सोमवार, 9 जून 2008

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का गोटमार मेला

प्रेमियों की याद में अनोखा मेला

लगभग 80 हजार आबादी वाले पाढुरना नगर और सावर गांव के बीच जाम नदी बहती है। इसी के निकट गुजरी चौक बाजार स्थित राधाकृष्ण मंदिर वाले हिस्से में यह गोटमार मेला लगता है।

इस मेले में भाग लेने के लिए महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश के अनेक जिलों से लोग प्रति वर्ष आते हैं।

पत्थरों से मारे गए प्रेमी-प्रेमिका की याद में मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पांढुरना में प्रत्येक वर्ष भाद्रपद की अमावस्या के दिन आयोजित होने वाले गोटमार मेले को पूरे उत्साह से मनाने की तैयारियां पूरी हो गई है। मराठी भाषा के शब्द गोटमार का अर्थ होता है पत्थरों से मारा जाना।

उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में मराठी भाषी लोगों की बहुलता है। गोटमार मेले के बारे में कोई दस्तावेजी विवरण उपलब्ध नहीं, है लेकिन क्षेत्र में मान्यता है कि पांढुरना नगर का एक युवक पड़ोसी सावर गांव की युवती पर मोहित हो गया। प्रेमिका को जीवनसाथी बनाने के लिए जब वह अमावस्या के दिन पांढुरना लाने का प्रयास कर रहा था तभी इसे प्रतिष्ठा पर आघात समझ कर सावर गांव के लोगों ने युवक पर पत्थरों की बौछार शुरू कर दी। युवक के गांव के लोगों को जब इसका पता चला तो उन्होंने भी पत्थर बरसाने शुरू कर दिए इससे प्रेमी-प्रेमिका की जाम नदी में मृत्यु हो गई। इसके बाद दोनों पक्षों ने शर्मिदगी के चलते उनके शवों को गांव न ले जाकर निकट के चंडिका देवी मंदिर ले गए और पूजा-अर्चना के बाद वहीं उनका अंतिम संस्कार कर दिया।

इसी घटना की याद में मां चंडिका की पूजा कर प्रत्येक वर्ष भादों माह की अमावस्या को दोनों गांवों के लोग पत्थर बरसाकर एक दूसरे का लहू बहाते हैं। इस युद्ध जैसे आयोजन में सैकड़ों लोग घायल होते हैं। कई तो अपने प्राण भी गवां चुके हैं1 इस मेले में भाग लेने के लिए महाराष्ट्र मध्यप्रदेश के अनेक जिलों से लोग प्रति वर्ष आते हैं। लगभग 80 हजार आबादी वाले पाढुरना नगर और सावर गांव के बीच जाम नदी बहती है। इसी के निकट गुजरी चौक बाजार स्थित राधाकृष्ण मंदिर वाले हिस्से में यह गोटमार मेला लगता है। इस दिन पूरा गोटमार स्थल तोरणों से सजाया जाता है। प्रात: चार बजे जंगल से पलाश के पेड़ को लाकर पूजा-अर्चना के बाद दोनों पक्षों की सहमति से जाम नदी के बीच गाड़ देते हैं इसके बाद एक-दूसरे पक्ष पर पत्थर बरसाने का क्रम शुरू होता है।

पत्थरों का यह युद्ध दोपहर दो बजे से शाम पांच बजे तक पूरे शबाब पर होता है। इसमें घायल हुए लोग मंदिर की भभूत लगाकर पुन: पत्थर से मार करने चले जाते हैं। पांढुरना नगर के लोग शाम छह बजे योद्धा पलाश रूपी वृक्ष को काट कर गगनभेदी नारों के बीच चंडिका मंदिर ले जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और मां चरणों में अर्पित करते हैं। इसी के साथ गोटमार मेला समाप्त हो जाता है।

radhika

http://fsy2.com/forums/archive/index.php/t-233.html

कोई टिप्पणी नहीं: