

सन् 95 मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया थ। कविता क्या थी तुकबंदी ज्यादा हुआ करती थी। इसके अलावा दो और चार लाइनें। जिन्हें हम शायरी कहकर मुगालते में रहते थे। पहली मुक्तछंद की कविता मैंने 2001-2002 में लिखी होगी। बाबा से मिलने के बाद मैंने एक कविता बाबा पर ही लिख डाली। जो डीडीसी कॉलेज की मैग्जीन में छपी थी। बाबा से मैंने अपनी आतंकवाद वाली कविता के लिए बातचीत की थी।

बाबा को जब कभी भी बाहर किसी कार्यक्रम में जाना होता था हम यानी राम (बाबा का सहायक) और मैं लेकर जाते थे। हम अक्सर बाबा को लेकर हिन्दी प्रचारिणी और टाउन हॉल जाया करते थे। बाबा से अक्सर मिलने वालों में हनुमंत मनगटे जी, सलीम जुन्नारदेवी जी, लक्ष्मीप्रसाद दुबे जी, राजेद्र राही जी, नयन जी, व्योम जी और कई नाम शामिल थे।

बाबा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो छोटे-बड़े सभी को अपनी ओर आकृर्षित करता था। बाबा सभी से बहुत दोस्ताना अंदाज में मिलते और बतियाते थे। बाबा की यादों को मैं कभी भी बिसरा नहीं सकता। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि मैं उनके अंतिम समय में उनके पास नहीं था।

रामकृष्ण डोंगरे 'तृष्णा'

शनिवार, 9 जनवरी 2010

Interview : Dr. Deepak Acharya

Dr. Acharya, I am delighted to welcome you to Sacred Earth and am looking forward to your contributions and expertise.
You have been deeply involved with researching traditional tribal knowledge in various places in India. What first inspired you to become involved with Tribals and to research and document their traditional plant knowledge?

As a child I suffered a critical health disorder and the doctors wanted to operate on me। Someone suggested that my father should visit and meet with a certain herbal healer, who had the reputation of being an expert in curing this particular disorder. My father met him and asked him to treat me. He gave me an herbal treatment to for 30 days and amazingly I was all well at the end of the 30th day. It was like a miracle and even the doctors, who had wanted to operate, could not believe it. Two decades later, after I completed my master's degree in Plant Sciences and started my PhD in medicinal herbs, I wished to meet that herbal healer. But, when I reached the village where he had lived, I was told that he had passed away 10 years earlier. I was deeply upset over his demise. Nobody ever documented his knowledge, nor did his children tried to learn it. It was a great loss. That day I knew that my mission was to scout out and document the traditional herbal knowledge of the tribal people.