रविवार, 1 जून 2008

पहाड़ के उस पार 30 कि.मी. दूर छिन्दवाड़ा

तारीख 27-कमलेश्वर और छिंदवाड़ा

हनुमंत मनगटे

अदीब जानता था, मोंतेजुमा ने उससे जो कहा था-प्रमथ्यु! तुमने तुलसी के पौधे की दाहिनी दिशा में पाताल के अंतिम तल तक पहुंचने का जो जलमार्ग बताया था, गिलगमेश उस पर बहुत आगे बढ़ गया है। वह किसी भी समय स्वप् नगरी पहुंच सकता है। वहां पहुंचते ही वह धन्वन्तरि शुरुप्पक के जिउसुद्दु को जरुर तलाश लेगा। अदीब घर-5116 इरोस गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली के करीब पहुंच रहा था।

कार में बगल में गायत्री अर्धांगिनी, कार ड्राइव करता ड्रायवर और तभी एकाएक सांस की गति में अवरोध। दाहिना हाथ एक एक गायत्री के कांधों पर और सिर कांधे से होता हुआ सीने के पास गायत्री के दिल पर। गायत्री के दिल की धड़कनों की गति से निर्मित असामान्य स्थिति। उत्तेजना में ईना की चीख और गिलगमेश की मनुष्य की पीड़ा, दुख, यातना, भय और मृत्यु से उसे उन्मुक्त करने की आवाज गूंजने लगी- मैं पीड़ा से लड़ूंगा यातना सहूंगा-कुछ भी हो मैं अपने मित्र और मनुष्य मात्र के लिये मृत्यु को पराजित करुंगा। मैं मृत्यु से मुक्ति की औषधि खोज कर लाऊंगा।

27 जनवरी 2007 की रात 830 बजे कमलेश्वर ने गिलगमेश को शायद किसी मुसीबत में देख मृत्यु से साक्षात्कार कर 'जलती हुई नदी' में छलांग लगा दी थी और तैरते हुए वह उस समन्दर में पहुंच गये थे गिलगमेश को खोजने, उसकी महायत्रा में हमसफर की भूमिका में। देह से मुक्त हो कमलेश्वर ने पंचतत्व में से जल को स्वीकारा, क्योंकि मृत्यु का रहस्य खोजने गिलगमेश अथाह, अतल समन्दर की गहराई में सदियों से श्रमरत था। वह थके नहीं, वह शिकस्ता हो हाथ पैर चलाने में लस्त पस्त हो जाये, अदीब उसी महायात्रा पर निकल पड़े। लेकिन वह हैं, रहेंगे, ािस्म भले ही हो, किताबों में, यादों में, 'यादों के चिरांग' की रोशनी में।

यादों में कोई नहीं मरता। मरा हुआ जिन्दा हो जाता है, क्योंकि यादों के चिरांग की बतियां एक नहीं अनेक होती हैं, रंगों की अनगिनत बातियां, और उनमें तेल की जगह दौड़ता सतत लाल सुर्ख रक्त, स्वचलित, और इसीलिये उसमें से उभरती प्रकाश की अनवरत जलती रक्ताभ लौ। उस लौ में बार-बार उभर कर सामने आता है एक सांवला, आकर्षक, हर दिल अजीज, सामान्य कद का, विशिष्ट आवाज का बादशाह, जिन्दादिल, उम्र को धोंखा देता, लोगों को कृष्ण की सतत कर्मरत रहने की नसीहत देता-कमलेश्वर।

मेरी यादों में कमलेश्वर, और कमलेश्वर की यादों में छिन्दवाड़ा। यह इत्तेफाक नहीं, कोई अदृश्य तिलस्म है या कमलेश्वर की किमियागीरी...यादों के चिरांग को जलाना बुझाना नहीं पड़ता। बुझाने पर भी नहीं बुझते, ताउम्र। निरन्तर सतत ताजिन्दगी जलते रहते हैं, और उनमें मााी के वीसीडी और डीवीडी के माध्यम से दृश्य आंखों के समक्ष आते रहते हैं तथा आवाजें कानों के जरिये दिल और दिमाग को अहसास दिलाते रहती हैं कि अदीब अपने कांधों को जीयस के गिध्द से लगातार नुचवाते हुए भी गिलगमेश की प्रतीक्षा में, मृत्यु के हाथों सिर्फ नश्वर देह सौंपते हुए, वह आपके रुबरु उपस्थित रहता है, जब भी आपकी आंखें और दिल शिद्दत से चाहते हैं कमलेश्वर को अपने से बतियाते, मुजस्सम।

यादों के चिरांग की रोशनी में एक ही फ्रेम में कमलेश्वर, छिन्दवाड़ा और 27 तारींख...संगायन का उद्धाटन, कहानियों की रात, 7वां समांतर लेखक सम्मेलन, बाबा धरणीधर व्याख्यान माला... यादों में कहीं दृश्य एक दूसरे पर सुपर इम्पोज हो जाये इसलिये क्रमबध्द तरीके से...यानी कमलेश्वर का म।प्र. के छिन्दवाड़ा में पहली बार आगमन। 15 मार्च 1970 कथाकार दामोदर सदन, कवि सं. रा. धरणीधर, समीक्षक प्रवीण नायक, कैलाश सक्सेना और मेरे द्वारा गठित साहित्य, संस्कृति, संगीत केंद्रित संस्था 'संगायन' का उद्धाटन कमलेश्वरजी के हस्ते होने वाला था। साथ ही त्रिदिवसीय आयोजन में विभिन्न कार्यक्रमों के अतिरिक्त कहानी पर केन्द्रित परिचर्चाएं भी थीं।

उन दिनों छिन्दवाड़ा आदिवासी बाहुल्य पिछड़ा जिला था, जिसमें ठहरने के लिये ढंग के सर्वसुविधा युक्त लॉज थे, यातायात के लिये टैक्सियां।कमलेश्वरजी बम्बई से नागपुर आने वाले थे। सुबह 10 बजे के करीब टे्रन नागपुर पहुंचती थी। सवारियों को ढोने वाली एक खटारा सी टैक्सी उपलब्ध हो पाई थी, जिसे लेकर मैं और प्रवीण नायक सीधे नागपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। कुछ समय पहले ही टे्रन आकर प्लेटफार्म नं. 1 पर रुकी हुई थी। विलम्ब हो जाने के कारण आत्मग्लानि से भरे हम उन्हें खोजने लगे।

देखा-पास ही एक पोल से टिककर सिगरेट के कश लेता हुआ नीले हाफ बुशशर्ट और फुलपेंट पहने हुए जो खड़ा है, वह कमलेश्वर थे। उन दिनों वे 'सारिका' के सम्पादक थे। करीब पहुंच देरी के लिये क्षमा मांगी तो उन्होंने चिरपरिचित मुस्कराहट के साथ मेरे कंधे पर हाथ रखते हुये कहा, 'कोई बात नहीं हनुमंत। ट्रेन कुछ मिनिट पहले ही आई है, चलो।' इस बीच प्रवीण नायक ने सूटकेस उठा लिया था।

उन्होंने मुझे पहचान लिया था। शायद दस बारह वर्ष के अन्तराल के बावजूद।पहली मुलाकात इसके पूर्व नागपुर में ही प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में हुई थी, जब उनके साथ राजेंद्र यादव थे। नागपुर से छिन्दवाड़ा का 125 कि.मी. का सफर। ऊबड़ खाबड़ डामररोड और उस पर उछलती टूटरंगी टैक्सी। ड्रायवर की बगल की सीट पर कमलेश्वरजी और हम दोनों पिछली सीट पर। उसके पीछे भी चार लोगों के बैठने लायक सीटें थी।

राह में वे छिन्दवाड़ा और साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी लेते रहे। सौंसर में चाय पानी के लिये कुछ देर रुके। सिल्लेवानी घाटी शुरु होने के पहले आमला गांव के पास सड़क के किनारे एक बुजुर्ग आदिवासी टैक्सी रुकवाने के लिये हाथ हिलाता दिखा। उसके साथ दो औरतें थीं। एक प्रौढ़ा और दूसरी विवाहिता नवयुवती, नंगे पैर मैली कुचैली साड़ी पहने। बुजुर्ग-सिर पर छितराये सफेद बाल, रुखे सूखे चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी, शरीर पर मैली सी फतोई और घुटने तक लंगोट की तरह कसी धोती, पैरों में जूते, चप्पलें। ड्रायवर ने उनके करीब पहुंच टैक्सी रोक दी। यह देख प्रवीण नायक ड्रायवर पर उखड़ गया- ड्रायवर, तुमसे बात हुई थी कि कोई भी सवारी नहीं लोगे। जानते हो, हमारे साथ कौन मेहमान हैं? हम वैसे ही लेट हो रहे हैं। हमने पूरी टैक्सी का किराया दिया है। चलो...बढ़ो।

तभी कमलेश्वरजी ने आदिवासियों को गौर से देखते हुए ड्रायवर से कहा-ड्रायवर, उन्हें बैठा लो। उनसे किराया मत सेना। यह थे कमलेश्वर। कुछ देर बाद ही हम थे सतपुड़ा पर्वत की सिल्लेवानी घाटी में रास्ते के एक ओर जितनी गहरी घाटी, दूसरी ओर उतने ही ऊंचे सीध में खड़े पर्वत। पहाड़ के उस पार 30 कि.मी. दूर छिन्दवाड़ा। घुमावदार सर्पीली डामर रोड के चढ़ाव पर रेंगती घर्र-घर्र करती, हाँफती, धुंआ छोड़ती टैक्सी। घाटियां कुहासे से ढंकी। ऊंचे ऊंचे सरपट सीध में खड़े सागौन के पतझड़ के कारण नंगे, नुचे से दरख्त।

मार्च का महिना। लाल सुर्ख टेसू के फूलों से लदे पलाश के दरख्तों से दहकता जंगल। कमलेश्वरजी अभिभूत थे।बम्बई (मुम्बई) लौट कर उन्होंने सारिका में जिक्र किया था छिन्दवाड़ा का, सतपुड़ा का, हरी भरी वादियों का। उनकी यादों में आखिर तक छिन्दवाड़ा और म।प्र. अमिट रहा। उन्होंने छिन्दवाड़ा साहित्य के पुरखे बाबा धरणीधर को जो जिला चिकित्सालय में पिछले छह वर्षों से मौत से लड़ रहे थे, जो पत्र भेजा था, वह... 4-4-99 भाई धरणीधर जी तो मैं सतपुड़ा की पहाड़ियों और जंगलों को भूल सकता हूँ, आपको, मनगटे तथा अन्य मित्रों को। मनीष राय भी यादों में उलझे हुए हैं।

छिन्दवाड़ा, धार, कुक्षी और मांडू भी याद है। दामोदर सदन भी और कुक्षी के रास्ते की वे उत्कीर्ण गुफायें भी और वहां के आदिवासी भी। इस सबको आप जैसे साथियों ने ही तो, मेरी यादों का हिस्सा बनाया है...आप याद हैं तो सब याद है...आपके जीवट का तो कायल था ही, गहरी जिजीविषा का भी अब कायल हूँ। सारी सूचनाएं मनगटे से ही मिली थीं। अभी उनका पत्र भी आया है, किसी एक्सीडेंट के कारण पड़े हैं। आशा है वे भी शीघ्र स्वस्थ्य हो जायेंगे। और जब हम लोग आपसे मिलने पहुंचेंगे तो आपको भी चिकित्सालय से बाहर लायेंगे...और जशन मनायेंगे।

धरणीधर जी...दार्शनिकों ने कहा है वक्त नहीं बीतता, हम बीतते हैं, पर मुझे तो लगता है वक्त बीत रहा है, हम नहीं...हम तो जी रहे हैं और वक्त हमारे साथ जी रहा है! तो मुलाकात के इंतजार के साथ-आपका-कमलेश्वर 7 वां अखिल भारतीय समांतर लेखक सम्मेलन का जिक्र करुं, जो छिन्दवाड़ा में हुआ था, उसके पहले उस पत्र का हवाला यहां देना जरुरी समझता हूँ, क्योंकि कमलेश्वर क्या थे, कैसे थे, पत्र से काफी कुछ स्पष्ट हो जायेगा। साथियों को किस तरह अनुप्रेरित, प्रोत्साहित किया जाता है, उनमें जिजीविषा किस तरह रोपी जाती है, उनके थके, लड़खड़ाते कदमों में किस तरह उर्जा प्रवाहित की जाती है, यह भला कमलेश्वरजी से ज्यादा कौन जानता था। यह उनकी फितरत का विशिष्ट गुण था, जिसे उन्होंने लंबे संघर्ष से अर्जित किया था।

9-5-96 प्रिय मनगटे उस दिन भोपाल में तुमसे आकस्मिक मुलाकात हो गई-जबकि मैं तुम्हारे 3-1-94 के पत्र का जवाब नहीं दे पाया था, पर तुमने क्या लिखा था, यह मुझे याद था। प्रेस बेचकर तुम बुढ़ापे का इंतजाम करना चाहते हो, यह सुनकर तकलीफ हुई। जब मैं बुङ्ढा नहीं हुआ हूँ तो तुम लोग बुढ़ापे की बात कैसे कर सकते हो? यह अधिकार तुम्हें नहीं है एक सच्चाई जरुर है कि अब कोई केंद्रीय पत्र या पत्रिका हमारे पास नहीं है ताकि विचारों का प्रक्षेपण हो सके-तो समांतर की विचारशीलता के लिये अब हमें विकेंद्रित व्यक्ति-केंद्रों की जरुरत होगी। जैसे कि तुम और तुम्हारे साथ 3-4 रचनाकार और॥इस बदलती बाजारु आर्थिक व्यवस्था के विरुध्द हमें वैचारिक प्रतिरोध केंद्र बनाने ही पड़ेंगे, नहीं तो आगे आने वाले समय में हमारा मनुष्य हिरोशिमा की मौत से ज्यादा दारुण गरीबी-निपट गरीबी की मौत मरने के लिये बाध्य होगा! तो सोचो और मुझे अपना बुढ़ापा त्याग कर उत्तर हो! सस्नेह-कमलेश्वर

निष्क्रियता की केंचुल से निकल मेरे बाहर आने में और शिद्दत से सक्रिय होने में इस पत्र की उष्मा ने महती भूमिका अदा की।तो... संक्रमण काल था वह। परीक्षा की घड़ी भी थी। उनके लिये जो समांतर से जुड़े थे और कमलेश्वरजी के लिये भी, क्योंकि टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक तत्कालीन मोरारजी देसाई की सरकार के दबाव में कमलेश्वरजी को 'सारिका' से अलग कर टाइम्स से बाहर करना चाह रहे थे। और कमलेश्वरजी लड़ रहे थे सिध्दांतों की लड़ाई। वह व्यक्ति जिसने अपनी शर्तों पर ऊंचे से ऊंचा पद स्वीकारा और एक झटके में छोड़ा भी किसी भी बड़े से बड़े दबाव में नहीं आने वाला था। 7 वां समांतर कहां हो तय नहीं हो पा रहा था। शायद सितंबर-अक्टूबर 77 में दामोदर सदन भोपाल में थे, सूचना प्रसारण विभाग में, फोन पर चर्चा के दौरान मैंने कहा था कि संभव हो तो छिन्दवाड़ा में सम्मेलन करने का भार मैं उठाने को तैयार हूँ। वे भाई साहब से चर्चा कर देखें।

कुछ दिन बाद ही कमलेश्वरजी का फोन गया था। उन्होंने स्वीकृति और तिथि भी दे दी थी।बाद-जितेंद्र भाटिया जो महासचिव थे, से संपर्क और पत्र व्यवहार होता रहा था सम्मेलन की रुपरेखा के संबंध में तैयारी के बारे में। हर क्षण बदलने वाली स्थिति। कुछ भी अप्रत्याशित घट जाने की हर पल संभावना। किस क्षण अपने ही दोस्त पाला बदल दुश्मन की गोद में बैठ हथियार ले वार करने पीठ पीछे खड़ा हो जाये। ऐसे नाजुक वक्त में बम्बई (मुंबई) एक पल के लिए भी छोड़ना समझदारी भरा कदम नहीं होता, लेकिन कमलेश्वरजी अपनी प्राथमिकताओं के बरक्स बड़े से बड़े हादसों से रुबरु होने में नहीं झिझकते थे।

वह 27 और 28 जनवरी 78 को छिन्दवाड़ा में थे, करीब दो ढाई सौ साहित्यकारों के बीच जिनमें 150 के करीब देश के हर कोने से वरिष्ठ और युवा कथाकार, उपन्यासकार, समीक्षक सम्मेलन में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा चुके थे। वह छिन्दवाड़ा में थे यानी छिन्दवाड़ा से नागपुर 4 घंटे और नागपुर से बम्बई टे्रन से 14 घंटे अर्थात 18 घंटे के अन्तराल पर जबकि हर लम्हा सिर पर लटकी तलवार सा पैना, जानलेवा। लेकिन चेहरे पर कोई शिकन नहीं। लगता ही नहीं था कि वह एक बड़ी लड़ाई के मोर्चे पर हैं, जिसका सम्बन्ध व्यक्ति विशेष से नहीं पूरी साहित्यिक बिरादरी से है। यह लड़ाई विचारों की, सिध्दान्तों की, प्रतिबध्दता की थी, जिसमें राजनैतिक सत्ताधारी दक्षिणपंथी पक्ष पूंजीपतियों के पीठ पर हाथ रखे हुए थे।उस सम्मेलन में जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया था, उस दो पृष्ठों के प्रस्ताव का मजमून प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और गृहमंत्री चरणसिंह को तार से भेजा गया था, क्योंकि उन दिनों टेलीप्रिन्टर या फैक्स की सुविधा छिन्दवाड़ा में उपलब्ध नहीं थी। स्मृति में जो नाम हैं, जिनके हस्ताक्षर पारित प्रस्ताव में थे वे सर्वश्री कमलेश्वर, जितेंद्र भाटिया, कमला प्रसाद, असगर अली इंजीनियर, दयापवार, मधुकर सिंह, सूर्य नारायण रणसुंभे, आलम शाह खान, देवेश ठाकुर, प्रीतम पंछी, धूमकेतु, बलराम, ज्ञानरंजन, धीरेंद्र अस्थाना, शंकर पुण्ताम्बेकर, सतीश कालसेकर, झा, दामोदर सदन, मनीष राय, नरेंद्र मौर्य, संजीव, तेजिन्दर, शौरिराजन, विभु खरे, राजेंद्र पटोरिया, हंसपाल, राजेंद्र शर्मा, विभुखरे, ललित लाजरस, मदन मालवीय, सं। रा. धरणीधर, हनुमंत मनगटे आदि।

इत्तेफाक है कि 27 जनवरी 07 को अदीब महायात्रा पर निकल गया। ठीक 29 वर्ष पूर्व 27 जनवरी 78 को वह छिन्दवाड़ा में था। 27 तारीख कमलेश्वर और छिन्दवाड़ा। हमेशा विषम स्थितियां ही जन्मी।एक और वाकिया। मेरे आग्रह पर बाबा धरणीधर व्याख्यान माला (म।प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन छिन्दवाड़ा का आयोजन) में वर्ष 2004 में 'विमर्शों की भीड़ में गुमशुदा आम आदमी' विषय पर भाषण देने कमलेश्वर आने वाले थे। 27 नवंबर 04 को संध्या 5.45 बजे .पी. सुपरफास्ट टे्रन से नागपुर के लिये दिल्ली से वह रवाना होने वाले थे। 26 की रात फोन पर चर्चा भी हो गई थी।

मैंने कहा था कि नागपुर में कथाकार डॉ. गोविंद उपाध्याय और दैनिक भास्कर नागपुर के सम्पादक प्रकाश दुबे 28 की सुबह उन्हें कार से उन्हें छिन्दवाड़ा ले आयेंगे। तब उन्होंने कहा था-हनुमंत, इन दिनों भागदौड़ नहीं होती है, उम्र के इस पड़ाव पर। ऐसा करो, तुम जाओ नागपुर या किसी को भेज दो। नागपुर से सीधे छिन्दवाड़ा के लिये रवाना हो जायेंगे। रास्ते में कहीं पर भी चाय बिस्कुट ले लेंगे। मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा था कि जैसा वह चाहते हैं, वैसा ही करुंगा।

दूसरे दिन उनके रवाना होने के पहले एक बार फिर रिंग करुंगा, यह भी कहा था। 27 को बात नहीं हो पाई। उसके पूर्व ही सुबह 11 बजे उनके ड्रायवर नरेंद्र का फोन गया कि भाई साहब को सांस लेने में तकलीफ होने के कारण डॉ. बत्रा के अस्पताल में भरती कर दिया गया है और इस वक्त आई.सी.यू. में हैं। अस्पताल जाने के पूर्व ही उन्होंने फोन पर सूचित करने को कह दिया था।दस-पंद्रह दिन बाद अस्पताल से लौटकर महिना भर अस्पतालों के चक्कर आपरेशन, फिर आराम कर फिर से लेखन और अन्य गतिविधियों में सक्रिय हो गये, यह उनसे जुड़े सभी की जानकारी में है।

दिल्ली के बाहर जाने के नाम पर सिर्फ बेटी मानू और दामाद आलोक के यहां भोपाल तक का सफर वे सपत्नीक करते थे, उस हादसे के बाद। मेरे कहानी संग्रह 'गवाह चश्मदीद' पर समीक्षात्मक आलेख (ही कहूंगा) उन्होंने लिखा था। पिछली दीवाली मनाने वह गायत्रीजी के साथ बेटी मानू के यहां भोपाल गये थे। फोन पर उन्होंने बताया था कि तीन चार दिन बाद वह दिल्ली लौट रहे हैं। मैंने जिक्र भी किया था कि 'गवाह चश्मदीद' छप गई है। 'शिल्पायन' के ललित शर्मा ने ही छापा है, जिन्होंने इसके पूर्व 'पूछो कमलेश्वर से' कहानी संग्रह छापा था। सिर्फ कवर छपने का रह गया है, जिसे 26, 27 अक्टूबर 06 (तीन चार दिन बाद) तक छापकर कुछ प्रतियां देने का वादा उन्होंने किया है।मैं प्रथम प्रति उन्हें भेंट करने हेतु रहा हूँ।

उन दिनों मैं भी अपनी बेटी वंदना गाटेकर के यहां सपत्नीक खेतड़ी नगर (राजस्थान) गया था, जहां से दिल्ली करीब 180 कि।मी. पर है। उनसे आखिरी बार मुलाकात का मौका इसलिये चूक गया कि दीवाली की छुट्टियों के कारण प्रेस के कर्मचारी काम पर नहीं लौटे और इसलिये कवर छपने से रह गया। किताब मिलने और ललित के घर पर ही शाम हो जाने, शाहदरा से सूरजकुंड की दूरी अधिक होने के कारण मैं उनके घर नहीं जा पाया, क्योंकि हमें बेटी को गुड़गांव से लेते हुए खेतड़ी भी लौटना था। उस दिन भी 26 या 27 तारीख थी। कमलेश्वर से जो अंतिम पत्र मिला था उसमें 'आराम' पर जोर दिया गया था। क्या वह थक रह थे? क्या जिस्म कभी भी साथ छोड़ सकता है, का अहसास उन्हें होने लगा था?

10-1-05 प्रिय मनगटे, तुम्हारा पत्र और छिन्दवाड़ा के प्रेम का प्रतीक लम्बा अनुशंसा पत्र भी मिला था। अभिभूत हूँ...क्या कहूँ... वैसे अच्छा ही हुआ कि 27 की सुबह ने तबियत से आगाह किया, नहीं तो मामला बिगड़ सकता था।27-11-04 से आज तक तीन बार एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीटयूट और बत्रा हॉस्पीटल के आईसीसीयू में रहना पड़ा। एस्कॉर्ट्स में एक बड़ा आपरेशन भी हो गया। धमनियां साफ करने का। खैर.... अब तबियत सुधार पर है।

मेरा नया वर्ष 15-20 दिनों बाद शुरु हो सकेगा। प्यार और स्नेह सहित- कमलेश्वर बस आराम, आराम, आराम...बोलना चालना भी मना है। थकान होती है। ....... उनके संपर्क में आने के बाद 'जो मैंने जिया' और अब तक जो पाया, वह 'जलती हुई नदी' में तैरकर किनारे पर पहुंच 'यादों के चिरांग' रोशन कर, आगे का सफर तय करते हुए, अदीब से रुबरु होने के इंतजार की कहानी लिखने में व्यस्त होना श्रेयस्कर होगा। कहानियां ऐसे ही लिखी जाती है ? कमलेश्वर की आत्मसंस्मराणत्मक किताबें - जो मैंने जिया, जलती हुई नदी और यादों के चिराग।

38 विवेकानंद नगर

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