मंगलवार, 28 जुलाई 2020

कोरोना_मरीज_की_आपबीती-1

*#कोरोना_मरीज_की_आपबीती-1*

*पोस्टकर्ता : ब्लॉगर और पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे*

[[यह पोस्ट इसलिए शेयर की जा रही है कि हम इन कहानियों से सीख सके. सबक ले सकें। या हमारे अंदर जो करोना का डर है, उसे हम खत्म कर सके या जिन लोगों के अंदर डर बिल्कुल नहीं है और वे लापरवाही कर रहे हैं, वे अब संभल जाए।]]

ये कहानी एक महिला पत्रकार की है, जो कि एक दफ्तर में काम करती हैं। उसके दफ्तर में 9 जुलाई 2020 को एक व्यक्ति को कोरोना निकलता है। उसके बाद से महिला घर में ही क्वारंटाइन रहती है। वर्क फॉम होम करती है।

इसके बाद पति पत्नी दोनों, हॉस्पिटल जाकर अपना टेस्ट करवाते हैं. उसमें दोनों की रिपोर्ट निगेटिव आ जाती है. घर आने के एक-दो दिन बाद महिला को फीवर आने लगता है. महिला दोबारा हॉस्पिटल जाकर टेस्ट करवाती है. बदकिस्मती से अब उसका टेस्ट 15 जुलाई को पॉजिटिव आ जाता है.

उसने बताया- "उस रात तो 12:00 बजे जैसे ही पता चला उसके बाद आंखों से नींद ही गायब हो गई। सुबह 9:00 बजे से सिर्फ पूछताछ की जा रही थी। एसडीएम, तहसीलदार, थानेदार, सीएमएचओ से लेकर करीब 20 फोन आ चुके थे। लेकिन देर शाम तक इलाज शुरू नहीं हुआ। कोरोना मरीज को ऐसा महसूस होने लगता है जैसे कि उसने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो और एंबुलेंस से जेल में डालने के लिए ले जा रहे हो। इसी तरह की नजरों से लोग देखते हैं।

हॉस्पिटल में एडमिट होने के बाद उसे दवाइयां और डॉक्टरों की तरफ से फिक्स डाइट दी जाती है। इसमें अंडे, सेब, दूध और खाना शामिल होता है।

इसके बाद महिला की रिपोर्ट निगेटिव आ जाती है। 10 दिन हास्पिटल में रहने के बाद महिला 26 जुलाई 2020 को अपने घर आ जाती है। फिलहाल अभी घर आने के बाद भी क्वारंटाइन ही है। उसे अभी भी कमजोरी और बॉडी पेन रहता है। 10 दिन के बाद घर आने पर कालोनी के लोग छुप छुपकर देखते हैं कि कहीं मिलने ना आ जाए।

महिला ने बताया कि रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद सबसे ज्यादा टेंशन होती है। पहले 10-20 फोन आते है पूछताछ के लिए सरकारी दफ्तरों से। फिर एंबुलेंस लेने पहुंचती है 8-10 घंटे के बाद.  उसके बाद 8-10 कोरोना पॉजिटिव को पूरे शहर से उठाकर हास्पिटल ले जाया जाता है। इसमें भी 2-3 घंटे लग जाते है। 

यह पूरा घटनाक्रम अपने आपमें डराने वाला होता है। हमारे आत्मविश्वास को कमजोर करता है. इसके बजाय अगर हमारे अपने और पड़ोसी हमारा मनोबल बढ़ाने वाला काम करें तो बेहतर होता।

*पोस्टकर्ता : ब्लॉगर और पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे*

आप चाहते है कि आपको या आपके परिवार के लोगों को कोरोना न हो। तो पहले खूब डरें। घर से बाहर कम से कम निकलें। मास्क, फिजिकल डिस्टेंसिंग जैसे उपाय करें। लेकिन फिर भी अगर आप कोरोना के कोई लक्षण नजर आएं तो तत्काल डॉक्टर से संपर्क करें। और अपना टेस्ट करवाएं। क्योंकि जब ये वायरस आपके फेफड़ों तक पहुंच जाता है तब बहुत मुश्किल हो जाती है।

धन्यवाद

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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सोमवार, 20 जुलाई 2020

फिल्म पत्रकारिता और पत्रकार

हालांकि निर्माता-निर्देशक मदन मोहला के निधन की खबर मिलने के बाद मैं दस नंबरी फिल्म के बारे में मेरा संस्मरण लिखना चाहता था, लेकिन मेरी पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाएं और मेरे दोस्त वजीर सिंह Vajir Singh की फिल्म पत्रिका को ८ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में उसने डाली पोस्ट के बाद  फिल्म पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों पर कुछ लिखना मुझे ज्यादा उचित लगा। इसके पहले मैंने फिल्म पीआरओ के बारे में लिखा था जिसे काफी सराहा गया।


आज फिल्म पत्रकारिता बेहद आसान हुआ है। जब फिल्म प्रदर्शन के कगार पर होती है तो पीआरओ कलाकारों के साथ मिलवाते हैं और इंटरव्यू हो जाते हैं। आज फिल्म पत्रकारों को सिर्फ फिल्म रिलीज के वक्त याद किया जाता है। १५-२० वर्ष पहले ऐसे नहीं था। फिल्म के मुहुर्त से लेकर शूटिंग  कवर करने के लिए और आडियो रिलीज के और फिल्म पूरी  होने के बाद विशेष शो के लिए पत्रकारों को आमंत्रित किया जाता था। जिससे फिल्म पत्रकारिता करने वाले कई पत्रकारों से अच्छी खासी दोस्ती हुई थी। पत्रकारों के साथ ही फोटोग्राफरों के साथ भी दोस्ती हुई थी। इनमे टीव्ही के पत्रकार भी है. पराग छापेकर Parag Chhapekar New, Manoj Khadilkar  मनोज खाडिलकर, सोहेल Sohel Fakhruddin Fidai के नाम तुरंत याद आते है.

सुश्री रेखा देशपांडे के प्रोत्साहन की  वजह से मैं फिल्म पत्रकारिता करने लगा। उनके बाद सबरंग के संपादक धीरेंद्र अस्थाना Dhirendra Asthana, राकेश श्रीमाल Rakesh Shreemal संझा जनसत्सता के तीश पेडणेकर, लोकसत्ता के श्रीकांत बोजेवार Shrikant Bojewar. सांज लोकसत्ता के संपादक स्चर्गीय चंद्रशेखर वाघ, प्रकाश कुलकर्णी, आदि ने मुझे काफी प्रोत्साहित किया।

*©® मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे की फेसबुक पोस्ट*

फिल्म पत्रकारिता करते हुए कुणाल शाह Kunal M Shah, वजीर सिंह Vajir Singh, श्याम शर्मा Shyam Sharma केएम श्रीवास्तव Krishnamohan Srivastava से अच्छा खासी दोस्ती हो चुकी थी। कुणाल ने अब फिल्म पत्रकारिता छोड़ कर खुद की कास्टिंग एजंसी शुरु की है और अपना ऐक अलग स्थान बनाया है। वजीर ने नौकरी छोड़ कर खुद की बॉलीवुड ट्रेड पत्रिका शुरु की और आज वह सफलापूर्वक चल रही है। वजीर की शादी में हम जम कर नाचे थे। श्याम शर्मा हालांकि अच्छा अभिनेता है लेकिन उसे Murli Sharma मुरली शर्मा जैसा मौका नहीं मिल। मुरली शर्मा भी अभिनेता बनने के पहले इंडियन एक्सप्रेस में पत्रकारिता कर चुके हैं। हरी मृदुल Hari Mridul एक बेहद अच्छे कवी है और फिल्म पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने अपनी इस कला को बखूबी जीवंत रखा है। साहित्य में उनकी रुची कमाल की है और उनकी रचनाएं भी बेमिसाल है। संजय मासूम Sanjay Masoomm आज चोटी के फिल्म लेखक बने हैं जो पहले नवभारत टाईम्स में पत्रकारिता करते थे। अनिल राही Anil Rahi अच्छी आवाज के धनी है जो अब धारावाहिक लिखने का काम कर रहे हैं। इंद्रमोहन पन्नू Indermohan Pannu जैसा मित्र बहुत ही विरला मिलते हैं।  भारती दुबे Bharati Dubey एक बहुत ही अच्छी मित्र है जो आज भी अपना दबदबा कायम रखे हुए हैं। पूजा सामंत Pooja Samant ने हिंदी और मराठी फिल्म पत्रकारिता में अपना अलग स्थान बनाया है। ज्योती वेंकटेश Jyothi Venkatesh आज भी उसी जोश के साथ फिल्म पत्रकारिता कर रहे हैं। आज गुजरात समाचार मे काम कर रहे आशिष भिंडे Ashish Bhinde साहित्य  में अपना नाम कर रहे हैं.

पीटर मार्टिस Peter Martis स्क्रीन में काम करते थे जो बाद में पीआरओ बन गए। इसी तरह आलोक माथुर Alok Mathur भी स्क्रीन में काम करते थे बाद में पीआरओ बन गए। ऐसे कई पत्रकार हैं जो बाद में पीआरओ का काम करने लगे। चंदेरी में राजू पटेल थे, जो कमाल के थे। हमेशा आऊट ऑफ बॉक्स सोचते थे। उनका दिमाग हमेशा नया कुछ करने का प्रयास करता था जिससे पाठकों को बेहद कमाल की सामग्री पढ़ने को मिलती थी। अब वह किसी प्रोडक्शन हाऊस में हैं। दिलीप ठाकूर Dilip Thakur बहुत पुराने और मंजे हुए फिल्म पत्रकार हैं। वह  फिल्मों में ही जीते हैं। उन्हें गुगल की जररूत नहीं पड़ती। आज भी उसी उत्साह के साथ वह काम करते हैं। श्रीकिशोर शाही Shrikishore Shahi सामना के उम्दा फिल्म रिपोर्टर हैं। मेरे बहुत ही अच्छे मित्र भी हैं। सुरेंद्र गांगण Surendra Gangan मेरे साथ फिल्म पत्रकारिता करते थे आज वह हिंदुस्तान टाईम्स में पालिटिकल बीट बहुत ही खूबसूरती से कवर कर रहे हैं। सकाल के संतोष भिंगर्डे Santosh Bhingarde एक बहुत ही सच्चे पत्रकार है. मेरा बहुत अच्छा दोस्त है. ऐसे दोस्त कम ही मिलते है.

कोमल नाहटा Komal Nahta और तरन आदर्श Taran Adarsh उस  जमाने में भी चोटी पर थे और आज भी चोटी पर हैं। हालांकि ऊंचाई पर पहुंचने के बाद कुछ लोग खुद को शहंशाह समझने लगते हैं, लेकिन इन दोनों ने कभी भी ऐसा महसूस नहीं होने दिया। आज भी उन्हें कोई भी किसी भी तरह की मदद मांगता है तो दे देते हैंं। इसी कड़ी में स्क्रीन की संपादिका उदय तारा नायर का भी नाम लेना पड़ेगा। इनकी जैसी संपादिका अच्छे तकदीर वालों को ही मिलती है। पत्रकारों को हर तरह की मदद करने के लिए उदया तारा तैयार रहती थी। विनोद मिरानी Vinod Mirani  एक बेहद अच्छ इंसान हैं.

*©® मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे की फेसबुक पोस्ट*

हालांकि यहां मैं एक अनुभव बताना चाहूंगा। एक बहुत बड़ी हिंदी की महिला पत्रकार हैं। मैं नया-नया आया था तो सोचा उन्हें मिल कर अच्छी पत्रकारिता करने के लिए कुछ टिप्स लिए जाएं। मैंने उन्हें फोन कर मिलने की इच्छा जताई। उन्होंने सुबह आठ बजे उनके घर बुलाया। मैं आठ बजे पहुंचा। पहुंचने के बाद घर की घंटी बजाई और वह पत्रकार घर के बाहर आई और कहा मैं क्या टिप्स दे सकती हूं तुम्हें खुद ही अपनी जमीन तलाशनी है, खुद के कांटैक्ट डेवलप करो और आगे बढ़ो। इतना कह कर वह अंदर गई। पहले तो मैंं काफी नर्वस हुआ, लेकिन उनकी बातों पर अंमल कर खुद का स्थान बनाया।


फोटोग्राफरों में प्रदीप बांदेकर Pradeep Bandekar कुंदन गोस्वामी Kundan Goswami, उमेश व्यास (जो अब जयपुर या कहीं और हैं।), जगदीश औरंगाबादकर (जो अब इस दुनिया में नहीं है) इनके नाम प्रमुखता से याद आते हैं। प्रदीप जैसा दोस्त आपको ढूंढ कर भी नहीं मिलेगा।

शकील अहमद, एएल चौगुले, शरद राय Sharad Rai, अशोक भाटिया  अशोक रामचंद भाटिया Shantiswaroop Tripathi शांतीस्वरूप त्रिपाठी, Dharmendra Pratap Singh धर्मेंद्र प्रताप सिंह दि के नाम भी याद आते हैं। शकील ने फिल्म पत्रकारिता ही छोड़ दी है, अब वह कहां है पता नहीं। आनंद भारती Anand Bharti  एक बहुत अच्छे पत्रकार है। विकी ललवानी भी बहुत दिनो से संपर्क मे नही है. राजेश श्रीवास्तव Rajesh Shrivastava भी एक बेहतरीन फिल्म पत्रकार है।

आनन-फानन में यह नाम याद आए जिनके साथ मेरी अच्छी जमती थी। जिन्हें मैं दोस्त कह सकता हूं। अगर किसी का नाम गलती से लेना रह गया होगा तो माफ करें और कमेंट बॉक्स में लिख कर भेजें।

*©® मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे की फेसबुक पोस्ट*

ये पोस्ट सभी पत्रकारिता के छात्रों और नए पत्रकारों के लिए उपयोगी हो सकती है।

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रविवार, 7 जून 2020

पत्रकारिता की चुनौतियों से लड़कियों को आगाह करें, नकारात्मक पक्ष बताएं, मगर फील्ड में आने से न रोकें




मुझे लगता है कि लड़कियों को सफलता पाने की कभी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए। न ही किसी होड़ में खुद को शामिल करना चाहिए। उन्हें अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा करना चाहिए, और पूरे सम्मान के साथ निडर होकर अपने कार्यक्षेत्र (पत्रकारिता हो या कोई और क्षेत्र) में काम करना चाहिए। अगर लड़कियां अपने रास्ते में अपने सम्मान के साथ चले तो दुनिया की नज़र में बुरे कहलाने वाले लोग भी सामने आएंगे तो सम्मान ही देंगे।




_*पत्रकारिता के पेशे में आने से पहले अगर कोई आपसे मार्गदर्शन चाहता है तो क्या करना चाहिए? इसमें अगर इच्छुक शख्स कोई लड़की है तो… क्या उसे आने के लिए प्रेरित करना चाहिए या मना कर देना चाहिए। इस पर आधारित फेसबुक पोस्ट पर पढ़िए लेखिका, पत्रकार, काटूर्निस्ट, कमेंटेटर, रेडियो एनाउंसर यानी बहुमुखी प्रतिभा की धनी गीतांजलि गीत की प्रतिक्रिया…*_

उन्होंने लिखा है कि…
यहां सबके विचार पढ़े, अपनी भी बात रखूंगी…

मेरी पत्रकारिता में रुचि तब शुरू हुई, जब मैं साल 1987 में उज्जैन से बीएससी ग्रेजुएशन कर रही थी, उस समय नई दुनिया जो इंदौर से निकलता था, श्री बसंतीलाल सेठियाजी के समय की बात है। उसमें पाठकों के पत्र कॉलम में और अन्य कॉलम में मेरे आलेखों को स्थान मिलता था। उस समय न किसी से मोबाइल पर बात होती थी, न फोन का प्रचलन था। न किसी को जानते थे। न किसी से कोई पहचान थी, बस पोस्ट आफिस से टिकट खरीद लाए। अपना आलेख लिखकर भेज दिया नई दुनिया को। उनमें मैं ज्वलंत मुद्दों को उठाती थी।

बड़े खुशी की बात है, उन दिनों नई दुनिया अपने लेखकों को भी पत्र द्वारा सम्मान दिया करता था। मेरे पास मेरे सम्मान में लिखा श्री महेंद्र सेठिया जी द्वारा भेजा गया पत्र आज भी सुरक्षित रखा हुआ है। मेरे कॉलेज में प्रोफ़ेसर्स भी बोलते थे, नई दुनिया इंदौर की अपनी पहचान और अपना स्तर है वह सिर्फ दमदार आलेखों को स्थान देता है। वो लोग कहते थे- नई दुनिया में हम कुछ भेजते है तो नहीं छपता है। तुम्हारा छप जाता है, खुशी की बात है।

बीएससी के बाद साल 1993 के आसपास छिन्दवाड़ा में स्थानीय दैनिक चाणक्य व जनमित्र से और दैनिक मध्यदेश से जुड़ी और दैनिक मध्यदेश में समसामयिक विषय पर कार्टूनिस्ट के रूप में पहचान बनाई। इसी में महिला परिशिष्ट देखती थी। जिस दिन पेस्टर नहीं आया, उस दिन अपने महिला परिशिष्ट की पेस्टिंग भी की। उन दिनों बटर पेपर पर समाचार प्रिंट होते थे। उसे कांच के ऊपर ग्राफ पेपर पर पेस्ट करते थे। वे सारे पेज प्रिटिंग के लिए जाया करते थे।

*छिंदवाडा में पत्रकारिता के क्षेत्र में जुड़ी तो पतिदेव (वरिष्ठ पत्रकार और कवि राजेंद्र राही) का साथ था। जब पति महोदय किसी काम से या कवि सम्मेलन में शहर से बाहर हुए तो उस दिन के अखबार में सम्पादकीय लिखकर आफिस कर्मचारियों की मदद से मैं अखबार को प्रिंटिंग प्रेस में भी भिजवा दिया करती थी। मुझे पत्रकारिता में काम करने में अच्छा लगा कभी किसी बुरे अनुभव का सामना नहीं हुआ।*

…लेकिन मैं यहां (फेसबुक पोस्ट पर) आप लोगों के विचार पढ़ रही हूं कि लड़कियों को पत्रकारिता में नहीं आना चाहिए। मुझे लगता है लड़कियों को कोई भी क्षेत्र हो, उधर बढ़ने से पहले वहां के माहौल के बारे में ज़रूर पता करना चाहिए कि उनके लिए क्या सही होगा और क्या नहीं, तभी आगे बढ़ना चाहिए।

बेटी के जन्म के बाद मैंने साल 1999 के आसपास यूपीएससी क्लियर किया था। पर मेरी परिस्थितियां नहीं थी कि सब छोड़कर बाहर जाऊं। तब से मेरा भी सपना था कि बेटी बड़ी होकर आईएएस अफसर बने, मैंने उसे कम उम्र में ही जनरल नॉलेज और सामान्य विषय पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन जैसे ही वह ट्वेल्थ (बारहवीं) पास हुई तो उसने अपनी रुचि दो क्षेत्रो में, पहली अंतरिक्ष रिसर्च विज्ञान और दूसरा फ़िल्म प्रोडक्शन में ज़ाहिर की। फिर भी मैंने गलती की, उसे बीएससी मैथ्स में ये सोचकर एडमिशन दिला दिया कि ग्रेजुएशन के बाद इसे आईएएस की कोचिंग के लिए बाहर भेज दूंगी। आखिर वही हुआ जो उसने सोचा था। अब लगता है अच्छा हुआ। उसने अपना मनपसंद विषय ले लिया।

अब हम अभिभावकों का कर्तव्य होता है हम उसे उसके क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों से उसे अवगत कराएं, वह अपनी जगह के जिन नकारात्मक पहलू से अनजान है उसे सचेत कराए। ताकि वह सही दिशा में, सही तरीके से आगे बढ़े। और भ्रमित भी न हो। चुनौती हर क्षेत्र में है। हमें कैसे काम करना है, कैसे लोगों के साथ रहना है। ये हम पर निर्भर करता है।

मुझे लगता है कि लड़कियों को सफलता पाने की कभी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए। न ही किसी होड़ में खुद को शामिल करना चाहिए। उन्हें अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा करना चाहिए, और पूरे सम्मान के साथ निडर होकर अपने कार्यक्षेत्र (पत्रकारिता हो या कोई और क्षेत्र) में काम करना चाहिए। अगर लड़कियां अपने रास्ते में अपने सम्मान के साथ चले तो दुनिया की नज़र में बुरे कहलाने वाले लोग भी सामने आएंगे तो सम्मान ही देंगे।

…इसलिये मैं समझती हूं कि चाहे पत्रकारिता हो या कोई भी क्षेत्र लड़कियां कार्यस्थल में अपने आपको अपनी मेहनत से इतना योग्य बना ले कि उनके बिना काम कुछ अधूरा-सा लगे, हर कोई उन्हें पूछे। तो मजाल है कोई उन्हें भ्रमित कर जाए।

*अगर आप लोग लड़कियों को पत्रकारिता में आने से रोक रहे है तो निश्चित ही आप लोगों ने भी कुछ देखा समझा होगा, बिना अनुभव के कोई ये सलाह नहीं देता। फिर भी जो आपसे सलाह मांग रही है आप उसके अभिभावकों को बुलाकर उनके सामने खुलकर अपनी बात कहिए कि क्यों मना कर रहे है? या हां कर रहे है तो वहां उत्पन्न होने वाली चुनौतियों से भी आगाह कराइए। अपने अनुभव उसे बताइए। तभी आप उसे सही दिशा दे पाएंगे।*

*©® गीतांजलि गीत, छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)*

लेखिका परिचय : गीतांजलि गीत बहुमुखी प्रतिभा की धनी है। उनकी रुचि कॉलेज के समय से ही पत्रकारिता में थी। वे लंबे समय से स्तंभकार, काटूर्निस्ट, एनाउंसर, डायरेक्टर के रूप में मीडिया में सक्रिय है। आकाशवाणी छिंदवाड़ा और इग्नू के इंदौर केंद्र में सेवारत रही है। उन्हें संभवत छिंदवाड़ा की पहली महिला पत्रकार होने का गौरव भी हासिल है। सीखने की उम्र कभी खत्म नहीं होती। इसी सोच के साथ फिलहाल वे फिल्म प्रोडक्शन का डिप्लोमा कोर्स माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल से कर रही है।



शनिवार, 30 मई 2020

न्यू रोमांटिक जोड़ी... इनके वीडियो आपने जरूर देखें होंगे

दिनेश पवार-लाखणी पवार, धुले महाराष्ट्र

दिनेश पवार-महुडी बाई पूजा पवार, धुले महाराष्ट्र
|| एक हीरो और दो हीरोइन ||

महाराष्ट्र के धुले जिले में एक छोटा सा शहर है साक्री तहसील। इसी के पास एक गांव है जामदे। यहां पर रहती है *सोशल मीडिया की न्यू रोमांटिक जोड़ी दिनेश पवार और लाखणी पवार...* इनके वीडियो आपने अक्सर देखे होंगे फेसबुक पर... इस जोड़ी के वीडियो विगो एप पर मौजूद है। यहां इनके लाखों फालोवर बन चुके हैं।
ऐसे ही एक वीडियो को अभिनेत्री रवीना टंडन ने 13 नवंबर 2019 को रीट्वीट किया है। इसके बाद ये जोड़ी महाराष्ट्र में और चर्चा में आ गई। मीडिया का ध्यान भी इस तरफ गया। दिनेश पवार - लखानी पवार की चर्चा जमकर होने लगी। इसके बाद गांव वालों ने उनका सम्मान किया।

*एक हीरो और दो हीरोइन*
दिनेश पवार - लखानी पवार के डांसिंग वीडियो में उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। साधारण घर-परिवार से होने के बावजूद प्रतिभाशाली इस कलाकार दंपती ने इंटरनेट पर धूम मचा रखी है।
इस स्टोरी में मजेदार ट्विस्ट भी है। दिनेश पवार की दो बीवियां है - लाखणी पवार और महुडी बाई (पूजा) पवार।
इस जोड़ी ने सभी वीडियो में कमाल की लिपसिंग भी की है। अपनी एक्टिंग की बदौलत ये परिवार अब गरीबी से उभरने में कामयाब हो रहा है।
©® *रामकृष्ण डोंगरे*
पत्रकार, रायपुर (छत्तीसगढ़)

रविवार, 24 नवंबर 2019

यादें शेष : शिक्षाविद और कांग्रेस नेता अरुण दुबे नहीं रहे

छिंदवाड़ा । कोलाढाना निवासी 81 वर्षीय शिक्षाविद गुरुजी और कांग्रेस नेता अरुण दुबे का शनिवार (9 नवंबर 2019) को निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार पातालेश्वर मुक्तिधाम में किया गया। अरुण दुबे उमरानाला हायर सेंकडरी स्कूल में तीन दशक तक अंग्रेजी के व्याख्याता रहे।


वे छिंदवाडा़ पुलिस की स्पेशल ब्रांच के प्रभारी अनुराग दुबे, फर्स्ट स्टैप स्कूल के पीजीटी अनिमेष दुबे और दैनिक भास्कर रायपुर के पत्रकार अमिताभ दुबे के पिता व खान कालोनी निवासी प्रसून दुबे के चाचा थे।

उन्होंने स्कूलों में प्रायमरी स्तर पर पर्यावरण की शिक्षा का ड्राफ्ट बनाने में भूमिका निभाई थी। इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई अहम योगदान दिए। अरुण दुबे ने अंग्रेजी समाचार पत्रों के लिए सतत लेखन भी किया, शुरुआत में वो ब्लिट्ज समाचार पत्र से भी जुडे़ रहे। रिटायरमेंट के बाद वे लंबे समय तक मध्यप्रदेश के मोहखेड़ ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष और छिंदवाडा़ जिला कांग्रेस कमेटी में अहम पदों पर भी रहे।

विनम्र श्रद्धांजलि